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सूचनार्थ

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भारतीय ज्ञान में नववर्ष पर ऐतिहासिक विमर्श

नमस्ते जी

*भारत के मुख्य कैलेण्डर….*

*१. स्वायम्भुव मनु (२९१०२ ई.पू.) से-ऋतु वर्ष के अनुसार-विआधुनिक समय में पृथ्वी की आयु कितनी आँकी गयी है?षुव वृत्त के उत्तर और दक्षिण ३-३ पथ १२, २०, २४ अंश पर थे जिनको सूर्य १-१ मास में पार करता था। उत्तर दिशा में ६ तथा दक्षिण दिशा में भी ६ मास। (ब्रह्माण्ड पुराण १/२२ आदि)

इसे पुरानी इथिओपियन बाइबिल में इनोक की पुस्तक के अध्याय ८२ में भी लिखा गया है।

*२. ध्रुव-इनके मरने के समय २७३७६ ई.पू. में ध्रुव सम्वत्-जब उत्तरी ध्रुव पोलरिस (ध्रुव तारा) की दिशा में था।

३. क्रौञ्च सम्वत्-८१०० वर्ष बाद १९२७६ ई.पू. में क्रौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) का प्रभुत्व था (वायु पुराण, ९९/४१९) ।

४. कश्यप (१७५०० ई.पू.) भारत में आदित्य वर्ष-अदितिर्जातम् अदितिर्जनित्वम्-अदिति के नक्षत्र पुनर्वसु से पुराना वर्ष समाप्त, नया आरम्भ। आज भी इस समय पुरी में रथ यात्रा।

५. कार्त्तिकेय-१५८०० ई.पू.-उत्तरी ध्रुव अभिजित् से दूर हट गया। धनिष्ठा नक्षत्र से वर्षा तथा सम्वत् का आरम्भ। अतः सम्वत् को वर्ष कहा गया। (महाभारत, वन पर्व २३०/८-१०)

६. वैवस्वत मनु-१३९०२ ई.पू.-चैत्र मास से वर्ष आरम्भ। वर्तमान युग व्यवस्था।

७. वैवस्वत यम-११,१७६ ई.पू. (क्रौञ्च के ८१०० वर्ष बाद)। इनके बाद जल प्रलय। अवेस्ता के जमशेद।

८. इक्ष्वाकु-१-११-८५७६ ई.पू. से। इनके पुत्र विकुक्षि को इराक में उकुसी कहा गया जिसके लेख ८४०० ई.पू. अनुमानित हैं।

९. परशुराम-६१७७ ई.पू. से कलम्ब (कोल्लम) सम्वत्।

१०. युधिष्ठिर काल के ४ पञ्चाङ्ग-

(क)अभिषेक-१७-१२-३१३९ ई.पू. (इसके ५ दिन बाद उत्तरायण में भीष्म का देहान्त)

(ख)

३६ वर्ष बाद भगवान् कृष्ण के देहान्त से कलियुग १७-२-३१०२ उज्जैन मध्यरात्रि से। २ दिन २-२७-३० घंटे बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।

(ग) जयाभ्युदय-६मास ११ दिन बाद परीक्षित अभिषेक* *२२-८-३१०२ ई.पू. से

(घ) लौकिक-ध्रुव के २४३०० वर्ष बाद युधिष्ठिर देहान्त से, कलि २५ वर्ष = ३०७६ ई.पू से कश्मीर में (राजतरंगिणी)

११. भटाब्द-आर्यभट-कलि ३६० = २७४२ ई.पू से।

१२. जैन युधिष्ठिर शक-काशी राजा पार्श्वनाथ का सन्यास-२६३४ ई.पू. (मगध अनुव्रत-१२वां बार्हद्रथ राजा)*
१३. शिशुनाग शक-शिशुनाग देहान्त १९५४ ई.पू. से (बर्मा या म्यान्मार का कौजाद शक)

१४. नन्द शक-१६३४ ई.पू. महापद्मनन्द अभिषेक से। ७९९ वर्ष बाद खारावेल अभिषेक।*

*१५. शूद्रक शक-७५६ ई.पू.-मालव गण आरम्भ*

*१६. चाहमान शक-६१२ ई.पू. में (बृहत् संहिता १३/३)-असीरिया राजधानी निनेवे ध्वस्त

*१७. श्रीहर्ष शक-४५६ ई.पू.-मालव गण का अन्त।

*१८. विक्रम सम्वत्-उज्जैन के परमार राजा विक्रमादित्य द्वारा ५७ ई.पू. से

*१९. शालिवाहन* *शक-विक्रमादित्य के पौत्र द्वारा ७८ ई.से।*

*२०. कलचुरि या चेदि शक-२४६ ई.*

*२१. वलभी भंग (३१९ ई.) गुजरात के वलभी में परवर्त्ती गुप्त राजाओं का अन्त।*

*ज्येष्ठा नक्षत्र को पुर एवं पुरन्‍दर भी कहा जाता है। कभी वर्ष का आरम्भ वर्षा ऋतु से होता था, वर्ष नाम ही पड़ा वर्षा से।*

*पुर रूपी मेघों को सौदामिनी रूपी वज्र से ध्वस्त कर उनमें बंदी जल को वृत्र से मुक्त करने वाले पुरंदर इंद्र वर्षारम्भ में जब ज्येष्ठा नक्षत्र में पधारते थे तो कौन सा काल रहा होगा?*

कहने का अर्थ यह कि ज्येष्ठा नक्षत्र में वर्षा ऋतु कब होती होगी?

नहीं। अभी मृगशिरा में आरम्भ होती है न वर्षा? मिरगा तवे, मेहा नवे! दोनों में 13 नक्षत्र की दूरी। अथर्व एवं महाभारत के 28 नक्षत्रों की प्राचीन परम्परा मानें तो एक नक्षत्र हुआ लगभग 920 वर्ष। 13 नक्षत्र अर्थात लगभग 12000 वर्ष। 10000 ई.पू.!*
*10000 ई.पू. के बारे में नेट पर ढूँढ़ें तो! :)*

मत्स्यपुराण चतुर्युगी की माप दो प्रकार से बताता है;

*- एक में जहाँ काल मापन की न्यूनतम इकाई से आरम्भ किया गया है, वहाँ दिव्य वर्षों की बात है। एक दिव्य वर्ष = 360 मानव वर्ष*
*- किंतु एक दूसरे स्थान पर जहाँ सीधे युगों की बात है, वहाँ दिव्य वर्ष न हो कर मात्र वर्ष है :*

*कृत – 4800 वर्ष*
*त्रेता – 3600 वर्ष*
*द्वापर – 2400 वर्ष*
*कलि – 1200 वर्ष*
*कुल – 12000 वर्ष*

*विद्याद्द्वादशसाहस्रीं युगाख्यां पूर्वनिर्मिताम् ।*
*एवं सहस्रपर्यन्तं तदहर्ब्राह्ममुच्यते ॥*

*ऐसे 1000 बारहहजारी ब्रह्मा के एक दिन के बराबर होते हैं। ब्रह्मा का वर्ष हुआ -* *12000*1000*360 = 4320000000 मानव वर्ष। यदि अर्ह प्रयोग के कारण इसे मात्र दिन मानें, रात अतिरिक्त तो ब्रह्मा जी का एक वर्ष 8640000000 मानव वर्षों के बराबर होता है।*

आधुनिक समय में पृथ्वी की आयु कितनी आँकी गयी है?

*मेरा नववर्ष तो पर्व उत्सव के सोपान चढ़ता आता है, वसंत में, तब जब की समूची सृष्टि नयेपन के आह्लाद में झूम रही होती है…*
*… नववर्ष बबुवा धीरे धीरे आई! 15 जनवरी के संक्रांति मनाई, फिर वसंत पंचमी, उसके बाद शिवराति, तब होलियान संवत्सर सर र र र र आ आ आ … युगादि नया संवत्सर बिहान।

महाविषुवा नया साल – संतुलन, दिन रात बराबर।

नवरातन भर व्रत, पर्व, उत्साह, नवमी के नौ रोटी खा के समापन।*

*भोजपुरी सौर नववर्ष भी है 🙂 – सतुवानि।*
*यह नये अन्न का पर्व है। नये अन्न के सत्तू का भोग आज की विशेषता है। नवरात्र में अष्टमी की रात की ‘नवमी पूजा’ में भी नये अन्न की पूड़ी हलुवा का भोग प्रसाद घर, गाँव और कुलादि की देवियों को चढ़ता है।

सतुवानि शब्द की उपपत्ति क्या हो सकती है?*
अन्न के सत्त्व वाले सत्तू से? या सत्त्वर भोजन से?
🚩🚩🚩🚩
फाल्गुन का होलिका दहन भोजपुरी क्षेत्र में ‘सम्हति’ कहलाता है। यह सम्हति संवत का ही बिगड़ा रूप है। यह दहन प्रतीकात्मक रूप से जाते संवत का दहन होता है जिसमें मन और देह के सारे मैल जला दिये जाते हैं। अगला दिन रंगपर्व नये रंग से अस्तित्त्व रँगने का प्रकृति से जुड़ा विधान है। चन्द्रमा के एक पक्ष यानि चौदह दिनों के अंतराल के पश्चात शुक्ल पक्ष के प्रारम्भ में होने वाला नवरात्र आयोजन आगामी वर्ष के लिये स्वयं को तैयार करने का तप आयोजन है। रबी की फसल का अन्न घर में आ जाता है तो नये अन्न के स्वागत में रामरसोई सजती है रामनवमी के दिन जब कि नये आटे से बने व्यंजन पहली बार खाये जाते हैं। वैदिक युग के नये सत्र आयोजन भी ऐसे ही पुरोहित, कृषक और व्यापारी वर्ग द्वारा संयुक्त रूप से किये जाते थे। स्त्री शक्ति की कल्पना संवत्सर प्रार्थना में भी है।

*पूर्णत: सौर गति आधारित पंचांगों में दो उल्लेखनीय हैं। पंजाब में वैशाखी के दिन नववर्ष मनाया जाता है और उड़ीसा में भी। विधियों के अंतर से यह तिथि प्रति वर्ष 13/14/15 अप्रैल को पड़ती है जब सूर्य कथित रूप से मेष राशि में प्रवेश करता है। उड़ीसा में इसे महाविषुव संक्रांति के नाम से मनाया जाता है हालाँकि दोनों में अयन खिसकन के कारण अब पर्याप्त अंतर हैं। इस समय वास्तव में सूर्य मीन राशि में होता है।*
*बेबीलोन से आयातित 12 राशियों वाला तंत्र वहाँ लगभग 500 ई.पू. में विकसित हुआ था तब महाविषुव मेष राशि में पड़ता था। उन्हें अयन गति का पता नहीं था। पश्चिमी ज्योतिष द्वारा इसके अनुकरण के कारण ही आज वास्तविक राशि और ज्योतिष राशि में अंतर हैं। उदाहरण के लिये यदि आप का जन्म 22 मई से 21 जून के बीच हुआ है तो जोतिखी काका कहेंगे कि तुम्हारी राशि मिथुन है लेकिन वास्तव में सूर्य देवता उस समय वृषभ राशि में होंगे!
इसके उलट भारतीय गणना पद्धति अपेक्षाकृत ‘स्थिर’ नक्षत्रों को आधार बना कर चलती है इसलिये महाविषुव की खिसकन का समायोजन हो जाता है।

*

*हाँ, तो दुहरा लें।*

*हजारो वर्षों से मनुष्य वसंत विषुव (महाविषुव आज का 20 मार्च, जब दिन रात बराबर होते हैं) से नववर्ष का प्रारम्भ मनाता आया है। भारत में भी बैसाखी, उगाडि, बीहू आदि इसी के आसपास पड़ते हैं। प्राचीन भारत में यह समय पवित्र यव (जौ) और रबी की उपज का समय था और संवत्सर से जुड़े वैदिक श्रौत सत्र भी फसल की कटान से जुड़े थे। इस दिन से छ: महीने का समय (जब आज के सितम्बर में दूसरी बार दिन रात बराबर होते) देवयान कहलाता था जिसके अंत के साथ ही दूसरे पितृयानी सत्र प्रारम्भ होते थे जिनके पहले पितरों को श्रद्धांजलि दी जाती थी।*

