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आचार्य कात्यायन

आचार्य कात्यायन

• वररुचि कात्यायन पाणिनीय सूत्रों के प्रसिद्ध वार्तिककार हैं ।वररुचि कात्यायन के वार्तिक पाणिनीय व्याकरण के लिए अति महत्त्वशील सिद्ध हुए हैं ।इन वार्तिकों के बिना पाणिनीय व्याकरण अधूरा सा रह जाता है ।वार्तिकों के आधार पर ही पतंजलि ने महाभाष्य की रचना की ।कात्यायन विश्वमित्रवंशीय थे ।इनके पिता का नाम सोमदत्त था ।

कात्यायन ने श्रोत , गृह्य और प्रतिहार सूत्रों की रचना की थी ।पुरुषोत्तमदेव ने अपने ‘ त्रिकांडशेष अभिधानकोश ‘ में कात्यायन के अन्य नाम लिखे हैं – कात्य , पुनर्वसु , मेधाजित् और वररुचि ।’ कात्य ‘ नाम गोत्रप्रत्यांत है , महाभाष्य में उसका उल्लेख है ।पुनर्वसु नाम नक्षत्र सम्बन्धी है , भाषावृत्ति में पुनर्वसु को वररुचि का पर्याय कहा गया है ।मेधाजित् का कहीं अन्यत्र उल्लेख नहीं मिलता ।इसके अतिरिक्त ‘ बृहत्कथामंजरी ‘ और ‘ कथासरित्सागर ‘ में कात्यायन वररुचि का एक नाम ‘ श्रुतधर ‘ भी आया है ।हेमचन्द्र एवं मेदिनी कोशों में भी कात्यायन के ‘ वररुचि ‘ नाम का उल्लेख है ।

• वररुचि कात्यायन के वार्तिक पढ़ने पर कुछ तथ्य सामने आते हैं — यद्यपि अधिकांश स्थलों पर कात्यायन ने पाणिनीय सूत्रों का अनुवर्ती होकर अर्थ किया है .तर्क – वितर्क और आलोचना करके सूत्रों के संरक्षण की चेष्टा की है , परन्तु कहीं – कहीं सूत्रों में भी परिवर्तन किया गया है और यदा – कदा पाणिनीय सूत्रों में दोष दिखाकर उनका प्रतिषेध किया है और जहाँ – तहाँ कात्यायन को परिशिष्ट भी देने पड़े हैं ।

सम्भवत : इसी वररुचि कात्यायन ने ‘ वेदसर्वानुक्रमणी ‘ और ‘ प्रतिशाष्य ‘ की भी रचना की है ।कात्यायन के बनाए कुछ भ्राजसंज्ञक श्लोकों की चर्चा भी ‘ मद्यभाष्य ‘ में की गई है ।

आचार्य पाणिनि

आचार्य पाणिनि

• पाणिनि ( 500 ई . पू . )

आचार्य पाणिनि संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए पाणिनि का जन्म ई . पूर्व सप्तमी शताब्दी शालातुरग्राम ( पाकिस्तान के लाहौर नगर के स्थित ) में हुआ । इनकी मृत्यु त्रयोदश्यां तिथि को हुई ।

इनके प्रमुख ग्रन्थ ” अष्टाध्यायी , लिङ्गानुशासनम् , जाम्बुवतीविजियम् ‘ हैं , जिसमें आठ अध्याय और लगभग 4000 सूत्र हैं ।

संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है । अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रन्थ नहीं है । इस प्रकारान्त में तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्रण मिलता है । इनका जीवन काल 520 – 460 ई . पू . माना जाता

है ।

पाणिनि के गुरु का नाम उपवर्ष , पिता का नाम पणिन तथा माता का नाम दाक्षी था । पाणिनि के काल में शिक्षा और वाङ्गमय का बहुत विस्तार था । संस्कृत भाषा का उन्होंने बहुत गहरा अध्ययन किया था । वैदिक और लौकिक दोनों भाषाओं से वे पूर्णतया परिचित थे ।

पाणिनि ने अपने व्याकरण ग्रन्थ में लौकिक संस्कृत को ही प्रधानता दी है । पाणिनि की अष्टाध्यायी का सम्बन्ध किसी एक वेद से नहीं अपितु वेदों की परिषदों से था ।

• पाणिनि को मांगलिक आचार्य कहा गया है । उनके हृदय की उदार वृत्ति_ मंगलात्मक कर्म और फल की इच्छुक थी । इसका साक्षी यह है कि उन्होंने अपने शब्दानुशासन का आरम्भ वृद्ध शब्द से किया ।

कुछ विद्वान् कहते हैं कि पाणिनि के ग्रन्थ में न केवल आदिमंगल अपितु मध्यमंगल और अन्तमंगल भी है । उनका अन्तिम सूत्र अ आ है । ह्रस्वकार वर्णसमन्वय का मूल है । पाणिनि को सहृद्भूत आचार्य अर्थात् सबके मित्र एवं प्रमाणभूत आचार्य भी कहा गया है ।

भीष्म की प्रतिज्ञा

भीष्म की प्रतिज्ञा
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एक पौराणिक एवम रोचक शिक्षाप्रद कथा

एक बार हस्तिनापुर के महाराज प्रतीप गंगा के किनारे तपस्या कर रहे थे। उनके रूप-सौन्दर्य से मोहित हो कर देवी गंगा उनकी दाहिनी जाँघ पर आकर बैठ गईं। महाराज यह देख कर आश्चर्य में पड़ गये तब गंगा ने कहा,

“हे राजन्! मैं जह्नु ऋषि की पुत्री गंगा हूँ* और आपसे विवाह करने की अभिलाषा ले कर आपके पास आई हूँ।” इस पर महाराज प्रतीप बोले, “गंगे! तुम मेरी दहिनी जाँघ पर बैठी हो।

पत्नी को तो वामांगी होना चाहिये, दाहिनी जाँघ तो पुत्र का प्रतीक है अतः मैं तुम्हें अपने पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करता हूँ।” यह सुन कर गंगा वहाँ से चली गईं।

अब महाराज प्रतीप ने पुत्र प्राप्ति के लिये घोर तप करना आरम्भ कर दिया। उनके तप के फलस्वरूप उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होंने शान्तनु रखा। शान्तनु के युवा होने पर उसे गंगा के साथ विवाह करने का आदेश दे महाराज प्रतीप स्वर्ग चले गये।

पिता के आदेश का पालन करने के लिये शान्तनु ने गंगा के पास जाकर उनसे विवाह करने के लिये निवेदन किया। गंगा बोलीं, “राजन्! मैं आपके साथ विवाह तो कर सकती हूँ किन्तु आपको वचन देना होगा कि आप मेरे किसी भी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।”

शान्तनु ने गंगा के कहे अनुसार वचन दे कर उनसे विवाह कर लिया। गंगा के गर्भ से महाराज शान्तनु के आठ पुत्र हुये जिनमें से सात को गंगा ने गंगा नदी में ले जा कर बहा दिया और अपने दिये हुये वचन में बँधे होने के कारण महाराज शान्तनु कुछ बोल न सके।

जब गंगा का आठवाँ पुत्र हुआ और वह उसे भी नदी में बहाने के लिये ले जाने लगी तो राजा शान्तनु से रहा न गया और वे बोले, “गंगे! तुमने मेरे सात पुत्रों को नदी में बहा दिया किन्तु अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मैंने कुछ न कहा।

अब तुम मेरे इस आठवें पुत्र को भी बहाने जा रही हो। मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि कृपा करके इसे नदी में मत बहाओ।” यह सुन कर गंगा ने कहा, “राजन्! आपने अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी है इसलिये अब मैं आपके पास नहीं रह सकती।” इतना कह कर गंगा अपने पुत्र के साथ अन्तर्ध्यान हो गईं।

तत्पश्चात् महाराज शान्तनु ने छत्तीस वर्ष ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर के व्यतीत कर दिये। फिर एक दिन उन्होंने गंगा के किनारे जा कर गंगा से कहा, “गंगे! आज मेरी इच्छा उस बालक को देखने की हो रही है जिसे तुम अपने साथ ले गई थीं।”
गंगा एक सुन्दर स्त्री के रूप में उस बालक के साथ प्रकट हो गईं और बोलीं, “राजन्! यह आपका पुत्र है तथा इसका नाम देवव्रत है, इसे ग्रहण करो।

यह पराक्रमी होने के साथ विद्वान भी होगा। अस्त्र विद्या में यह परशुराम के समान होगा।” महाराज शान्तनु अपने पुत्र देवव्रत को पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुये और उसे अपने साथ हस्तिनापुर लाकर युवराज घोषित कर दिया।

एक दिन महाराज शान्तनु यमुना के तट पर घूम रहे थे कि उन्हें नदी में नाव चलाते हुये एक सुन्दर कन्या दृष्टिगत हुई। उसके अंग अंग से सुगन्ध निकल रही थी।

महाराज ने उस कन्या से पूछा, “हे देवि! तुम कौन हो?” कन्या ने बताया, “महाराज! मेरा नाम सत्यवती है और मैं निषाद कन्या हूँ।” महाराज उसके रूप यौवन पर रीझ कर तत्काल उसके पिता के पास पहुँचे और सत्यवती के साथ अपने विवाह का प्रस्ताव किया।

इस पर धींवर (निषाद) बोला, “राजन्! मुझे अपनी कन्या का आपके साथ विवाह करने में कोई आपत्ति नहीं है परन्तु आपको मेरी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र को ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाना होगा।।” निषाद के इन वचनों को सुन कर महाराज शान्तनु चुपचाप हस्तिनापुर लौट आये।

सत्यवती के वियोग में महाराज शान्तनु व्याकुल रहने लगे। उनका शरीर दुर्बल होने लगा। महाराज की इस दशा को देख कर देवव्रत को बड़ी चिंता हुई।

जब उन्हें मन्त्रियों के द्वारा पिता की इस प्रकार की दशा होने का कारण ज्ञात हुआ तो वे तत्काल समस्त मन्त्रियों के साथ निषाद के घर जा पहुँचे और उन्होंने निषाद से कहा, “हे निषाद! आप सहर्ष अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह मेरे पिता शान्तनु के साथ कर दें।

मैं आपको वचन देता हूँ कि आपकी पुत्री के गर्भ से जो बालक जन्म लेगा वही राज्य का उत्तराधिकारी होगा। कालान्तर में मेरी कोई सन्तान आपकी पुत्री के सन्तान का अधिकार छीन न पाये इस कारण से मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं आजन्म अविवाहित रहूँगा।”

उनकी इस प्रतिज्ञा को सुन कर निषाद ने हाथ जोड़ कर कहा, “हे देवव्रत! आपकी यह प्रतिज्ञा अभूतपूर्व है।” इतना कह कर निषाद ने तत्काल अपनी पुत्री सत्यवती को देवव्रत तथा उनके मन्त्रियों के साथ हस्तिनापुर भेज दिया।

देवव्रत ने अपनी माता सत्यवती को लाकर अपने पिता शान्तनु को सौंप दिया। पिता ने प्रसन्न होकर पुत्र से कहा, “वत्स! तूने पितृभक्ति के वशीभूत होकर ऐसी प्रतिज्ञा की है जैसी कि न आज तक किसी ने किया है और न भविष्य में करेगा।

मैं तुझे वरदान देता हूँ कि तेरी मृत्यु तेरी इच्छा से ही होगी। तेरी इस प्रकार की प्रतिज्ञा करने के कारण तू भीष्म कहलायेगा और तेरी प्रतिज्ञा भीष्म प्रतिज्ञा के नाम से सदैव प्रख्यात रहेगी।”
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मन के भ्रमजाल और आत्मज्ञान

व्यवहार में मन, बुद्धि और चित्त का एक सा ही प्रयोग कर देते हैं कई बार,

किन्तु तत्व देखें तो बहुत बड़ा भेद है।

प्रपञ्चसार तन्त्र के अनुसार

मन इंद्रियों की तन्मात्रा के द्वारा विषयों को ग्रहण करता है, उसका काम सङ्कल्प और विकल्प, समर्थन एवं विरोध करना है। जबकि चित्त साक्षी भाव से केवल इन विचार और संस्कारों का संरक्षण और संचय करता है, एक खजांची की भांति।

बुद्धि सङ्कल्प और विकल्प के मध्य पूर्वस्मृति के संस्कारों से प्रभावित होकर एक पक्ष का चयन करती है, निर्णय देती है।

सो परत्र दुःख पावई, सिर धुनि धुनि पछिताई …
कालहि कर्महि ईश्वरहि, मिथ्या दोष लगाई …

क्यों भाई, जब आत्मा निर्लिप्त है तो फिर कैसे ??