*पितृयान पवित्र वृहि या शालि या धान की फसल के घर में आने का होता था यानि कि उत्सव ही उत्सव! तो यह जो दीपावली है न, उसी का विस्तार है। थोड़ा ध्यान दीजिये तो दीपावली में प्रसाद में नये धान के लावे, चिउड़ा और खांड या चीनी के गट्टे होते हैं या नहीं? यह समय इक्षु यानि ईख का भी होता था। वही ईख जिसे सोम तक कहा गया। पहला रस, पहला गुड़, नई मिठास यानि फसली समृद्धि के साथ सुख भी। अब ऐसे में श्री यानि लक्ष्मी की पूजा न हो तो किसकी हो?*

*कालांतर में जब वैष्णवों का जोर बढ़ा तो नये गुड़ के आस्वादन को देवोत्थान एकादशी तक बढ़ा दिया गया। अब आप पूछेंगे कि पितृयान में देवोत्थान? बड़ा कंफ्यूजन है! नहीं, ऐसा नहीं है। असल में ये जो विष्णु हैं न, वे सूर्य/आदित्य से इन्द्र के छोटे भाई हुये और उसके बाद स्वतंत्र हो त्रिदेवों में सम्मिलित हो गये। जिस समय वैदिक मार्ग से इतर उनकी प्रतिष्ठा हुई उस समय आकाश में महासर्प, ध्रुव, सप्तर्षि आदि का जो संयोग बनता था वह देव की जागृति की संकल्पना के अनुकूल था। बस्स! सद्विप्रों ने बहुधा वदंति कर दिया। देव और पितर का विभाजन समाप्त हो गया। पितरों की श्रद्धांजलि विसर्जन हो गयी। श्राद्ध आ जुड़ा।*

______________
*अब एक प्रश्न:-*
*भैया दूज के दिन का अमर प्रसाद कच्चे रूप में पाँच अन्नों जौ, चना, मटर, बाजरा और गेहूँ का मिला जुला क्यों बनता है?*
🚩🚩🚩🚩🚩

*पुरा वैदिक काल में जब कि वर्ष भर चलने वाले यज्ञ सत्रों का चलन था, वर्ष को देवयान और पितृयान दो भागों में बाँटा गया था। इस दिन से देवताओं की ऋतुयें प्रारम्भ होती थीं वसंत, ग्रीष्म और वर्षा और यही दिन नववर्ष का प्रारम्भ होता जब कि नये सत्र प्रारम्भ होते। चन्द्रगति की दृष्टि से वर्ष में मात्र 353/4 दिन होते जब कि सौर गति से 365/6। लगभग बारह दिनों के इस अन्तर को वर्षांत में नये सत्र के प्रारम्भ होने के पहले की तैयारियों के लिये रखा जाता और यह काल कहलाता था – द्वादशाह।

बीच का जल विषुव यानि आज का 22 सितम्बर जब कि पुन: दिन और रात बराबर होते, सूर्य ठीक पूर्व में उगता और ठीक पश्चिम में अस्त होता, वर्षा ऋतु के अंत का सन्देश ले आता। वर्षा के अंत के बाद से शरद, शिशिर और हेमंत ये तीन ऋतुयें पितरों की मानी जाती थीं। यह समय पितरों का होता। देवयान का स्वामी जैसे इन्द्र थे वैसे ही पितृयान का स्वामी यम मानें गये हैं।

✍🏻रूपेश कान्त कौशिक

जय अखण्ड सत्य सनातन राष्ट्रम्

संस्कृत व्याकरण के 💯 प्रश्न उत्तर

१०० संस्कृत वैयाकरणस्य प्रश्नोत्तराण

(१.) “अष्टाध्यायी” इत्यस्य ग्रन्थस्य रचनाकारः कः ? – पाणिनिः

(२.) अष्टाध्याय्यां कति अध्यायाः ? – अष्टौ

(३.) अष्टाध्याय्यां कति पादाः ? -३२

(४.) सिद्धान्तकौमुदी इत्यस्य रचयिता क: ? – भट्टोजिदीक्षित:।

(५.) बालमनोरमाटीकाया: कर्ता क: ? – वासुदेवदीक्षित:।

(६.) तत्त्वबोधिनीव्याख्याया: कर्ता क: ? – श्रीज्ञानेन्द्रसरस्वती ।

(७.) प्रक्रियाकौमुदी इत्यस्य ग्रन्थस्य कर्त्ता कः ? – रामचन्द्रः

(८.) अष्टाध्याय्यां प्रत्याहारसूत्राणि कति ? – चतुर्दश। (९.) प्रत्याहारसूत्रेषु को‌ऽयं वर्ण: द्विरनुबध्यते ?- णकार:।

(१०.) प्रत्याहारसूत्रेषु को‌ऽयं वर्ण: द्विरुपदिष्ट: ? – हकार:।

(११.) किमर्थमुपदिष्टानि प्रत्याहारसूत्राणि ?- अणादिप्रत्याहारसंज्ञार्थानि।

(१२.) वेदपुरुषस्य मुखात्मकं वेदाङ्गं किम् ? – व्याकरणम् ।

(१३.) हकारादिषु अकार: किमर्थम् ?- उच्चारणार्थ:। (१४.) सूत्राणां प्रकाराः कति ? के ते ? – सप्त– संज्ञा,परिभाषा, विधि:, नियम:, निषेधः, अतिदेश:,अधिकार:।

(१५.) व्याकरणस्य कति सम्प्रदायाः सन्ति ? – अष्टौ । (१६.) किं नाम संज्ञासूत्रम् ? – संज्ञासंज्ञिसम्बन्धबोधकं सूत्रम् ।

(१७.) किं नाम परिभाषात्वम् ? – अनियमे नियमकारिणीत्वम् ।

(१८) किं नाम विधिसूत्रम् ? – आगम-आदेशादिविधायकं सूत्रम् ।

(१९.) सम्प्रति व्याकरणस्य प्रतिनिधिग्रन्थः कः ? – शब्दानुशासनम् ।

(२०.) को नाम नियम: ? – सिद्धे सति आरभ्यमाण: विधि: नियम: ।

(२१.) को नाम अतिदेश: ? – अविद्यमानस्य धर्मस्य विद्यमानत्वकल्पनम् ।

(२२.) किं नाम अधिकारत्वम् ? – स्वदेशेफलशून्यत्वे सति उत्तरत्र फलजनकत्वम् ।

(२३.) अष्टाध्याय्याः प्रथमसूत्रं किम् ? – वृद्धिरादैच् । (२४.) अन्त्यहलाम् इत्संज्ञाविधायकं सूत्रं किम् ?- हलन्त्यम् (१.३.३)

(२५.) अनुनासिकाचाम् इत्संज्ञाविधायकं सूत्रं किम् ?- उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१.३.२)

(२६.) आदिरन्त्येन सहेता (१.१.७१) इति सूत्रेण किं विधीयते ?- प्रत्याहारसंज्ञा ।

(२७.) प्रत्याहारेषु इतामग्रहणे किं प्रमानम् ? – अनुनासिक इत्यादिनिर्देश:।

(२८.) कस्य ह्रस्व: , दीर्घ:, प्लुत: इति संज्ञा ? उत्तरः–एकमात्राकालिकस्य अच: ह्रस्व: इति, द्विमात्राकालिकस्याच: दीर्घ: इति, त्रिमात्राकालिकस्य अच: प्लुत: इति संज्ञा।

(२९.) अनुनासिकसंज्ञासूत्रम् किम् ?- मुखनासिकावचनोऽनुनासिक:(१.१.८)।

(३०.) अकारस्य कति भेदा: ?- अष्टादश ।

(३१.) लृवर्णस्य क: भेद: नास्ति ? – दीर्घ: ।

(३२.) एचां क: भेद: नास्ति ? – ह्रस्व: ।

(३३.) सवर्णसंज्ञासूत्रं किम् ? – तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१.१.९) ।

(३४.) कण्ठस्थानं केषां वर्णानाम् ? – अकुहविसर्जनीयानाम् ।

(३५) तालुस्थाने के के वर्णा: निष्पद्यन्ते ? – इचुयशा:। (इ,ई,च्,छ्,ज्,झ्,ञ्,य्,श्)

(३६.) केषां वर्णानाम् उत्पत्तिस्थानं मूर्धा ? – ऋटुरषाणाम् ।

(३७.) लृतुलसा: कुत्र निष्पद्यन्ते ? – दन्तेषु ।

(३८.) उपूपधमानीयानाम् उत्पत्तिस्थानं किम् ? – ओष्ठौ।

(३९.) ञमङणनानां क: अधिक: गुण: ? – नासिका । (४०.) वकारस्य निस्पत्तिस्थानं किम् ? – दन्तोष्ठम् । (४१.) अनुस्वार: क्व निष्पद्यते ? – नासिकायाम् । (४२.) प्रयत्न: कतिविध: ? – द्विविध: ।

(४३.) तौ प्रयत्नौ कौ ? – आभ्यन्तर:, बाह्य: ।

(४४.) आभ्यन्तर: कतिविध: ? – पञ्चविधः ।

(४५.) ते आभ्यन्तरा: के ? – स्पृष्टम् , ईषत्-स्पृष्टम् , विवृतम् , ईषत्-विवृतम् , संवृतम् च ।

(४६.) स्पृष्टप्रयत्न: केषां वर्णानाम् ? – स्पर्शानाम्। (४७.) ईषत्स्पृष्टं केषां वर्णानाम् ? – अन्त:स्थानाम्। (४८.) केषां वर्णानां विवृतप्रयत्न: ? – ऊष्माणां स्वराणाञ्च ।

(४९.) कस्य संवृतम् ? – ह्रस्वस्य अकारस्य प्रयोगे संवृतम्।

(५०.) विवृतस्य अकारस्य संवृतत्वं केन सूत्रेण विधीयते ? – अ अ (८.४.६७)

(५१.) पूर्वत्रासिद्धं (८.२.१) कीदृशं सूत्रम् ? – अधिकारसूत्रम् ।

(५२.) यमो नाम क: ? – वर्गेषु आद्यानां चतुर्णां पञ्चमे वर्णे परे पूर्व सदृश: कश्चिद् वर्ण: ” यम:” भवति।

(५३.) स्पर्शवर्णा: के ? – ककारादारभ्य मकारपर्यन्तम्। (कादयो मावसानाः ।

(५४.) अन्त:स्था: के ? – य्, र्, ल्, व् ।

(५५.) ऊष्माण: के ? – श्, ष्, स्, ह् ।

(५६.) स्वरा: के ? – अच: ।

(५७.) को नाम जिह्वामूलीय: ? – ॅ क ॅ ख इति कखाभ्यां प्राग् अर्धविसर्गसदृश: ।

(५८.) उपध्मानीयो नाम क: ? – ॅ प ॅ फ इति पफाभ्यां प्राग् अर्धविसर्गसदृश: ।

(५९.) सवर्णग्राहकं सूत्रं किम् ? -अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय:(१.१.६८)

(६०.) बाह्यप्रयत्ना: कति ? – एकादश ।

(६१.) ते च के ? – विवार:, संवार:, श्वास:, नाद: घोष:, अघोष:, अल्पप्राण:, महाप्राण:, उदात्त: अनुदात्त:, स्वरित: ।

(६२.) तपर: इत्यत्र कथं विग्रह: ? क: समास: ? – त: परो यस्मात् सो तपर इति बहुव्रीहि:, तात् पर: तपर: इति तत्पुरुषो वा ।

(६३.) वृद्धिरादैच् इति कीदृशं सूत्रम् ? – संज्ञासूत्रम् । (६४.) गुणसंज्ञासूत्रं किम् ? – अदेङ् गुण: । (१.१.२) (६५.) धातुसंज्ञासूत्रं किम् ? – भूवादयो धातव: ।(१.३.१)

(६६.) प्रादय: कति ? – द्वाविंशति: (२२)

(६७.) के च ते ? – प्र ,परा ,अप ,सम्,अनु, अव, निस् , निर्, दुस् , दुर् ,वि , आङ् , नि , अधि, अपि ,अति , सु , उत् , अभि , प्रति ,परि , उप ।

(६८.) उपसर्गसंज्ञासूत्रं किम् ? – प्रादयः उपसर्गा: क्रियायोगे (१.४.५८)

(६९.) लिङ्गानुशासनम् इत्यस्य कर्त्ता कः ?–व्याडिः । (७०.) वाक्यपदीयम् कस्य रचना ? –भर्तृहरेः ।

(७१.) पतञ्जलि-प्रणीतः ग्रन्थः कः ? –महाभाष्यम् । (७२.) व्याकरण-शब्दस्य व्युत्पत्तिः का ? -व्याक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्ते शब्दाः अनेनेति व्याकरणम् ।

(७३.) व्याकरणस्य सम्प्रदायः कति के च ?—अष्टौ–ऐन्दम्, चान्द्रम्, काशकृत्स्नम्, कौमारम्, शाकटायनम्, सारस्वतम्, आपिशलम्, शाकलम् ।

(७४.) प्रसिद्धं व्याकरणम् किम् ? –पाणिनीयम् । (७५.) मुनित्रये केषां समावेशो भवति ? –पाणिनिः, कात्यायनः, पतञ्जलिः ।

(७६.) वार्तिकारः कः ? –कात्यायनः ।

(७७.) भट्टोजिदीक्षित-कृत-प्रौढमनोरमायाः खण्डनं केन कृतम् ?–जगन्नाथेन ।

(७८.) मनोरमाकूचमर्दनम् इत्यस्य लेखकः कः ? –पंडितराजो जगन्नाथः ।

(७९.) वरदराजस्य रचनाकार्याणि कानि ? –लघुसिद्धान्तकौमुदी, मध्यसिद्धान्कौमुदी, सारकौमुदी च ।

(८०.) पाणिनीये अष्टाध्यायी-ग्रन्थे कति सूत्राणि ?–३९६४

(८१.) धातवः कतिषु गणेषु विभक्ताः सन्ति ? –दशषु गणेषु ।

(८२.) धातु-गणानां नामानि कानि ?–भ्वादिः, अदादिः, जुहोत्यादिः, दिवादिः, स्वादिः, तुदादिः, रुधादिः, तनादिः, क्र्यादिः, चुरादिः ।

(८३.) शब्देन्दुशेखरः इत्यस्य लेखकः कः ? –नागेशभट्टः ।

(८४.) कति धातवः सन्ति ?–१९७०

(८५.) प्रत्याहारसूत्रेषु मूल-स्वराः के ? –पञ्च–अ, इ, उ, ऋ, लृ ।

(८६.) वाक्यपदीयस्य कति काण्डानि सन्ति ?—त्रीणि–ब्राह्मकाण्डम्, वाक्यकाण्डम्, पदकाण्डम् । (८७.) महाभाष्यस्य कैयटरचिता व्याख्या का ?–प्रदीपः ।

(८८.) अष्टाध्याय्याः प्रथमा वृत्तिः का ?–काशिका । (८९.) काशिकायाः लेखकौ कौ ?–जयादित्यः वामनश्च ।

(९०.) काशिकायाः व्याख्या–काशिका-विवरण-पञ्जिका इत्यस्य लेखकः कः ?–जिनेन्द्रबुद्धिः ।

(९१.) काशिका-विवरण-पञ्जिका इत्यस्य अपरं नाम किम् ?–न्यासः ।

(९२.) काशिकायाः अपरा व्याख्या का ? –पदमञ्जरी ।

(९३.) पदमञ्जरी इत्यस्य रचनाकारः कः ?–हरदत्तमिश्रः ।

(९४.) वैयाकरणभूषणसारः इत्यस्य प्रणेता कः ?–कौण्डभट्टः ।

(९५.) परिभाषेन्दुशेखरः इत्यस्य लेखकः कः ? –नागेशभट्टः ।

(९६.) परिभाषेन्दुशेखरस्य विषय़ः कः ?–पाणिनीयव्याकरणस्य परिभाषायाः विवेचनम् ।

(९७.) महाभाष्यप्रदीपस्य सुप्रसिद्धा व्याख्या का ?–उद्योतः ।

(९८.) उद्योतस्य लेखकः कः ?–नागेशः ।

(९९.) नागेशस्यान्या रचना का ?–वैयाकरणसिद्धान्तमञ्जूषा, लघुमञ्जूषा, परमलघुमञ्जूषा ।

(१००.) शब्दकौस्तुभः इत्यस्य लेखकः कः ?–भट्टोजिदीक्षितः 🙏🙏

“भारतीय संस्कृत दर्शन के स्रोत”

“भारतीय दर्शन”

भारतीय दर्शन का आरंभ वेदों से होता है। “वेद” भारतीय धर्म, दर्शन, संस्कृति, साहित्य आदि सभी के मूल स्त्रोत हैं।

आज भी धार्मिक और सांस्कृतिक कृत्यों के अवसर पर वेद-मंत्रों का गायन होता है। अनेक दर्शन-संप्रदाय वेदों को अपना आधार और प्रमाण मानते हैं। आधुनिक अर्थ में वेदों को हम दर्शन के ग्रंथ नहीं कह सकते। वे प्राचीन भारतवासियों के संगीतमय काव्य के संकलन है। उनमें उस समय के भारतीय जीवन के अनेक विषयों का समावेश है।

वेदों के इन गीतों में अनेक प्रकार के दार्शनिक विचार भी मिलते हैं। चिंतन के इन्हीं बीजों से उत्तरकालीन दर्शनों की वनराजियाँ विकसित हुई हैं। अधिकांश भारतीय दर्शन वेदों को अपना आदिस्त्रोत मानते हैं। ये “आस्तिक दर्शन” कहलाते हैं। प्रसिद्ध षड्दर्शन इन्हीं के अंतर्गत हैं। जो दर्शनसंप्रदाय अपने को वैदिक परंपरा से स्वतंत्र मानते हैं वे भी कुछ सीमा तक वैदिक विचारधाराओं से प्रभावित हैं।

वेदों का रचनाकाल बहुत विवादग्रस्त है। प्राय: पश्चिमी विद्वानों ने ऋग्वेद का रचनाकाल 1500 ई.पू. से लेकर 2500 ई.पू. तक माना है। इसके विपरीत भारतीय विद्वान् ज्योतिष आदि के प्रमाणों द्वारा ऋग्वेद का समय 3000 ई.पू. से लेकर 75000 वर्ष ई.पू. तक मानते हैं।

इतिहास की विदित गतियों के आधार पर इन प्राचीन रचनाओं के समय का अनुमान करना कठिन है। प्राचीन काल में इतने विशाल और समृद्ध साहित्य के विकास में हजारों वर्ष लगे होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं। उपलब्ध वैदिक साहित्य संपूर्ण वैदिक साहित्य का एक छोटा सा अंश है।

प्राचीन युग में रचित समस्त साहित्य संकलित भी नहीं हो सका होगा और संकलित साहित्य का बहुत सा भाग आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया होगा। वास्तविक वैदिक साहित्य का विस्तार इतना अधिक था कि उसके रचनाकाल की कल्पना करना कठिन है। निस्संदेह वह बहुत प्राचीन रहा होगा।

वेदों के संबंध में यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि कुरान और बाइबिल की भाँति “वेद” किसी एक ग्रंथ का नाम नहीं है और न वे किसी एक मनुष्य की रचनाएँ हैं। “वेद” एक संपूर्ण साहित्य है जिसकी विशाल परंपरा है और जिसमें अनेक ग्रंथ सम्मिलित हैं। धार्मिक परंपरा में वेदों को नित्य, अपौरुषेय और ईश्वरीय माना जाता है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हम उन्हें ऋषियों की रचना मान सकते हैं। वेदमंत्रों के रचनेवाले ऋषि अनेक हैं।

वैदिक साहित्य का विकास चार चरणों में हुआ है। ये संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् कहलाते हैं। मंत्रों और स्तुतियों के संग्रह को “संहिता” कहते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद मंत्रों की संहिताएँ ही हैं। इनकी भी अनेक शाखाएँ हैं। इन संहिताओं के मंत्र यज्ञ के अवसर पर देवताओं की स्तुति के लिए गाए जाते थे। आज भी धार्मिक और सांस्कृतिक कृत्यों के अवसर पर इनका गायन होता है। इन वेदमंत्रों में इंद्र, अग्नि, वरुण, सूर्य, सोम, उषा आदि देवताओं की संगीतमय स्तुतियाँ सुरक्षित हैं। यज्ञ और देवोपासना ही वैदिक धर्म का मूल रूप था। वेदों की भावना उत्तरकालीन दर्शनों के समान संन्यासप्रधन नहीं है। वेदमंत्रों में जीवन के प्रति आस्था तथा जीवन का उल्लास ओतप्रोत है। जगत् की असत्यता का वेदमंत्रों में आभास नहीं है। ऋग्वेद में लौकिक मूल्यों का पर्याप्त मान है। वैदिक ऋषि देवताओं से अन्न, धन, संतान, स्वास्थ्य, दीर्घायु, विजय आदि की अभ्यर्थना करते हैं।

वेदों के मंत्र प्राचीन भारतीयों के संगीतमय लोककाव्य के उत्तम उदाहरण हैं। ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रंथों में गद्य की प्रधानता है, यद्यपि उनका यह गद्य भी लययुक्त है। ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञों की विधि, उनके प्रयोजन, फल आदि का विवेचन है। आरण्यकग्रंथों में आध्यात्मिकता की ओर झुकाव दिखाई देता है। जैसा कि इस नाम से ही विदित होता है, ये वानप्रस्थों के उपयोग के ग्रंथ हैं। उपनिषदों में आध्यात्मिक चिंतन की प्रधानता है। चारों वेदों की मंत्रसंहिताओं के ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् अलग अलग मिलते हैं। शतपथ, तांडय आदि ब्राह्मण प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण हैं। ऐतरेय, तैत्तिरीय आदि के नाम से आरण्यक और उपनिषद् दोनों मिलते हैं। इनके अतिरिक्त ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य आदि प्राचीन उपनिषद् भारतीय चिंतन के आदिस्त्रोत हैं।

उपनिषदों का दर्शन आध्यात्मिक है। ब्रह्म की साधना ही उपनिषदों का मुख्य लक्ष्य है। ब्रह्म को आत्मा भी कहते हैं। “आत्मा” विषयजगत्, शरीर, इंद्रियों, मन, बुद्धि आदि सभी अवगम्य तत्वों स परे एक अनिर्वचनीय और अतींद्रिय तत्व है, जो चित्स्वरूप, अनंत और आनंदमय है। सभी परिच्छेदों से परे होने के कारण वह अनंत है। अपरिच्छन्न और एक होने के कारण आत्मा भेदमूलक जगत् में मनुष्यों के बीच आंतरिक अभेद और अद्वैत का आधार बन सकता है। आत्मा ही मनुष्य का वास्तविक स्वरूप है। उसका साक्षात्कार करके मनुष्य मन के समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है।

अद्वैतभाव की पूर्णता के लिए आत्मा अथवा ब्रह्म से जड़ जगत् की उत्पत्ति कैसे होती है, इसकी व्याख्या के लिए माया की अनिर्वचनीय शक्ति की कल्पना की गई है। किंतु सृष्टिवाद की अपेक्षा आत्मिक अद्वैतभाव उपनिषदों के वेदांत का अधिक महत्वपूर्ण पक्ष है। यही अद्वैतभाव भारतीय संस्कृति में ओतप्रोत है।