जीव संसार का अंश है, इसका अर्थ यह नहीं कि जीव जड़ है। अपितु संसार में क्रियाशील आत्मा को जीव भले कह दें। जैसे चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति को प्रत्याशी कह देते हैं, वही यदि परीक्षा देने जाए तो विद्यार्थी कह देते हैं, किन्तु इससे इनके मूल व्यक्तित्व या मनुष्य होने में भेद नहीं हो जाता।

एकदम सरल उत्तर है उपनिषदों में। जैसे स्फटिक के पास लाल, पीले, नीले, पुष्प या वस्त्र रखने से स्फटिक भी वैसे ही वर्ण का दिखने लगता है, वैसे ही आत्मा निर्लिप्त होने पर भी अंतःकरण में संचित संस्कारों के समीपवर्ती होने से प्रभावित दिखने लगती है। इसीलिए इस भ्रम का नाश अनिवार्य है और नाश होने पर तत्वबोध हो जाता है, फिर वह व्यक्ति कर्मबन्धन से भी मुक्त है।

इसलिए कहता है मन को निर्मल बनाओ, चित्त को शुद्ध बनाओ। क्योंकि आत्मा तो सर्वदा शुद्ध है, उसमें दूषित अंतःकरण के कारण दोष भाव दिखता है। दोष का आरोप अंतःकरण के कारण होता है, यदि ये निर्मल हो जाये तो आत्मा का निर्मलत्व भी स्वतः प्रत्यक्ष हो जाएगा।

बर्फ से ढका कोयला भी सफेद ही दिखता है और मैल से ढका दर्पण भी काला दिखता है, जो दिखता है, वह भ्रम है या सत्य ये रघुवीर जी ही कृपा करके बताते हैं। धूप उगेगी तो बर्फ पिघलेगी।

बंदउँ नाम राम रघुबर को।
हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥

भ्रूण में आत्मा गर्भाधान के समय से ही स्थित तो थी, किन्तु शरीर के अवयवों की अव्यवस्था और अपूर्णता के कारण उसकी अभिव्यक्ति सम्भव नहीं थी। जब अभिव्यक्ति सम्भव हुई, तभी जीव का प्रवेश हुआ, ऐसा मानना चाहिए। जैसे वृक्ष में भी आत्मा है, लेकिन वो बोलती नहीं, क्योंकि वो सिस्टम नहीं लगा। फ़ॉर जी सिम को साधारण फोन में लगाएंगे तो भी उसके तरंग क्रियाशील नहीं होंगे, क्योंकि सिस्टम का अभाव है।

जीवात्मा वायुमंडल से जल, जल से अन्न, अन्न से शुक्र और वहां से गर्भ में जाता अवश्य है, किन्तु उसकी मूलभूत अभिव्यक्ति हेतु जितने सिस्टम की आवश्यकता है, उसके अभाव में उद्बोधनहीन रहता है, या यूं कहें कि उसके उद्बोधन और उपस्थिति को समझने हेतु हम जिस सिस्टम के पैमाने को समझते हैं, उसका अभाव होता है, इसीलिए जब मूलभूत अंग बन जाते हैं, तब वह प्रत्यक्ष होता है।

अन्न के बीज और शुक्राणु को अलग अलग समझें। बीज में प्रत्येक बीज में जीवात्मा है, क्योंकि जल के माध्यम से अन्न के बीज में ही वह जाएगा, उसके बाद ही किसी अन्य योनि में। किन्तु शुक्राणु के साथ नहीं। शुक्राणु वही निषेचन करेगा जिसमें जीवात्मा भी हो। जैसे सौ शरीर आप नदी में डाल दें तो प्रवाह में बहेंगे सभी, लेकिन जिसमें चेतन होगा वह इच्छानुसार तैर सकता है, गंतव्य तक जा सकता है, और चेतनाहीन शरीर तभी तक सक्रिय तैरता दिखेगा जब तक प्रवाह का वेग बना हुआ है।

जैसे आप विद्यालय में शरीर से प्रवेश कर गए तो यह नहीं कहा जायेगा कि आपका विद्यालय में प्रवेश हो गया है। जब वहां नामांकन होगा, अभिव्यक्ति होगी, सक्रियता होगी, तभी कहते हैं कि विद्यालय में प्रवेश हुआ। विद्यालय के भवन में आपके शरीर का उपस्थित होना विद्यालय में वास्तविक प्रवेश नहीं कहलाता है।

ऐसे ही आत्मा तो गर्भाधान के ही समय गर्भ और फिर भ्रूण में समाहित हो जाती है, लेकिन उसका नामांकन, या सक्रियता और अभिव्यक्ति न होने से जब तीसरे या चौथे महीने में मूलभूत देह निर्माण के बाद अभिव्यक्ति होती है, तब आत्मा का प्रवेश हुआ, ऐसा कहते हैं।

यह परम्परागत गुरुमुख से ही गम्य होता है, पुस्तकें स्वयं से पढ़ भी लें तो चम्मच की भांति बुद्धि स्वादार्थ को ग्रहण नहीं करती। इसीलिए अनेकों ग्रंथों में गुरु की महिमा विशेषकर उल्लिखित है। यथा कतिपय प्रमाणावलोकन करें,

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
(गर्ग संहिता, माधुर्य खण्ड)