दर्शन के क्षेत्र में उपनिषदों का यह ब्रह्मवाद आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्यआदि के उत्तरकालीन वेदांत मतों का आधार बना। वेदों का अंतिम भाग होने के कारण उपनिषदों को “वेदांत” भी कहते हैं। उपनिषदों का अभिमत ही आगे चलकर वेदांत का सिद्धांत और संप्रदायों का आधार बन गया। उपनिषदों की शैली सरल और गंभीर है। अनुभव के गंभीर तत्व अत्यंत सरल भाषा में उपनिषदों में व्यक्त हुए हैं। उनको समझने के लिए अनुभव का प्रकाश अपेक्षित है। ब्रह्म का अनुभव ही उपनिषदों का लक्ष्य है। वह अपनी साधना से ही प्राप्त होता है। गुरु का संपर्क उसमें अधिक सहायक होता है। तप, आचार आदि साधना की भूमिका बनाते हैं। कर्म आत्मिक अनुभव का साधक नहीं है। कर्म प्रधान वैदिक धर्म से उपनिषदों का यह मतभेद है। संन्यास, वैराग्य, योग, तप, त्याग आदि को उपनिषदों में बहुत महत्व दिया गया है। इनमें श्रमण परंपरा के कठोर संन्यासवाद की प्रेरणा का स्रोत दिखाई देता है। तपोवादी जैन और बौद्ध मत तथा गीता का कर्मयोग उपनिषदों की आध्यात्मिक भूमि में ही अंकुरित हुए हैं।

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“अवैदिक दर्शनों का विकास”

उपनिषदों के अध्यात्मवाद तथा तपोवाद में ही वैदिक कर्मकांड के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया ने एक प्रकट क्रांति का रूप ग्रहण कर लिया। जैन धर्म का आरंभ बौद्ध धर्म से पहले हुआ।

महावीर स्वामी के पूर्व 23 जैन तीर्थकर हो चुके थे। महावीर स्वमी ने जैन धर्म का प्रचार किया।

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध उनके समकालीन थे। दोनों का समय ई.पू. छठी शताब्दी माना जाता है। इन्होंने वेदों से स्वतंत्र एक नवीन धार्मिक परंपरा का प्रवर्तन किया। वेदों को न मानने के कारण जैन और बौद्ध दर्शनों को “नास्तिक दर्शन” भी कहते हैं। इनका मौलिक साहित्य क्रमश: महावीर और बुद्ध के उपदेशों के रूप मे है जो क्रमश: प्राकृत और पालि की लोकभाषाओं में मिलता है तथा जिसका संग्रह इन महापुरुषों के निर्वाण के बाद कई संगीतियों में उनके अनुयायियों के परामर्श के द्वारा हुआ।

बुद्ध और महावीर दोनों हिमालय प्रदेश के राजकुमार थे। युवावय में हीसंन्यास लेकर उन्होने अपने धर्मो का उपदेश और प्रचार किया। उनका यह सन्यास उपनिषदों की परंपरा से प्रेरित है। जैन और बौद्ध धर्मों में तप और त्याग की महिमा भी उपनिषदों के दशर्न के अनुकूल है। अहिंसा और आचार की महत्ता तथा जातिभेद का खंडन इन धर्मों की विशेषता है। अहिंसा के बीज भी उपनिषदों में विद्यमान हैं। फिर भी अहिंसा की ध्वजा को धर्म के आकाश में फहराने का श्रेय जैन और बौद्ध संप्रदायों को देना होगा।

जैन दर्शन

महावीर स्वामी के उपदेशों से लेकर जैन धर्म की परंपरा आज तक चल रही है। महावीर स्वामी के उपदेश 41 सूत्रों में संकलित हैं, जो जैनागमों में मिलते हैं। उमास्वाति का “तत्वार्थाधिगम सूत्र” (300 ई.) जैन दर्शन का प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्र है। सिद्धसेन दिवाकर (500 ई.), हरिभद्र (900 ई.), मेरुतुंग (14वीं शताब्दी), आदि जैन दर्शन के प्रसिद्ध आचार्य हैं। सिद्धांत की दृष्टि से जैन दर्शन एक ओर अध्यात्मवादी तथा दसरी ओर भौतिकवादी है।

वह आत्मा और पुद्गल (भौतिक तत्व) दोनों को मानता है। जैन मत में आत्मा प्रकाश के समान व्यापक और विस्तारशील है। पुनर्जन्म में नवीन शरीर के अनुसार आत्मा का संकोच और विस्तार होता है। स्वरूप से वह चैतन्य स्वरूप और आनंदमय है। वह मन और इंद्रियों के माध्यम के बिना परोक्ष विषयों के ज्ञान में समर्थ है। इस अलौकिक ज्ञान के तीन रूप हैं – अवधिज्ञान, मन:पर्याय और केवलज्ञान।

पूर्ण ज्ञान को केवलज्ञान कहते हैं।

यह निर्वाण की अवस्था में प्राप्त हाता है। यह सब प्रकार से वस्तुओं के समस्त धर्मों का ज्ञान है। यही ज्ञान “प्रमाण” है। किसी अपेक्षा से वस्तु के एक धर्म का ज्ञान “नय” कहलाता है। “नय” कई प्रकार के होते हैं। ज्ञान की सापेक्षता जैन दर्शन का सिद्धांत है। यह सापेक्षता मानवीय विचारों में उदारता और सहिष्णुता को संभव बनाती है।

सभी विचार और विश्वास आंशिक सत्य के अधिकारी बन जाते हैं। पूर्ण सत्य का आग्रह अनुचित है। वह निर्वाण में ही प्राप्त हो सकता है। निर्वाण अत्मा का कैवल्य है। कर्म के प्रभाव से पुद्गल की गति आत्मा के प्रकाश को आच्छादित करती है। यह “आस्रव” कहलाता है। यही आत्मा का बंधन है। तप, त्याग, और सदाचार से इस गति का अवरोध “संवर” तथा संचित कर्मपुद्गल का क्षय “निर्जरा” कहलाता है। इसका अंत “निर्वाण” में होता है। निर्वाण में आत्मा का अनंत ज्ञान और अनंत आनंद प्रकाशित होता है।

“बौद्ध दर्शन”

बुद्ध के उपदेश तीन पिटकों में संकलित हैं। ये सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक कहलाते हैं। ये पिटक बौद्ध धर्म के आगम हैं। क्रियाशील सत्य की धारणा बौद्ध मत की मौलिक विशेषता है। उपनिषदों का ब्रह्म अचल और अपरिवर्तनशील है। बुद्ध के अनुसार परिवर्तन ही सत्य है।पश्चिमी दर्शन में हैराक्लाइटस और बर्गसाँ ने भी परिवर्तन को सत्य माना। इस परिवर्तन का कोई अपरिवर्तनीय आधार भी नहीं है। बाह्य और आंतरिक जगत् में कोई ध्रुव सत्य नहीं है। बाह्य पदार्थ “स्वलक्षणों” के संघात हैं। आत्मा भी मनोभावों और विज्ञानों की धारा है। इस प्रकार बौद्धमत में उपनिषदों के आत्मवाद का खंडन करके “अनात्मवाद” की स्थापना की गई है। फिर भी बौद्धमत में कर्म और पुनर्जन्म मान्य हैं। आत्मा का न मानने पर भी बौद्धधर्म करुणा से ओतप्रोत हैं। दु:ख से द्रवित होकर ही बुद्ध ने संन्यास लिया और दु:ख के निरोध का उपाय खोजा। अविद्या, तृष्णा आदि में दु:ख का कारण खोजकर उन्होंने इनके उच्छेद को निर्वाण का मार्ग बताया।

अनात्मवादी होने के कारण बौद्ध धर्म का वेदांत से विरोध हुआ। इस विरोध का फल यह हुआ कि बौद्ध धर्म को भारत से निर्वासित होना पड़ा। किंतु एशिया के पूर्वी देशों में उसका प्रचार हुआ। बुद्ध के अनुयायियों में मतभेद के कारण कई संप्रदाय बन गए। जैन संप्रदाय वेदांत के समान ध्यानवादी है। इसका चीन में प्रचार है।

सिद्धांतभेद के अनुसार बौद्ध परंपरा में चार दर्शन प्रसिद्ध हैं। इनमें वैभाषिक और सौत्रांतिक मत हीनयान परंपरा में हैं। यह दक्षिणी बौद्धमत हैं। इसका प्रचार भी लंका में है। योगाचार और माध्यमिक मत महायान परंपरा में हैं। यह उत्तरी बौद्धमत है। इन चारों दर्शनों का उदय ईसा की आरंभिक शब्ताब्दियों में हुआ। इसी समय वैदिक परंपरा में षड्दर्शनों का उदय हुआ। इस प्रकार भारतीय पंरपरा में दर्शन संप्रदायों का आविर्भाव लगभग एक ही साथ हुआ है तथा उनका विकास परस्पर विरोध के द्वारा हुआ है। पश्चिमी दर्शनों की भाँति ये दर्शन पूर्वापर क्रम में उदित नहीं हुए हैं।

वसुबंधु (400 ई.), कुमारलात (200 ई.) मैत्रेय (300 ई.) औरनागार्जुन (200 ई.) इन दर्शनों के प्रमुख आचार्य थे। वैभाषिक मत बाह्य वस्तुओं की सत्ता तथा स्वलक्षणों के रूप में उनका प्रत्यक्ष मानता है। अत: उसे बाह्य प्रत्यक्षवाद अथवा “सर्वास्तित्ववाद” कहते हैं। सैत्रांतिक मत के अनुसार पदार्थों का प्रत्यक्ष नहीं, अनुमान होता है। अत: उसे बाह्यानुमेयवाद कहते हैं। योगाचार मत के अनुसार बाह्य पदार्थों की सत्ता नहीं। हमे जो कुछ दिखाई देता है वह विज्ञान मात्र है। योगाचार मत विज्ञानवाद कहलाता है। माध्यमिक मत के अनुसार विज्ञान भी सत्य नहीं है। सब कुछ शून्य है। शून्य का अर्थ निरस्वभाव, नि:स्वरूप अथवा अनिर्वचनीय है। शून्यवाद का यह शून्य वेदांत के ब्रह्म के बहुत निकट आ जाता है।

“चार्वाक दर्शन”

वेदविरोधी होने के कारण नास्तिक संप्रदायों में चार्वाक मत का भी नाम लिया जाता है। भौतिकवादी होने के कारण यह आदर न पा सका। इसका इतिहास और साहित्य भी उपलब्ध नहीं है। “बृहस्पति सूत्र” के नाम से एक चार्वाक ग्रंथ के उद्धरण अन्य दर्शन ग्रंथों में मिलते हैं। चार्वाक मत एक प्रकार का यथार्थवाद और भौतिकवाद है। इसके अनुसार एक प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। अनुमान और आगम संदिग्ध होते हैं। प्रत्यक्ष पर आश्रित भौतिक जगत् ही सत्य है। आत्मा, ईश्वर, स्वर्ग आदि सब कल्पित हैं। भूतों के संयोग से देह में चेतना उत्पन्न होती है। देह के साथ मरण में उसका अंत हो जाता है। आत्मा नित्य नहीं है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जीवनकाल में यथासंभव सुख की साधना करना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिेए।

वैदिक दर्शन परंपरा

उपनिषद काल में एक ओर बौद्ध और जैन धर्मों की अवैदिक परंपराओं का आविर्भाव हुआ तथा दूसरी ओर वैदिक दर्शनों का उदय हुआ। ईसा के जन्म के पूर्व और बाद की एक दो शताब्दियों में अनेक दर्शनों की समानांतर धाराएँ भारतीय विचारभूमि पर प्रवाहित होने लगीं। बौद्ध और जैन दर्शनों की धाराएँ भी इनमें सम्मिलित हैं। वैदिक दर्शनों में षड्दर्शन अधिक प्रसिद्ध हैं। गीतादर्शन भी इनका समकालीन है। गीता का कर्मयोग उपनिषदों के ब्रह्मवाद के बाद एक महत्वपूर्ण मौलिक दर्शन है। सभी वैदिक दर्शनों ने कर्मयोग का महत्व स्वीकार किया है। व्यावहारिक होने के कारण उसे प्रतिनिधि भारतीय जीवनदर्शन कहा जा सकता है। गीता के कर्मयोग में अध्यात्म और जीवन का अद्भुद समन्वय हुआ है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह वैदिक कर्मकांड और उपनिषदों के ब्रह्मवाद का समन्वय है। अध्यात्म और कर्म का यह समन्वय अत्यंत महत्वपूर्ण है। उपनिषदों के वेदांत तथा बौद्ध और जैन धर्म के संन्यासवाद के प्रभाव स भारतीय जनता में विरक्ति और निवृत्ति का प्रभाव इतना बढ़ रहा था कि समाज के लिए घातक बन जाता। ऐसी स्थिति में गीता ने कर्मयोग का संदेश देकर देश को एक संजीवन मंत्र प्रदान किया। अध्यात्म को स्वीकार कर गीता ने सन्यास को एक नई परिभाषा दी। “सन्यास” का सामान्य अर्थ “त्याग” है। किंतु इस त्याग में प्राय: भ्रांति हो जाती है। भोजन, शयन आदि प्राकृतिक कर्मों का त्याग किया जा सकता है। काम्य कर्मों का भी त्याग संभव है। यही गीता का संन्यास है। फल की कामना त्याग कर लोक संभव है। यही गीता का सन्यास है। फल की कामना त्याग कर लोक संग्रह के लिए निष्काम कर्म करना जीवन का आदर्श है। यही मोक्ष का साधन है। गीता का यह निष्काम कर्मयोग अधिकांश भारतीय दर्शनों ने अपनाया है। ज्ञानयोग उसका आध्यात्मिक आधार है और भक्तियोग उसका भावात्मक दर्शन है।

गीता के कर्मयोग के अतिरिक्त वैदिक दर्शनों में षड्दर्शन प्रसिद्ध हैं। ये सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा औरवेदांत के नाम से विदित है। इनके प्रणेता कपिल, पतंजलि, गौतम, कणाद, जैमिनि के बादरायण थे। ईसा के जन्म के आसपास इन दर्शनों का उदय माना जाता है। इनके आरंभिक संकेत उपनिषदों में भी मिलते हैं। प्रत्येक दर्शन का आधारग्रंथ एक दर्शनसूत्र है। “सूत्र” भारतीय दर्शन की एक अद्भुत शैली है। गिने-चुने शब्दों में सिद्धांत के सार का संकेत सूत्रों में रहता है। संक्षिप्त होने के कारण सूत्रों पर विस्तृत भाष्य और अनेक टीकाओं की रचना हुई। भारतीय दर्शन की यह शैली स्वतंत्र दर्शनग्रंथों की पश्चिमी शैली से भिन्न है। गुरु-शिष्य-परंपरा के अनुकूल दर्शन की शिक्षा और रचना इसका आधार है। यह परंपरा षड्दर्शनों के बाद नवीन दर्शनों के उदय में बाधक रही। व्याख्याओं के प्रसंग में कुछ नवीनता और मतभेद के कारण मुख्य दर्शनों में उपभेद अवश्य पैदा हो गए।

प्रमाणविचार, सृष्टिमीमांसा और मोक्षसाधना षड्दर्शनों के सामान्य विषय हैं। ये छ: दर्शन किसी न किसी रूप में आत्माको मानते हैं। आत्मा की प्राप्ति ही मोक्ष है। पुनर्जन्म, आचार, योग आदि को भी ये मानते हैं। न्याय, योग आदि कुछ दर्शन ईश्वर में विश्वास करते हैं। सांख्य और मीमांसा दर्शन निरीश्वरवादी हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द ये चार प्रमाण सामान्यत: सभी दर्शनों को मान्य हैं। मीमांसा मत में अर्थापत्ति और अनुपलब्धि ये दो प्रमाण और माने जाते हैं।

उपनिषन्मूलक होने के कारण इनमें वेदांतदर्शन सबसे अधिक प्राचीन है। किंतु ब्रह्मसूत्र में अन्य दर्शनों का खंडन है तथा उसका प्राचीनतम भाष्य आदि शंकराचार्य का है (8 वीं शताब्दी)। अन्य दर्शन सूत्रों के भाष्य ईसा की आरंभिक शताब्दियों में रचे गए। सांख्यसूत्र संभवत: लुप्त हो गया। ईश्वरकृष्ण (5वीं शताब्दी) की “सांख्यकारिका” सांख्य दर्शन का प्रामाणिक ग्रंथ है। सांख्य दर्शन निरीश्वरवादी द्वैतवाद है। इसके अनुसार प्रकृति और पुरुष दो स्वतंत्र और सनातन सत्ताएँ हैं। “प्रकृति” जड़ है और जगत् का सूक्ष्म कारण् है। वह सत्व, रजस्, और तमस् इन तीन गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। प्रकृति के साथ पुरुष का संपर्क होने से सर्ग का आरंभ होता है। सर्ग पुरुष का बंधन है। तत्वज्ञान से मोक्ष होता है। अपने शुद्ध चेतन कर्तृत्व भोक्तृत्व रहित स्वरूप के ज्ञान से पुरुष मुक्त होता है।

योग दर्शन के सिद्धांत सांख्य के समान हैं। योगसूत्र पर रचित भाष्य और टीकाएँ योगदर्शन की विस्तृत परंपरा का आधार हैं। योगदर्शन का मुख्य लक्ष्य समाधि के मार्ग को प्रशस्त करना है। समाधि में चित्त की समस्त वृत्तियों का निरोध हो जाता है। अभ्यास, वैराग्य और ध्यान योग के मुख्य साधन हैं। ईश्वर को भी ध्यान का लक्ष्य बनाया जा सकता है इतना ही योगदर्शन में ईश्वर का महत्व है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के आठ अंगों से युक्त अष्टांगयोग योग का सर्वजन सुलभ मार्ग है।

न्याय-वैशेषिक प्रमाणप्रधान दर्शन हैं। न्याय एक प्रकार का भारतीय तर्कशास्त्र है। न्यायसूत्र पर अनेक प्रसिद्ध टीकाएँ हैं। गंगेश उपाध्याय (12वीं शताब्दी) की “तत्वचिंतामणि” से नवद्वीप में नव्य न्याय की परंपरा का आरंभ हुआ। न्यायदर्शन के पहले ही सूत्र में 16 पदार्थों का उल्लेख है। इनके द्वारा तत्वज्ञान होता है जो नि:श्रेयस अथवा मोक्ष का साधन है। प्रमाणों को विशेष विस्तार न्यायदर्शन में मिलता है। ईश्वरभक्ति को न्याय में मोक्ष का साधन माना गया है। वैशेषिक दर्शन एक प्रकार से न्याय का समान तंत्र है। विशेष अथवा परमाणु उसका मुख्य विषय है। परमाणु सृष्टि का मूल उपादान कारण है। ईश्वर को न्याय-वैशेषिक-दशर्न सृष्टि का निमित्त कारण मानते हैं। वैशेषिक दर्शन में संपूर्ण सत्ता को सात पदार्थों में विभाजित किया गया है – द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव। न्याय के 16 पदार्थों की अपेक्षा अधिक संगत होने के कारण यही विभाजन आगे चलकर अधिक मान्य हुआ तथा न्याय-वैशेषिक-दर्शन की उस संयुक्त परंपरा का आधार बना जिसका प्रतिनिधित्व “न्यायमुक्तावली” आदि अर्वाचीन ग्रंथ करते हैं।

षड्दर्शनों में अंतिम दो दर्शनों को “मीमांसा” कहा जाता है। ये पूर्वमींमांसा और उत्तरमीमांसा कहलाती हैं। अन्य दर्शनों की अपेक्षा इनका वेदों से अधिक घनिष्ठ संबंध है। एक प्रकार से ये वैदिक दर्शन की व्याख्याएँ हैं। पूर्वमीमांसा, मंत्रसंहिता और ब्राह्मणों के कर्मकांड की व्याख्या है। उत्तरमीमांसा उपनिषदों के अध्यात्मदर्शन का तार्किक विवेचन है। वेदों का अंतिम भाग होने के कारण उपनिषदों को “वेदांत” कहते हैं। उत्तर मीमांसा का नाम भी “वेदांत” है। इन दोनों मीमांसाओं के सिद्धांतों का आधार वेदों में है, किंतु व्यवस्थित दर्शनों के रूप में इनका आरंभ अन्य दर्शनों के साथ साथ ही ईसा के जन्म के आसपास हुआ। इसीलिए इनकी गणना षड्दर्शनों में की जाती है। दोनों मीमांसाओं के इतिहास के तीन चरण हैं। तीनों ही चरणों में इनका विकास एक ही पूर्वोत्तर क्रम में हुआ। वैदिक युग में वेदों के पूर्वभाग (संहिता, ब्राह्मण) में कर्मकांड का विधान हुआ। वेदों के उत्तर भाग (उपनिषदों) में अध्यात्म की प्रतिष्ठा हुई। ईसा की आरंभिक शताब्दी में जैमिनि और बादरायण के “मीमांसासूत्र” तथा “ब्रह्मसूत्र” भी संभवत: इसी क्रम में रचे गए। ईसा की सातवीं शताब्दी में कुमारिल भट्ट और शंकराचार्य ने इसी पूर्वापर क्रम में पूर्व और उत्तरमीमांसाओं का उद्धार एवं प्रचार किया।

अनात्मवादी होने के कारण बौद्धदर्शन का आत्मवादी वैदिक दर्शन से विरोध है। वैदिक धर्म के विरुद्ध क्रांति के रूप में ही ईसवी पूर्व छठी शताब्दी में बौद्ध धर्म का उदय हुआ था। अनेक कारणों से ईसा की छठी शताब्दी में बौद्ध धर्म का ह्रास होने लगा। उसी समय कुमारिल और शंकराचार्य ने वैदिक धर्म के दोनों पक्षों की प्रतिष्ठा की। इनके बाद पार्थसारथि मिश्र (14वीं शताब्दी) तथा माधवचार्य (14वीं शताब्दी) न पूर्वमीमांसा दर्शन का विस्तार किया। माधवाचार्य विजयनगर के राजा वुक्का के मंत्री थे। बाद में संन्यास लेकर विद्यारण्य के नाम से श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य पद पर आसीन हुए और “पंचदशी” नामक प्रद्धि वेदांत ग्रंथ की रचना की। वेदांतमत की प्रतिष्ठा के लिए शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों पर जिन चार पीठों की स्थापना की उनमें श्रृंगेरी पीठ दक्षिण में नीलगिरि पर्वत पर स्थित है। अन्य तीन पीठ पुरी, बदरिकाश्रम और द्वारका में हैं। शंकराचार्य ने उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और गीता पर भाष्यों की रचना की। शंकराचार्य के बाद वाचस्पति मिश्र (9वीं शताब्दी), श्री हर्ष (12वं शताब्दी) आदि आचार्यों ने वेदांत परंपरा का विस्तार किया।

पूर्वमीमांसा का मुख्य लक्ष्य वैदिक कर्मकांड की व्यवस्था करना है। इसके अनुसार वेदमंत्रों का मुख्य अर्थ विधि अथवा कर्म के आदेश में है। जिन मंत्रों में विधिवाचक क्रिया नहं है वे “अर्थवाद” हैं तथा देवताओं आदि की प्ररोचना करते हैं। यदि यज्ञादि कर्म से एक दिव्य शक्ति उत्पन्न होती है जिसे “अपूर्व” कहते हैं। यही अपूर्व कर्मफल का नियामक है। पूर्वमीमांसा में ईश्वर मान्य नहीं है। वेद नित्य और अपौरुषेय हैं। नित्य शब्द का कल्प कल्प में यथापूर्व स्फोट होता है और अपूर्व की शक्ति से यथापूर्व सृष्टि की उत्पत्ति होती है। पूर्वमीमांसा की आत्मा वैशेषिक के समान चेतनातीत है। न्याय दर्शन के चर प्रमाणों के अतिरिक्त अर्थापत्ति और अनुपलब्धि दो प्रमाण और मीमांसा दर्शन में माने जाते हैं।