गुरुर्ब्रह्मा गुरु विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मादादौ तमर्चयेत्॥
(श्रीभक्तिचंद्रिका, चतुर्थ पटल)

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात्परब्रह्म मोक्षदः पावको हि सः॥
(लक्ष्मीनारायण संहिता, कृतयुगसन्तान खण्ड)

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवः सदाच्युतः ।
न गुरोरधिकः कश्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥
(योगशिखोपनिषत्)

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
(स्कन्दपुराण)

गुरुर्ब्रह्मा स्वयं विष्णुः शंभुर्नारायणो गुरुः ।
गुरुरेव परब्रह्म प्रत्यक्षो भगवान् हरिः ॥
(लक्ष्मीनारायण संहिता, कृतयुगसंतान खण्ड)

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुरेव स्वयं शिवः ।
गुरौ च सर्वदेवाश्च तिष्ठन्ति सततं मुदा ॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्णजन्म खण्ड)

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुरेव परं ब्रह्म ब्राह्मणेभ्यः प्रियः परः ॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणपति खण्ड)

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
(श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, एकादश स्कंध)

सती विधात्री इंदिरा, देखे अमित अनूप …

एक ही ब्रह्मांड है, ऐसा नहीं। अनंत ब्रह्मांड हैं। एक ही ब्रह्मा हैं, ऐसा नहीं, अनंत ब्रह्मा हैं।

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति, वेद कहैं।

शूद्र और स्त्री पुराण पाठ नहीं कर सकते, श्रवण कर सकते हैं। बृहद्धर्म पुराण में ब्राह्मण के लिए मदिरा पान और शूद्र के लिए पुराण का पाठ ब्रह्महत्या के समान बताया गया है। हां, हिंदी अनुवाद पढ़ सकते हैं, पाठ नहीं कर सकते। कोई साध्वी पतिव्रता ब्राह्मणी हो तो पाठ कर सकती है, ऐसा सम्भवतः सूत संहिता का वचन है। सदाचारी सात्विक शूद्र रामायण का पाठ कर सकता है, ऐसा वाल्मीकीय रामायण के प्रथम अध्याय के अंतिम श्लोक में वर्णित है। गोस्वामी जी ने भी जनमानस के कल्याण हेतु ही लोकभाषा में कलिमलहरणकारिणी रामकथा का विस्तार किया।

हां, यदि सात्विकता और शुद्धता का बोध हो, आस्था और समर्पण हो शास्त्रसिद्ध बातों में तो अधिकृत वक्ता से सुन भी सकते हैं, और हिंदी, बंगाली आदि प्राकृत भाषाओं में भावानुवाद पढ़ भी सकते हैं।

वर्तमान ब्रह्मा जी के अभी तो चार मुख ही बचे हैं। आगे का पता नहीं, आधी आयु में ही चार खो चुके हैं। बाकी आधी आयु में क्या होगा, कौन जाने ? कुछ होगा तो उस समय के ग्रंथों में बता दिया जाएगा।

वैसे ब्रह्मा जी के आठ मुखों की चर्चा वैष्णवागम के माहेश्वर तन्त्र में है। इसके अलावा बृहद्धर्म पुराण में अन्य ब्रह्माण्ड वाले षोडश एवं बत्तीस मुख वाले ब्रह्मा का भी वर्णन है। अंतिम तीन तो तीनों गुणों के विस्तार में लग गए जिनके फलस्वरूप त्रिगुणमयी सृष्टि हुई। पांचवां मुख वेदनिन्दा करने से रुद्रावतार भैरव जी ने काट दिया, शेष चार अभी बचे हैं।

ये अन्य ब्रह्मांड के ब्रह्मा में से कुछ पहले कुत्ता आदि की योनि में थे, गंगाजल के सानिध्य से ब्रह्मलोक के अधिपति बनने की योग्यता आयी। इधर गद्दी खाली नहीं थी इसीलिए दूसरे ब्रह्मांड में नियुक्ति मिली। वैसे भी भगवान् तो अनंतकोटिब्रह्मांडनियामक हैं ही, रोज दो चार सौ ब्रह्मांड बनाते हैं और मिटाते हैं। फिर “जेहि पद सुर सरिता परम पुनीता”, उनके चरणोदक मूल प्रकृति श्रीगंगा जी का माहात्म्य तो वर्णनातीत है।

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतो:।
धर्मो नित्यो सुख दुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः॥
(महाभारत)

कामनाओं के वशीभूत होकर, भय के कारण, लोभ से अथवा स्वयं की प्राणरक्षा हेतु भी धर्म का परित्याग न करे। धर्म नित्य शाश्वत है, सुख-दुःख आते जाते हैं, आत्मा अविनाशी है, उसकी प्रतीति का निमित्त देह आता जाता रहता है।

जीव और आत्मा को अलग अलग समझना, आत्मा परिणामी द्रव्यमस्ति, जीवः अस्तिकायस्वरुपो भवति, ये सब नास्तिकमत वाले जैन दर्शन का सिद्धांत है। आस्तिक मत वाले जीव को ही आत्मा कहते हैं।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः
(श्रीमद्भगवद्गीता)

स जीवः सोऽन्तरात्मेति गीयते तत्त्वचिन्तकैः।
(कूर्मपुराण)

हां, एक बात कह सकते हैं कि अविद्या, क्लेश, कर्मावरण युक्त होने पर चेतन जीव कहाता है और मुक्त होने पर आत्मा। किन्तु है दोनों एक ही चेतन। स्थिति भेद है, तत्वभेद नहीं। यह बात ऐसे सिद्ध होती है।

क्लेशकर्मविपाकाशयो जीवः । क्लिश्यन्त इति क्लेशाः अविद्यादयः ।
(आयुर्वेदसूत्र)

अविद्याकार्यभूतबुद्ध्युपहितं बुद्वितादात्म्यापत्रं चैतन्यं जीवः ।
(काठकोपनिषत्)

जीवः कर्मफलं भुङ्क्ते आत्मा निर्लिप्त एव च ।
आत्मनः प्रतिबिम्बं च देही जीवः स एव च ॥
(ब्रह्मवैवर्तपुराण)