उत्तर मीमांसा वेदों के उत्तर भाग (उपनिषदों) पर आश्रित है। उपनिषद् वेदों के अंतिम भाग हैं, अत: वे वेदांत कहलाते हैं। उत्तर मीमांसा का अधिक प्रसिद्ध नाम “वेदांत” ही है। ब्रह्मसूत्र और उपनिषदों की व्याख्याओं के द्वारा वेदांत का विस्तार हुआ है। अनेक आचार्यों ने भिन्न भिन्न दृष्टिकोण से ब्रह्मसूत्रों और उपनिषदों की व्याख्या की है। आचार्यों के विभिन्न मतों के आधार पर वेदांत के अनेक संप्रदाय बन गए। ये अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत आदि के नाम से प्रसिद्ध हैं। वेदांत के ये संप्रदाय सांख्य आदि की भाँति दार्शनिक नहीं हैं; इन सभी संप्रदायों के धार्मिक पीठ देश के विभिन्न स्थानों में प्रतिष्ठित हैं। इन पीठों की आचार्य-परंपरा आज तक अक्षुण्ण चली आ रही है।

वेदांत के इन अनेक संप्रदायों में शंकराचार्य का अद्वैतमत सबसे प्राचीन है। यह संभवत: सबसे अधिक प्रतिष्ठित भी है। शंकराचार्य का अद्वैतवाद उपनिषदों पर आश्रित है। उनके अनुसार ब्रह्म ही एक मात्र सत्य है।

“रूपेश कान्त कौशिक”

त्रैतवाद

“त्रैतवाद”

नमस्ते जी,

ईश्वर-जीव-प्रकृति’ सिद्धांत के उद्गाता महर्षि दयानंद”

महर्षि दयानन्द ने जब उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में वैदिक धर्म का प्रचार आरम्भ किया तो उस समय त्रैतवाद की कहीं चर्चा नहीं होती थी। विद्वत जगत में आचार्य शंकर प्रोक्त अद्वैतवाद प्रतिष्ठित था जो केवल एक ईश्वर की ही सत्ता को मानता है, जीव व प्रकृति की पृथक व अनादि स्वतन्त्र सत्ता को नहीं। उन दिनों भक्तिवाद का भी जोर था जिसके अनुसार पुराणों के आधार पर प्रचलित मान्यताओं के अनुरूप मन्दिरों में जाकर भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियों के आगे वन्दन, सिर नवाना, पूजोपचार व व्रतोपवास आदि करने को ही जीवन का उद्देश्य और मनुष्य जन्म की सफलता माना जाता था। महर्षि दयानन्द ने वेद, वेदांग, उपांग, उपनिषद सहित समस्त उपलब्ध प्राचीन साहित्य का अध्ययन किया था जिससे वह जान सके कि ईश्वर का जीवात्मा और प्रकृति से पृथक स्वतन्त्र अस्तित्व हैं। ईश्वर से अतिरिक्त जीव व प्रकृति पृथक हैं, यह ईश्वर के बनाये व उसके अंश आदि नहीं हैं। जीव अनादि व चेतन तत्व है जबकि प्रकृति अनादि व जड़ तत्व है और यह दोनों ही अनेक बातों में ईश्वर के वश व नियन्त्रण में हैं। ईश्वर-जीव-प्रकृति की एक दूसरे से भिन्न पृथक व स्वतन्त्र सत्ताओं को ही त्रैतवाद के नाम से जाना जाता है। महर्षि दयानन्द जी ने अपनी इन मान्यताओं को बिना किसी की चुनौती के स्वयं ही अपने ग्रन्थों में प्रस्तुत किया है जिससे अद्वैतवाद खण्डित हो जाता है और त्रैतवाद अखण्डित रहता है वा सत्य सिद्ध होता है।

त्रैतवाद में प्रत्यक्ष-परोक्ष जितना भी संसार है, उसके मूल में तीन तत्व माने गये हैं — ईश्वर, जीव और प्रकृति । ये तीनों तत्व एकदूसरे से पूर्णरूप से भिन्न है । न कोई किसीका परिणाम है और न ही कोई किसी का विवर्त ।

वेदो में (त्रैतवाद) —

ईश्वर का स्वरूप

ईश्वर —
सत् (= जिसका अस्तित्व है, जो कल्पना नहीं है और न ही भ्रम या स्वप्न),
चित् (=चेतन है),
आनन्द (=सदा सुखी, कभी दुःखी न होने वाला),
निराकार (= आकार रहित),
सर्वशक्तिमान् (= संभवित कार्यों को बिना किसी की सहायता से करने में समर्थ),
न्यायकारी (=न्याय करने वाला),
दयालु, (प्राणी मात्र पर दया करने वाला)
अजन्मा (= जन्म रहित, जो कभी जन्म नहीं लेता),
अनंत (= १. जो कभी नष्ट नहीं होता, २. असीमित [infinite]),
निर्विकार (= विकार [परिणाम] रहित),
अनादि (न आदि = अनादि अर्थात् जिसकी शुरूआत नहीं है, जो कभी उत्पन्न नहीं होता),
अनुपम, (जिसकी कोई उपमा नहीं है अर्थात् जिसकी तुलना नहीं की जा सकती)
सर्वाधार, ( सब जड़-चेतन का आधार)
सर्वेश्वर, (सब जड़-चेतन का ईश्वर= शासक= शासन करने वाला)
सर्वव्यापक, (सर्वत्र विद्यमान)
सर्वांतर्यामी, (सब पदार्थों के अन्दर भी विद्यमान)
अजर, (न जर = कभी बूढा न होने वाला)
अमर, (कभी नष्ट न होने वाला)
अभय, (भय से रहित)
नित्य, (शाश्वत्)
पवित्र (दूषित न होने वाला)
सृष्टिकर्ता (समग्र सृष्टि का कर्त्ता = करने वाला, सृजनहार) है ।
सर्वज्ञ (सब को जानने वाला)

“ये तीनों तत्व एकदूसरे से पूर्णरूप से भिन्न है” । इसका अर्थ ये है कि इन तीनों तत्वों की अपनी स्वतंत्र सत्ता है । कोई किसी का विकार या परिणाम नहीं है ।

“जीवात्मा का स्वरूप “

सत् (= जिसका अस्तित्व है, जो कल्पना नहीं है और न ही भ्रम या स्वप्न),
चित् (=चेतन है),

अल्पज्ञ (अल्प ज्ञान वाला),
अल्पसामर्थ्य (अपने कर्मों को करने के लिये दूसरों की सहायता लेने वाला),

अनादि (न आदि = अनादि अर्थात् जिसकी शुरूआत नहीं है, जो कभी उत्पन्न नहीं होता),

अनंत ( १. जो कभी नष्ट नहीं होता, २.संख्या की दृष्टि से असंख्य है),

अजर, (न जर = कभी बूढा न होने वाला)
अमर, (कभी नष्ट न होने वाला)

नित्य, (शाश्वत्)

प्रकृति का स्वरूप —

सत् (= जिसका अस्तित्व है, जो कल्पना नहीं है और न ही भ्रम या स्वप्न),

जड़ (चेतना रहित)

अनादि (न आदि = अनादि अर्थात् जिसकी शुरूआत नहीं है, जो कभी उत्पन्न नहीं होती),

अनंत ( १. जो कभी नष्ट नहीं होती, २, सत्व-रजस्-तमस् रूप में असंख्य है),

नित्य, (शाश्वत्)

प्रकृति, सत्व-रजस्-तमस् का सामूहिक नाम (collective name) है । अर्थात् तीनों (सत्व-रजस्-तमस्) को मिलाकर प्रकृति कहते हैं । संसार में जो भी जड़ पदार्थ हैं वे इसी जड़ प्रकृति से बने हैं । ईश्वर, जीवात्मा के लिये प्रकृति से संसार बनाता है ।

१. सत्ताए तीन ही क्यों है ? चार / पांच क्यों नहीं ?

क्योंकि प्रत्यक्ष से तीन ही का अनुभव होता है । ऋषि (तत्त्व को साक्षात् करने वाले) लोगों ने भी तीन का ही उल्लेख किया है । तथा वेद में भी मूलभूत रूप में तीन का ही अस्तित्व माना गया है । इसीलिये तीन ही सत्ता मान्य है, चार-पाँच नहीं । ईश्वर के ही ब्रह्म, परमात्मा, परमेश्वर… आदि नाम हैं ।

२. ये कहासे व क्यों उत्पन्न हुई ?

ये कहीं से भी उत्पन्न नहीं हुये । तीनों शाश्वत् हैं । अनादि-अनन्त(नष्ट न होने वाले) हैं ।

३. अगर वो अनादी अनंत है तो ऐसा क्यों है ?

क्योकि इनकी उत्पत्ति का कोई उपादान कारण नहीं है । उत्पन्न वह होता है, जिसका कोई उपादान-निमित्त-साधारण कारण हो ।

उपादान-निमित्त-साधारण कारण —

उदा० आटे से रोटी का बनना । आटे से रोटी के बनने में —

रोटी का उपादान कारण — आटा है(raw material) ।

रोटी का निमित्त कारण — रोटी बनाने वाला व्यक्ति है(doer) ।

रोटी का सामान्य/साधारण कारण — रोटी बनाने में प्रयुक्त किये गये साधन, काल.. आदि हैं (instrument,time…etc) ।

ईश्वर-जीव-प्रकृति के ये तीनों कारण नहीं है, इसीलिये वे उत्पन्न नहीं होते अर्थात् वे अनादि हैं । जो उत्पन्न नहीं होता वह नष्ट भी नहीं होता । अतः वे अनन्त(नष्ट न होने वाले) भी हैं । अर्थात् वे शाश्वत् है ।

४. इसका मतलब ईश्वर तो सर्व व्यापक है उसे तो कभीभी पृथक नहीं माना जा सकता ।वो तो सत में भी मौजूद है और चितमें भी. इसलिए वह ‘सत’ और ‘चित’ का उपादान कारण कहलाता है.

मौजूद होने मात्र से कोई किसी का उपादान कारण नहीं बन जाता । जैसे कमरे में मौजूद इन्सान कमरे का उपादान कारण नहीं होता । ईश्वर, ‘सत’ और ‘चित’ का अर्थात् “प्रकृति और जीव” का उपादान कारण नहीं है ।

५. ‘ब्रह्म’ या ‘परमेश्वर’ का अस्तित्व क्यों है ?

शाश्वत् होने से ।

ज्यादा स्पष्टता के लिये निम्न लिखित प्रश्न का उत्तर आपको देना होगा—-
मैंने आपसे पूछा था — “अगर मानवीय व्यवहारों को हम चैतन्य का प्रमाण मानेंग, अगर हमें मालुम न हो की वो मानव निर्मित है,तो क्या हम उन्हें अचेत कह सकेंगे ? हमारी भावनाओं को, हमारी इच्छाओं को, हमारे ज्ञान और सुख,विश्व की इस पहेली में हम खुद ही केंद्रबिंदु है. जबतक वह वक्तव्य हमारा खुदका प्रत्यक्ष या अपरोक्ष अनुभव नहीं बनता है,खुदकी” — ये highlighted शब्द किसके लिये प्रयोग किये गये हैं ?”
तो अब आपसे एक प्रश्न है – ये “रक्ताक्षर” जिसके लिये प्रयोग किये गये हैं, उसका अस्तित्व है ? क्यों ?