जीवः तु गुणसंयुक्तः भुङ्क्ते कर्मफलान्यसौ
(उद्धवगीता)

जीवः कर्मफलं भुंक्ते तदात्मा नहि लिप्यते ।
(लक्ष्मीनारायण संहिता)

लेकिन यह तत्वचिंतन नहीं है, यह स्थितिचिन्तन है। तत्वचिंतक कहता है, जीव और आत्मा एक है।

स जीव एवेश्वरचित्स आत्मा
(योगवाशिष्ठ)

सभी तत्वों में बढ़कर जो आत्मा है, वही जीव है जो आकाश की भांति सबके ऊपर प्रकाशित है।

तेषामात्मा परो जीवः खं यथा संप्रकाशितः॥
(गौड़पादकारिका)

आत्मा ईश्वर का बिम्ब है, वैसे ही जीव भी है, इसीलिए जीव और आत्मा एक ही है।
प्रतिबिम्बो जीवः, बिम्बस्थानीय ईश्वरः
(सिद्धांतलेशसङ्ग्रह)

अयमात्मा जीवः
प्रत्यङ् आत्मा जीवः इत्यर्थः
(अलङ्कारमणिहार)

अब कौन जीव है और कौन आत्मा ? जब चेतन स्वयं को ईश्वर से भिन्न देखने लगता है तक जीव है और कर्मफल भोगता है, जब एक देखने लगता है तो आत्मा है और निर्लिप्त रहता है और जब द्रष्टा और दृश्य दोनों में एकरूपता हो जाती है तो आत्मा और परमात्मा का भेद ही नहीं रहता।

स एव जीवः प्रकृत्या स्वस्मात् ईश्वरं भिन्नत्वेन जानाति । अविद्योपाधिः सन् आत्मा जीव इत्युच्यते ॥
(तत्त्वबोध)

ब्रह्मांडपुराण के उत्तरभाग में अंतःकरण, आत्मा, जीव और प्राण, इनको पर्यायवाची बताया गया है। अर्थात् व्यवहार में आत्मा निकल गयी, प्राण चले गए, जीव प्रस्थान कर गया, आदि का अर्थ एक ही माना जाता है।

जीवः प्राणस्तथा लिङ्गं करणं च चतुष्टयम्।
पर्यायवाचकैः शब्दैरेकार्थैः सोऽभिलष्यते ॥

आयुर्वेदसूत्र के तृतीय प्रश्न में “आत्मा जीवः” एक अलग विषय ही है जिसमें आत्मा ही जीव है, यह बताया है।

लक्ष्मीनारायण संहिता के कृतयुगसन्तानखण्ड में प्रह्लाद जी राक्षस-बालकों को प्रजनन क्रिया बताते हुए कहते हैं कि वीर्य के अंदर जीवात्मा का वास बताया है, जो रज से मिलकर आगे देहादि का निर्माण करता है।

जीवात्मनाऽन्वितं वीर्यं रजोयुक्तं भवत्यथ।
रजोवीर्यात्मभिः सर्वा सूष्टिर्भवति चेतना॥

जब तक शरीर में है, तब तक देहाभिमान से युक्त होकर चेतन जीव कहाता है, बाहर निकलने पर वह आत्मा कहाता है, अथवा जीवात्मा भी कहाता है।

देही, देहाभिमानी जीवः
(मोक्षोपायटीका)

देहरूपकोशात् जीवः आत्मा इव निष्क्रमेत्
(रसरत्नसमुच्चय)

प्राणादि से युक्त आत्मा की ही जीव संज्ञा है, ऐसा तन्त्र एवं वेदों का वचन है।

गुणबद्धस्तथा जीवः प्राणापानेन कर्षति।
(योगचूड़ामण्यूपनिषत् एवं गोरक्षशतक)

सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह में जीव को बार बार मरने और जन्म लेने वाला बताया गया है

नानायोनिसहस्रेषु जायमानो मुहुर्मुहुः ।
म्रियमाणो भ्रमत्येष जीवः संसारमण्डले ॥

किन्तु यहाँ देहाभिमान से युक्त, कर्मावरण में मग्न चेतन का, जो स्वयं के ब्रह्मरूप से पृथकतावाद को धारण करता है, उसके बार बार देह परिवर्तन का ही संकेत है। वस्तुतः जब आत्मा स्वयं को देहाभिमान से ग्रस्त जानकर सुखदुःखादि का उपभोग करती है, तब उसे जीव कहते हैं, ऐसा विष्णुधर्मोत्तर पुराण का वचन है।

आत्मा जीवः स्मृतो राम यो भोक्ता सुखदुःखयोः ।

आत्मा और जीव, ये दोनों चेतन की कर्मावरण से मुक्त और युक्त स्थितियों के नाम हैं, सामान्यतः जीवात्मा भी कहते हैं और इन्हें ही वेद में क्षेत्रज्ञ कहा गया है।

जीवात्मा क्षेत्रज्ञ इति विज्ञायते ॥
(शारीरिकोपनिषत्)

मूलतः और तत्वतः जीव, आत्मा और ब्रह्म में अविभाज्य एकात्मकता है।

एवं ब्रह्मैव जीवात्मा निर्विभागो निरन्तरः।
(योगवाशिष्ठ)

किन्तु जब मैं भिन्न हूँ, यह अहंकार होता है तो वही भिन्न प्रतीत होने लगता है।

अहंकारो हि जीवात्मा
(भविष्यपुराण)

किन्तु इनसे ऊपर उठकर देखें तो परमात्मा हो, जीवात्मा हो अथवा अंतरात्मा हो, ये एक ही हैं, शाश्वत अविनाशी हैं।

जीवात्मा परमात्मा च ह्यंतरात्मा ध्रुवोऽव्ययः ॥
(गर्ग संहिता)

योऽहं जीवात्मा तद्ब्रह्म । योऽसौ परमात्मा सोऽहम्॥
(वैखानसगृह्यसूत्र)