६. अगर सत व चित को ईश्वर नहीं बनाता है, और अगर ये दोनों सत्ताए ईश्वर का स्वरूप भी नहीं है, तो ईश्वर की क्या भूमिका है ?
ईश्वर की भूमिका ये है कि वह जीवात्मा के लिये प्रकृति से संसार को बनाता है । संसार को बनाने में उसका अपना कुछ भी स्वार्थ नहीं है ।

७. अगर निसर्ग नियम को ईश्वर कहा गया है, तो सत व चित स्वतन्त्र कैसे है ?
निसर्ग के नियम ईश्वर नहीं हैं, किन्तु उन नियमों को बनाने वाला ईश्वर है । जब ईश्वर के लिये ‘नियम’ शब्द का प्रयोग किया जाता है, तो उसका अर्थ है – नियमों का करने वाला अर्थात् नियामक ।

“तो सत व चित स्वतन्त्र कैसे है ?” — आपका ये प्रश्न मुझे स्पष्ट नहीं हुआ है ।

८.अगर सत और चित को ईश्वर नहीं बनाता है और न ही वो ईश्वर पर निर्भर है तो वो कहासे उत्पन्न हुए ? क्यों उत्पन्न हुए ?
कहीं से भी उत्पन्न नहीं हुए । शाश्वत् है ।

९. पुनर्जन्म किसीका भी नहीं होता है. वह भी एक आभास है.
यह बात वेद और वैदिक साहित्य के अनुकूल नहीं है । पुनर्जन्म होता है और वह जीवात्मा का होता है, जीवात्मा के कर्म के अनुसार ।

१०.परन्तु मै ये मानता हुं की वेद हज़ारो सालो के लम्बे काल में हुए अनेक ऋषियोंके ज्ञान का संकलन है. वेदों का ज्ञान भी कुछ विज्ञान की तरह ही क्रमिक विकास दर्शाता है. संहिता, ब्राह्मणक, अरण्यक और उपनिषद् … जो एक एक करके विकसित होते गए, और धीरे धीरे कर्मकांड से होकर तात्विक दर्शन की ओर बढ़ते गए. इसलिए मेरा मानना ये है की वेदों में लिखा हुआ साराही ज्ञान शायद सटीक (accurate) न हो.

वेद अनेक ऋषियोंके ज्ञान का संकलन नहीं है और न ही हज़ारो सालो के लम्बे काल में हुए हैं । ब्राह्मणक, अरण्यक और उपनिषद् … आदि वेद का क्रमिक विकास नहीं है । ब्राह्मणक, अरण्यक और उपनिषद् … आदि वेद नहीं है, किन्तु वेद के व्याख्या ग्रन्थ हैं । केवल मूल संहिता वेद है । वेद में तात्विक दर्शन, कर्मकाण्ड आदि एकसाथ ही बता दिये गये हैं । वेदों को समझने वाले हम जीवात्माओं की बुद्धि सीमित होने से हम एकसाथ वेद को समझ नहीं पाते हैं । समय समय पर कोई तत्त्ववेत्ता या वैज्ञानिक आता है जो कुछ नयी बात हम=सामान्य लोगों को बता कर जाता है । अतः हमको क्रमिक विकाससा लगता है ।परंतु वह क्रमिक विकास नहीं है, किन्तु हमारा अज्ञान है, जिसके कारण हम वेदों को नहीं समझ पा रहें है ।

११. वेद हमें ऐसी क्या नयी बात बताते है की जो हमें मालुम नहीं है ?
वेद हमें मुख्य रूप से अतीन्द्रिय ज्ञान (metaphysics) कि व्यावहारिक एवं पारमार्थिक दोनों ही स्तर पर तीनों तत्वों की अपनी पृथक् सत्ता है, बताता है ।और यह ही महत्तवपूर्ण नयी बात है जो हमको मालूम नहीं है । कहीं पर भी वेद में एवं वैदिक दर्शनोमें किसी को भी भ्रम या स्वप्न या कल्पना नहीं माना गया है । वेद ईश्वर की रचना है, यह बात प्रमाण से सिद्ध होने से सब भारतीय तत्ववेत्ता इस बात पर एकमत है । वैदिक दर्शन ऋषियों की रचना है । वेद और ऋषियों का कहीं भी इस बात पर कोई मतभेद नहीं है ।

१७. वास्तविक सत्य एक ‘निरंतर अविभाज्य अस्तित्व’ है. विभिन्नता केवल आभास है. हम सब अलग अलग नहीं है. एक ही है

इतनी बात सही है कि वास्तविक सत्य ‘निरंतर अविभाज्य अस्तित्व’ है । परंतु विभिन्नता केवल आभास नहीं है, वास्तविकता है । संसार में जो विभिन्नता दिखाई दे रही है, उसका कारण जीवात्मा के विभिन्न कर्म है । जीवात्मा के द्वारा किये जाने वाले कर्म में विभिन्नता होने से सृष्टि में विभिन्नता है ।
हम सब अलग-अलग ही हैं, एक नहीं । शंकराचार्य ने भी ये बात स्वीकार की है । शब्द-प्रमाण से तो ये बात सिद्ध ही है, किन्तु प्रत्यक्ष से भी सिद्ध है । एक ही समय में होने वाली विभिन्न क्रियाएँ, घटनाएँ, जैसे कि – हँसना-रोना,खाना-पीना, जन्म लेना, मृत्यु होना, सुखी होना, दुःखी होना, एक ही समय में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न रुचियों(taste/interest) का दिखाई देना…इत्यादि जीवात्मा के अनेकत्व को सिद्ध करते हैं ।

“प्रकृति का स्वरूप”

अब देखिये प्रकृति से संसार कैसे बनता है —

कोई भी वस्तु, अपने कारण से अपने व्यक्त रूप में पहुंचने के लिये विशेष प्रक्रिया से गुजरती है । जैसे – लोहा । लोहा अपने कारण(raw-material) से लोहे रूप में आने के लिये एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरता है । फिर वही लोहा, लोहे से गाड़ी के रूप तक पहुंचने के लिये फिर एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरता है । ठीक इसी प्रकार दृश्यमान संसार भी प्रकृति से अपने वर्तमान रूप में पहुंचने के लिये एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरता है । और वह प्रक्रिया इस प्रकार है – “सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः, प्रकृतेर्महान्, महतोऽहङ्कारोऽहङ्कारात् पञ्च तन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि” । अर्थात् प्रकृति(सत्व-रजस्-तमस्) से “महत्” बनता है । उस “महत्” से “अहंकार”, “अहंकार” से “उभय-इन्द्रिय” तथा “५ तन्मात्र” बनते हैं । “उभय-इन्द्रिय” अर्थात् दो प्रकार की इन्द्रिय १. आन्तरिन्द्रिय २. बाह्य-इन्द्रिय । मन को आन्तरिन्द्रिय कहते हैं । बाह्य-इन्द्रिय भी दो प्रकार की है – १. ज्ञानेन्द्रिय २. कर्मेन्द्रिय । तो इस प्रकार “अहंकार” से १६ वस्तुएँ बनती है — मन, ५ ज्ञानेन्द्रिय(घ्राण(नासिका)-रसन-चक्षु-त्वक्-श्रोत्र), ५ कर्मेन्द्रिय (वाक्-पाणि-पाद-पायु-उपस्थ), ५ तन्मात्र(आकाश-तन्मात्र, वायु-तन्मात्र, अग्नि-तन्मात्र, जल-तन्मात्र, पृथिवी-तन्मात्र) । इन्हीं तन्मात्रों को “सूक्ष्मभूत” भी कहते हैं । इन ५ सूक्ष्मभूतों से ५ स्थूलभूत(आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथिवी) बनते हैं । और इन्हीं ५ स्थूलभूतों को विभिन्न अनुपात में मिलाने पर यह दृश्यमान संसार बनता है । इन ५ भूत से बने हुए संसार को भौतिक(=भूतों से बना हुआ) कहते हैं । अतः जो भी भौतिक है, वह अचेतन है, क्योंकि अचेतन प्रकृति से बना हुआ होने से । जब शरीर के लिये ये कहा जाता है कि “मिट्टी से बना था मिट्टी में मिल गया” तो वहाँ भी “मिट्टी” का अर्थ है “५ स्थूलभूत” । “काया पञ्चत्व में विलीन हो गयी” वाक्य में “पञ्चत्व” शब्द भी “५ स्थूलभूत” के लिये ही प्रयुक्त किया जाता है ।

[यहाँ “अहंकार” साधन(instument) है, न तु गुण(quality)] ।
अभी संसार पूरा बना नहीं है । संसार का बहुत हिस्सा तो अभी बनना बाकि है । बाकी बचा संसार आपके प्रश्न बनायेंगे । संसार की पूर्ण रचना के लिये कृपया यथाशक्ति प्रश्नों का दान करें ।

१८. अगर केवल वेदोपनिशादो को ही लिया जाए तो त्रैतवाद इन श्लोको को के बारेमे क्या कहेता है ?
1. अहम् ब्रह्मास्मि
2. सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
3. अयं आत्मा ब्रह्म
4. एकं एवाद्वितियम ब्रह्म
5. ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम….
उत्तर की शीघ्रता आप पर निर्भर है ।

“अथातो ब्रह्मजिज्ञासा”

अथातो ब्रह्म जिज्ञासा

बादरायण व्यास विरचित “ब्रह्मसूत्र

बादरायण का वक्तव्य ‘’अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’’ सर्वाधिक सशक्त वक्तव्य है, जो आज तक किसी ने नहीं दिया है। अब परम की खोज शुरू होती है। यह विश्‍व की सर्वाधिक रहस्यमय किताब है। आज तक जो किताबें लिखी गई उनमें सर्वाधिक महत्‍वूर्ण। मैं उसे विचित्र कहता हूं क्योंकि बादरायण संसार में बहुत प्रसिद्ध नहीं है। यद्यपि भारत में वे एकमात्र रहस्यदर्शी है जिनकी किताब पर हजारों टीकाएं लिखी गई है। उनका प्रत्‍येक वक्तव्य इतना अर्थ गर्भित है कह उस पर हजारों प्रकार से टीका लिखी जा सकती है। फिर भी लगता है कि कुछ पीछे शेष रह गया जो चुक नहीं सकता। यह एकमात्र किताब है जिस पर टीकाएं, और फिर उन टीकाओं पर टीकाएं लिखी गई है।

हजारों साल तक इस देश के प्रतिभाशाली लोग बादरायण से जुड़े रहे है। और फिर भी लोग उनके नाम से परिचित नहीं है। उसका यह कारण हो सकता है, कि उनके व्यक्तित्व जीवन के बारे में कोई जानकारी नहीं है। सिवाय इस किताब के। वह ऐतिहासिक व्यक्ति था या नहीं, कहना मुश्‍किल है। लेकिन एक बात पक्‍की है, जिसने भी यह किताब लिखी, उसका नाम जो भी हो, वह व्यक्ति निश्‍चित ही बहुत बड़ा रहस्यदर्शी था। फिर बादरायण कहने में क्या हर्ज है? पूरब के सभी महान सूत्र एक शब्द से शुरू होते है। अथातो याने अब। ब्रह्मसूत्र, पूरब के महानतम सूत्र, इस वचन से शुरू होते है। अथातो ब्रह्म जिज्ञासा। अब परमात्मा की खोज शुरू होती है। ‘’अब का क्या अर्थ हुआ? सिर्फ इस एक शब्द पर हजारों टिकाएं लिखी जा चुकी है।

‘’अब क्यों? क्या केवल परमात्मा की खोज लिखना काफी नहीं था? लेकिन अब.. ? उसका क्या अर्थ। मेरी अपनी व्याख्या है कि जब तक तुम ‘’अब’’ याने इस क्षण का अनुभव नहीं करते, तब तक परमात्मा की खोज शुरू नहीं कर सकते। वस्‍तुत: इस क्षण में होना ही परमात्मा की खोज शुरू करना है। मन सदा अतीत में होता है या भविष्य में होता है। अतीत अब है नहीं, और भविष्य अभी आया नहीं। और परमात्मा सदा है। परमात्मा सदा इस क्षण है। इस क्षण की खोज ही वास्तव के परमात्मा की खोज है। लेकिन यह सुत्र इतना संक्षिप्त है कि वह ‘’अब’’ की कोई व्याख्या नहीं करता। ‘’अब…’’ और समाप्त।

सूत्र का अर्थ छोटा सा बीज है। जिसमें हजारों फूल छिपे है। लेकिन उसके लिए तुम्‍हें बोना पड़ेगा। उगाना पड़ेगा, उनकी रक्षा करनी होगा। और वसंत की प्रतीक्षा करनी होगी। जैसे-जैसे तुम विकसित होते हो, पहले सूत्रमयता आती है। तुम्‍हारे वक्तव्य सूत्र बन जाते है, उसके बाद आता है परम मौन। एक शब्द भी कहना ऐसा लगता है जैसे कुछ गलत कर रहे हो। अब बहुत अर्थपूर्ण है। तुम भ्रांतियों का जीवन जी चुके हो, अब परमात्मा की खोज शुरू होती है। तुमने भौतिक सुख-दुःख, पीड़ा, समस्याएं, झेल लीं, तुम कई दिशाओं में भटक चुके हो और तुमने कुछ नहीं पाया, अब परमात्मा की खोज शुरू करो। तुम अहंकार का जीवन जी लिए। स्वार्थ का जीवन जी लिया। अब तुम थक हार गये हो। अब तुम अंत पर पहुंच चूके हो, और अब जीने के लिए कोई जमीन नहीं बची।

अब परमात्मा की खोज शुरू करो। तुमने पैसा जोड़ लिया, पद पा लिया….शोहरत पा ली, लेकिन किसी से तृप्ति नहीं हुई….अब परमात्मा की खोज शुरू करो। ‘’अब’’ बड़ा अर्थ पूर्ण है। इसका यह अर्थ नहीं है कि पुस्तक बीच में ही शुरू हुई। वह कहती है कि परमात्मा की खोज बीच में शुरू होती है।

यह बिलकुल प्रांरभ से शुरू नहीं हो सकती। वह असंभव है। बच्चा परमात्मा की खोज शुरू नहीं कर सकता। उसे पहले जीवन की खोज करनी है। उसे भटकना पड़ेगा। मनुष्य पैदा हुआ हर बच्चे को परमात्मा को खोना पड़ेगा। दूर जाना पड़ेगा। तभी…..जब अँधेरा असहनीय हो जाता है। दुःख बहुत बोझिल और दिल डूबने लगता है। तभी आदमी कुछ बिलकुल अलग करने की सोचता है। जो उसने आज तक कभी नहीं किया—‘’अब ब्रह्म की जिज्ञासा शुरू होती है।‘’
ब्रह्मसूत्र और आधुनिक मनुष्य के बीच हजारों वर्ष का फासला है। यह फासला सिर्फ समय का नहीं है, मानसिकता का भी है। मनुष्य के अंतरतम पर व्यक्तित्व की इतनी पर्तें चढ़ गई है कि उसका मूल चेहरा खो गया है। अगर कहा जाये कि ब्रह्मसूत्र मुल चेहरे की खोज है। तो गलत नहीं होगा। भारतीय अध्‍यात्‍म के आकाश में कुछ दैदीप्‍यमान सितारे है, उनमें से एक अनोखा सितारा है: बादरायण व्यास विरचित ब्रह्मसूत्र। ब्रह्मसूत्रों का प्रत्‍येक पहलू उतना ही रहस्यपूर्ण है,जितना कि स्‍वयं ब्रह्म। ब्रह्म एक ऐसी अवधारणा है जिसका भारतीय दर्शन में सर्वाधिक उपयोग किया जाता है। हो सकता है ‘’ब्रह्म’’ कुछ ऋषियों की अनुभूति रही हो, लेकिन अधिकांश लोगों के लिए तो यह महज एक शब्द है, जो उनकी सामान्‍य जिंदगी में जरा भी उपयोगी नहीं है। ब्रह्मसूत्र सदा ही अंजुरी भर विद्वानों की बपौती रही है। बल्‍कि यूं कहें कि ब्रह्मसूत्रों का अध्‍ययन किये बगैर उनकी विद्वता का प्रमाण पत्र नहीं मिलता था। इन गहन गंभीर सूत्रों के रचेता ने बादरायण व्यास। इनके समय या स्‍थान का कोई ठोस सबूत नहीं है। उस संबंध में जो भी सिद्धांत है वे अनुमान मात्र है। जो भी हो, प्राचीन भारत को ग्रंथकर्ता के नाम से कभी कोई मतलब नहीं रहा। इसलिए लेखक का नाम गौण ही रहा है।

आध्यात्मिक ग्रंथ उन ऊंचाइयों पर सर्जित होते है जहां नाम, रूप, समय सब खो जाते है। लेखक के भीतर खिला हुआ शून्‍य, ज्ञान के प्रकटन का सिर्फ दर्पण बनता है। भारतीय मनस में ब्रह्मसूत्रों की अपनी खास जगह रही है। वे न तो वेद में शुमार है, न उपनिषदों में। वे वेद अर्थात ज्ञान का अंत है। वे केवल सूत्र है जिनमें सृष्‍टि का पूरा ज्ञान समया हुआ है। वे ज्ञान के अणुबम है। दो या तीन शब्‍दों में बहुत विराट बात सहजता से कह देना भारतीय मनीषियों कि विशेषता है। इसमें ब्रह्मसूत्र अद्वितीय हे। कभी-कभी केवल दो शब्द और अव्‍यय के साथ वे बात कह देते है। उन्‍हें समझने में पूरी उम्र बीत जाती है। फिर भी कुछ पल्‍ले नहीं पड़ेगा।

ब्रह्मसूत्र वैसे लोकप्रिय नहीं है जैसे कि पंतजलि के योग सूत्र, या नारद और शांडिल्‍य के भक्‍ति सूत्र। क्योंकि उन सूत्रों में विधियां बताई गई है। करने के लिए कुछ क्रियाएं है। साधारण आदमी को कृत्‍य में रस है: कैसे? ज्ञान की कोरी चर्चा पंडितों में लोकप्रिय हो सकती है। क्योंकि उन्‍हें करना कुछ नहीं है। सिर्फ बोलना है। ब्रह्म सूत्रों में कि गई चर्चा भले ही जन साधारण की समझ से परे हो, लेकिन उनकी उतुंगता मनुष्य के सामूहिक अवचेतन में पीछे कहीं पर अटल खड़ी हुई है। वह समय के लंबे प्रवाह में निरंतर टीकाकारों को आकर्षित करती रही है।

ब्रह्मसूत्रों पर बुद्ध पुरूषों ने जितनी टीकाएं लिखी है उतनी किसी भी शास्‍त्र पर नहीं लिखी गई। आदि शंकराचार्य, रामनुजाचार्य, बल्‍लभाचार्य, निम्‍बार्क, वाचस्‍पति मिश्र, कितने ही जाग्रत पुरूषों ने ब्रह्म सूत्रों की ऊँचाई और गहराई नापने की कोशिश की है। यह घटना ठीक ऐसी है जैसे माऊंट एवेरस्‍ट पर लोग लगातार चढ़ने की कोशिश करते है। क्यों? क्योंकि उसकी अजेयता एक चुनौती बनती है। एडमंड हिलैरी ने कहा, क्योंकि वह वहां है। ब्रह्म सूत्रों की टीका लिखने के लिए भी यह कारण पर्याप्‍त है: क्योंकि वह है—अजेय, अमेय, अलंघ्‍य।

ब्रह्मसूत्रों को वेदांत दर्शन का अंग बताया जाता है। इसमें ब्रह्म के स्‍वरूप को सांगोपांग निरूपण है। इन सूत्रों की विशेषता यह है कि प्राय: सभी संप्रदायों के आचार्यों ने इनकी व्याख्या अपने मत के अनुसार की है। यह एक आश्‍चर्य है कि परस्‍पर विरोधी दर्शनों को अपने सिद्धांत का प्रतिबिंब इसमें दिखाई दिया। कितना विराट होगा इसका आशय जो सब विरोधों को अपने आलिंगन में लेकिर भी शेष रहता है। सूत्रकार ने ब्रह्मसूत्रों को चार अध्‍यायों और सोलह पादों में बांटा है।

पहला है, समन्‍वय अध्याय। इसमें व्यास मुनि विषय वस्‍तु अर्थात ब्रह्म को, अनेक उदाहरण और तर्क देकर स्थापित करते है।

दूसरा है, अविरोध अध्याय। इस अध्याय में सब प्रकार के विरोधाभासों का निराकरण किया गया।

तीसरा अध्याय परब्रह्म की प्राप्ति के लिए ब्रह्मविद्या और उपसना पंथों की चर्चा करता है। और ____

चौथे अध्याय में इन उपायों द्वारा मिलने वाले फल का वर्णन है। इसलिए उसे फलाध्याय कहते है। जैसी कि सनातन भारतीय शास्‍त्रों की शैली थी, लेखक खूद का सिद्धांत सिद्ध करने से पूर्व सभी मत-मतांतरों की खबर लेता था।

व्यास मुनि भी वहीं शैली अपनाते है। यहां पर न जाने कितने प्रचलित मतों को उल्लेख कर उनका खंडन और स्‍वयं का मंडन कर अबाध बहती हुई सलिला की भांति मस्‍ती से आगे बढ़ते है।

भारत में आध्यात्मिक विचार प्रवाह अनादि काल से बहते हुए चले आ रहे है। वे किसी एक व्यक्ति से प्रगट नहीं हुए। वे तो आकाशस्‍थ रिकार्ड में थे ही, व्यक्तियों ने उसे सिर्फ वाणी दी। परंपरा का निबाह करते हुए बादरायण व्यास ने भी प्रधान कारणवाद, अणुवाद, विज्ञानवाद, आदि सिद्धांतों की समीक्षा की। लेकिन उनके जनक किसी आचार्य का उल्‍लेख नहीं किया है। क्योंकि ज्ञान ने कभी पैदा हुआ न कभी मृत होगा। ज्ञान की इस अनादि-अनंतता की प्रतिध्‍वनि ‘’ब्रह्मसूत्र’’ जैसे ग्रंथों में सुनी जा सकती है। ब्रह्मसूत्र और आधुनिक मनुष्य के बीच हजारों वर्ष का फासला है। यह फासला सिर्फ सत्य का नहीं है, मानसिकता का भी है, मनुष्य के अंतरतम पर व्यक्तित्व की इतनी पर्तें चढ़ गई है कि उसका मूल चेहरा ही खो गया है। अगर कहां जाये की ब्रह्मसूत्र मूल चेहरे की खोज है। तो गलत न होगा।

ब्रह्म की पहचान भले ही खो गई हो ब्रह्म तो वही है; उसका नाम भर बदल गया है। वैज्ञानिक हवल ने जब ‘’expanded universe’’ फैलते हुए ब्रह्मांड का अविष्‍कार किया तो वह ब्रह्म का ही अविष्कार था। उसे हम बीसवीं सदी का ब्रह्म कह सकते है।

ब्रह्म का मूल अर्थ है: ‘’अपबृंहणात् ब्रह्म।‘’ जो फैलता जाता है उसे ब्रह्म कहते है

ऐसा नहीं है कि वि ब्रह्माण्ड प्राचीन समय में ही फैल रहा था, वह तो आज भी फैल रहा है। वैज्ञानिकों ने धर्म की और पीठ कर ली और पदार्थ में उतर गये। लेकिन जैसे ही पदार्थ की गहराई में पहुंचे, वहां पुन: प्रवेश कर गया है—(विज्ञान का हाथ थामकर, अलग नाम से अगल चेहरा लेकर।)