अतएव आत्मा, जीव, जीवात्मा और परमात्मा तत्वतः एक ही हैं। ये केवल चेतन की भिन्न स्थितियों के नाम हैं।

चेतन जब निर्विकार, निर्गुण, निर्लिप्त, स्वयं के अतिरिक्त अन्य को न देखने वाला, प्रेरकभाव से रहता है तो ब्रह्म अथवा परमात्मा कहाता है।

वही चेतन जब निर्विकार, निर्गुण, निर्लिप्त, स्वयं के अतिरिक्त परमात्मा की स्थिति को देखने और भी उससे स्वयं को अलग न मानने वाला होता है, फलतः कर्मावरण से मुक्त रहता है तो आत्मा कहाता है।

वही चेतन जब विकार, गुण, लिप्तता और कर्म के आवरण के कारण स्वयं को परमात्मा की स्थिति से भिन्न मानने वाला होता है, फलतः कर्मावरण से युक्त होता है तो जीव कहाता है।

उसी चेतन की जीव और आत्मा, दोनों स्थितियों का सामूहिक बोध कराने के लिए जीवात्मा शब्द का प्रयोग होता है, अतएव उपर्युक्त चारों स्थितिचिन्तन में तत्वतः एक ही चेतन का बोध होता है।

श्रावण मास का आध्यात्मिक महत्त्व

श्रावण मास का आध्यात्मिक महत्त्व
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श्रावण अथवा सावन हिंदु पंचांग के अनुसार वर्ष का पाँचवा महीना ईस्वी कलेंडर के जुलाई या अगस्त माह में पड़ता है। इस वर्ष श्रावण मास 17 जुलाई से 15 अगस्त तक रहेगा। इसे वर्षा ऋतु का महीना या ‘पावस ऋतु’ भी कहा जाता है, क्योंकि इस समय बहुत वर्षा होती है। इस माह में अनेक महत्त्वपूर्ण त्योहार मनाए जाते हैं, जिसमें ‘हरियाली तीज’, ‘रक्षाबन्धन’, ‘नागपंचमी’ आदि प्रमुख हैं। ‘श्रावण पूर्णिमा’ को दक्षिण भारत में ‘नारियली पूर्णिमा’ व ‘अवनी अवित्तम’, मध्य भारत में ‘कजरी पूनम’, उत्तर भारत में ‘रक्षाबंधन’ और गुजरात में ‘पवित्रोपना’ के रूप में मनाया जाता है। त्योहारों की विविधता ही तो भारत की विशिष्टता की पहचान है। ‘श्रावण’ यानी सावन माह में भगवान शिव की अराधना का विशेष महत्त्व है। इस माह में पड़ने वाले सोमवार “सावन के सोमवार” कहे जाते हैं, जिनमें स्त्रियाँ तथा विशेषतौर से कुंवारी युवतियाँ भगवान शिव के निमित्त व्रत आदि रखती हैं।

महादेव को प्रिय सावन
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सावन माह के बारे में एक पौराणिक कथा है कि- “जब सनत कुमारों ने भगवान शिव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो भगवान भोलेनाथ ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के सावन महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया, जिसके बाद ही महादेव के लिए यह विशेष हो गया।इसके अतिरिक्त एक अन्य कथा के अनुसार, मरकंडू ऋषि के पुत्र मारकण्डेय ने लंबी आयु के लिए सावन माह में ही घोर तप कर शिव की कृपा प्राप्त की थी, जिससे मिली मंत्र शक्तियों के सामने मृत्यु के देवता यमराज भी नतमस्तक हो गए थे। भगवान शिव को सावन का महीना प्रिय होने का अन्य कारण यह भी है कि भगवान शिव सावन के महीने में पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे और वहां उनका स्वागत अर्घ्य और जलाभिषेक से किया गया था। माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। भू-लोक वासियों के लिए शिव कृपा पाने का यह उत्तम समय होता है।
पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी सावन मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो हलाहल विष निकला, उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की; लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसी से उनका नाम ‘नीलकंठ महादेव’ पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का ख़ास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। ‘शिवपुराण’ में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रूप में अराधना का उत्तमोत्तम फल है, जिसमें कोई संशय नहीं है।शास्त्रों में वर्णित है कि सावन महीने में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए ये समय भक्तों, साधु-संतों सभी के लिए अमूल्य होता है। यह चार महीनों में होने वाला एक वैदिक यज्ञ है, जो एक प्रकार का पौराणिक व्रत है, जिसे ‘चौमासा’ भी कहा जाता है; तत्पश्चात सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व भगवान शिव ग्रहण करते हैं। इसलिए सावन के प्रधान देवता भगवान शिव बन जाते हैं।

शिव की पूजा
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सावन मास में भगवान शंकर की पूजा उनके परिवार के सदस्यों संग करनी चाहिए। इस माह में भगवान शिव के ‘रुद्राभिषेक’ का विशेष महत्त्व है। इसलिए इस मास में प्रत्येक दिन ‘रुद्राभिषेक’ किया जा सकता है, जबकि अन्य माह में शिववास का मुहूर्त देखना पड़ता है। भगवान शिव के रुद्राभिषेक में जल, दूध, दही, शुद्ध घी, शहद, शक्कर या चीनी, गंगाजल तथा गन्ने के रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक कराने के बाद बेलपत्र, शमीपत्र, कुशा तथा दूब आदि से शिवजी को प्रसन्न करते हैं। अंत में भांग, धतूरा तथा श्रीफल भोलेनाथ को भोग के रूप में चढा़या जाता है।शिवलिंग पर बेलपत्र तथा शमीपत्र चढा़ने का वर्णन पुराणों में भी किया गया है। बेलपत्र भोलेनाथ को प्रसन्न करने के शिवलिंग पर चढा़या जाता है। कहा जाता है कि ‘आक’ का एक फूल शिवलिंग पर चढ़ाने से सोने के दान के बराबर फल मिलता है। हज़ार आक के फूलों की अपेक्षा एक कनेर का फूल, हज़ार कनेर के फूलों को चढ़ाने की अपेक्षा एक बिल्व पत्र से दान का पुण्य मिल जाता है। हज़ार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोण या गूमा फूल फलदायी होते हैं। हज़ार गूमा के बराबर एक चिचिड़ा, हज़ार चिचिड़ा के बराबर एक कुश का फूल, हज़ार कुश फूलों के बराबर एक शमी का पत्ता, हज़ार शमी के पत्तों के बराकर एक नीलकमल, हज़ार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा और हज़ार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है।

बेलपत्र
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भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे सरल तरीका उन्हें ‘बेलपत्र’ अर्पित करना है। बेलपत्र के पीछे भी एक पौराणिक कथा का महत्त्व है। इस कथा के अनुसार- “भील नाम का एक डाकू था। यह डाकू अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए लोगों को लूटता था। एक बार सावन माह में यह डाकू राहगीरों को लूटने के उद्देश्य से जंगल में गया और एक वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया। एक दिन-रात पूरा बीत जाने पर भी उसे कोई शिकार नहीं मिला। जिस पेड़ पर वह डाकू छिपा था, वह बेल का पेड़ था। रात-दिन पूरा बीतने पर वह परेशान होकर बेल के पत्ते तोड़कर नीचे फेंकने लगा। उसी पेड़ के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था। जो पत्ते वह डाकू तोडकर नीचे फेंख रहा था, वह अनजाने में शिवलिंग पर ही गिर रहे थे। लगातार बेल के पत्ते शिवलिंग पर गिरने से भगवान शिव प्रसन्न हुए और अचानक डाकू के सामने प्रकट हो गए और डाकू को वरदान माँगने को कहा। उस दिन से बिल्व-पत्र का महत्ता और बढ़ गया।

सावन सोमवार का महत्त्व
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श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को शिव के निमित्त व्रत किए जाते हैं। इस मास में शिव जी की पूजा का विशेष विधान हैं। कुछ भक्त तो पूरे मास ही भगवान शिव की पूजा-आराधना और व्रत करते हैं। अधिकांश व्यक्ति केवल श्रावण मास में पड़ने वाले सोमवार का ही व्रत करते हैं। श्रावण मास के सोमवारों में शिव के व्रतों, पूजा और शिव जी की आरती का विशेष महत्त्व है। शिव के ये व्रत शुभदायी और फलदायी होते हैं। इन व्रतों को करने वाले सभी भक्तों से भगवान शिव बहुत प्रसन्न होते हैं। यह व्रत भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए किये जाते हैं। व्रत में भगवान शिव का पूजन करके एक समय ही भोजन किया जाता है। व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान कर ‘शिव पंचाक्षर मन्त्र’ का जप करते हुए पूजन करना चाहिए।सावन के महीने में सोमवार महत्वपूर्ण होता है। सोमवार का अंक 2 होता है, जो चन्द्रमा का प्रतिनिधित्व करता है। चन्द्रमा मन का संकेतक है और वह भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है। ‘चंद्रमा मनसो जात:’ यानी ‘चंद्रमा मन का मालिक है’ और उसके नियंत्रण और नियमण में उसका अहम योगदान है। यानी भगवान शंकर मस्तक पर चंद्रमा को नियंत्रित कर उक्त साधक या भक्त के मन को एकाग्रचित कर उसे अविद्या रूपी माया के मोहपाश से मुक्त कर देते हैं। भगवान शंकर की कृपा से भक्त त्रिगुणातीत भाव को प्राप्त करता है और यही उसके जन्म-मरण से मुक्ति का मुख्य आधार सिद्ध होता है।

काँवर
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ऐसी मान्यता है कि भारत की पवित्र नदियों के जल से अभिषेक किए जाने से शिव प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं। ‘काँवर’ संस्कृत भाषा के शब्द ‘कांवांरथी’ से बना है। यह एक प्रकार की बहंगी है, जो बाँस की फट्टी से बनाई जाती है। ‘काँवर’ तब बनती है, जब फूल-माला, घंटी और घुंघरू से सजे दोनों किनारों पर वैदिक अनुष्ठान के साथ गंगाजल का भार पिटारियों में रखा जाता है। धूप-दीप की खुशबू, मुख में ‘बोल बम’ का नारा, मन में ‘बाबा एक सहारा।’ माना जाता है कि पहला ‘काँवरिया’ रावण था। श्रीराम ने भी भगवान शिव को कांवर चढ़ाई थी।

हरियाली तीज
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सावन का महीना प्रेम और उत्साह का महीना माना जाता है। इस महीने में नई-नवेली दुल्हन अपने मायके जाकर झूला झूलती हैं और सखियों से अपने पिया और उनके प्रेम की बातें करती है। प्रेम के धागे को मजबूत करने के लिए इस महीने में कई त्योहार मनाये जाते हैं। इन्हीं में से एक त्योहार है- ‘हरियाली तीज’। यह त्योहार हर साल श्रावण माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस त्योहार के विषय में मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए तपस्या की थी।इससे प्रसन्न होकर शिव ने ‘हरियाली तीज’ के दिन ही पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इस त्योहार के विषय में यह मान्यता भी है कि इससे सुहाग की उम्र लंबी होती है।
कुंवारी कन्याओं को इस व्रत से मनचाहा जीवन साथी मिलता है। हरियाली तीज में हरी चूड़ियां, हरा वस्त्र और मेंहदी का विशेष महत्व है। मेंहदी सुहाग का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। इसलिए महिलाएं सुहाग पर्व में मेंहदी जरूर लगाती हैं। इसकी शीतल तासीर प्रेम और उमंग को संतुलन प्रदान करने का भी काम करती है। माना जाता है कि मेंहदी बुरी भावना को नियंत्रित करती है। हरियाली तीज का नियम है कि क्रोध को मन में नहीं आने दें। मेंहदी का औषधीय गुण इसमें महिलाओं की मदद करता है। सावन में पड़ने वाली फुहारों से प्रकृति में हरियाली छा जाती है। सुहागन स्त्रियां प्रकृति की इसी हरियाली को अपने ऊपर समेट लेती हैं। इस मौके पर नई-नवेली दुल्हन को सास उपहार भेजकर आशीर्वाद देती है। कुल मिलाकर इस त्योहार का आशय यह है कि सावन की फुहारों की तरह सुहागनें प्रेम की फुहारों से अपने परिवार को खुशहाली प्रदान करेंगी और वंश को आगे बढ़ाएँगी।

वर्षा का मौसम
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सावन के महीने में सबसे अधिक बारिश होती है, जो शिव के गर्म शरीर को ठंडक प्रदान करती है। भगवान शंकर ने स्वयं सनतकुमारों को सावन महीने की महिमा बताई है कि मेरे तीनों नेत्रों में सूर्य दाहिने, बांये चन्द्रमा और अग्नि मध्य नेत्र है। जब सूर्य कर्क राशि में गोचर करता है, तब सावन महीने की शुरुआत होती है। सूर्य गर्म है, जो ऊष्मा देता है, जबकि चंद्रमा ठंडा है, जो शीतलता प्रदान करता है। इसलिए सूर्य के कर्क राशि में आने से झमाझम बारिस होती है, जिससे लोक कल्याण के लिए विष को पीने वाले भोलेनाथ को ठंडक व सुकून मिलता है। इसलिए शिव का सावन से इतना गहरा लगाव है।

सावन और साधना
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सावन और साधना के बीच चंचल और अति चलायमान मन की एकाग्रता एक अहम कड़ी है, जिसके बिना परम तत्व की प्राप्ति असंभव है। साधक की साधना जब शुरू होती है, तब मन एक विकराल बाधा बनकर खड़ा हो जाता है। उसे नियंत्रित करना सहज नहीं होता। लिहाजा मन को ही साधने में साधक को लंबा और धैर्य का सफर तय करना होता है। इसलिए कहा गया है कि मन ही मोक्ष और बंधन का कारण है। अर्थात मन से ही मुक्ति है और मन ही बंधन का कारण है। भगवान शंकर ने मस्तक में ही चंद्रमा को दृढ़ कर रखा है, इसीलिए साधक की साधना बिना किसी बाधा के पूर्ण होती है।
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साहित्य और समाज का संबंध

साहित्य और समाज

साहित्य समाज का दर्पण है, समाज का प्रतिबिम्ब है, समाज का मार्गदर्शक है तथा समाज का लेखा-जोखा है। किसी भी राष्ट्र या सभ्यता की जानकारी उसके साहित्य से प्राप्त होती है। साहित्य लोकजीवन का अभिन्न अंग है। किसी भी काल के साहित्य से उस समय की परिस्थितियों, जनमानस के रहन-सहन, खान-पान व अन्य गतिविधियों का पता चलता है। समाज साहित्य को प्रभावित करता है और साहित्य समाज पर प्रभाव डालता है। दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। साहित्य का समाज से वही संबंध है, जो संबंध आत्मा का शरीर से होता है। साहित्य समाज रूपी शरीर की आत्मा है। साहित्य अजर-अमर है महान विद्वान योननागोची के अनुसार समाज नष्ट हो सकता है, राष्ट्र भी नष्ट हो सकता है, किन्तु साहित्य का नाश कभी नहीं हो सकता।

साहित्य संस्कृत के ’सहित’ शब्द से बना है। संस्कृत के विद्वानों के अनुसार साहित्य का अर्थ है- “हितेन सह सहित तस्य भवः” अर्थात कल्याणकारी भाव. कहा जा सकता है कि साहित्य लोककल्याण के लिए ही सृजित किया जाता है। साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन करना मात्र नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य समाज का मार्गदर्शन करना भी है।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में-

केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए

उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए

महान साहित्यकारों ने साहित्य को लेकर अपने विचार व्यक्त किए हैं। बीसवीं शताब्दी के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य को ‘जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब’ माना है।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य को ‘ज्ञानराशि का संचित कोशकहा है। पंडित बाल कृष्ण भट्ट साहित्य को ‘जन समूह के हृदय का विकास’ मानते हैं।

प्राचीन काल में भारतीय सभ्यता अति समृद्ध थी। हमारी सभ्यता इतनी उन्नत थी कि हम आज भी उस पर गर्व करते हैं।

किसी भाषा के वाचिक और लिखित सामग्री को साहित्य कह सकते हैं। विश्व में प्राचीन वाचिक साहित्य आदिवासी भाषाओं में प्राप्त होता है।

भारतीय संस्कृत साहित्य ऋग्वेद से प्रारंभ होता है। व्यास, वाल्मीकि जैसे पौराणिक ऋषियों ने महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों की रचना की। भास, कालिदास एवं अन्य कवियों ने संस्कृत में नाटक लिखे, साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

भक्त साहित्य में अवधी में गोस्वामी तुलसीदास, बृज भाषा में सूरदास, मारवाड़ी में मीरा बाई, खड़ीबोली में कबीर, रसखान, मैथिली में विद्यापति आदि प्रमुख हैं। जिस राष्ट्र और समाज का साहित्य जितना अधिक समृद्ध होगा, वह राष्ट्र और समाज भी उतना ही समृद्ध होगा। किसी राष्ट्र और समाज की स्थिति जाननी हो, तो उसका साहित्य देखना चाहिए।

मानव सभ्यता के विकास में साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

विचारों ने साहित्य को जन्म दिया तथा साहित्य ने मानव की विचारधारा को गतिशीलता प्रदान की, उसे सभ्य बनाने का कार्य किया।

मानव की विचारधारा में परिवर्तन लाने का कार्य साहित्य द्वारा ही किया जाता है। इतिहास साक्षी है कि किसी भी राष्ट्र या समाज में आज तक जितने भी परिवर्तन आए, वे सब साहित्य के माध्यम से ही आए।

साहित्यकार समाज में फैली कुरीतियों, विसंगतियों, विकॄतियों, अभावों, विसमताओं, असमानताओं आदि के बारे में लिखता है, इनके प्रति जनमानस को जागरूक करने का कार्य करता है। साहित्य जनहित के लिए होता है। जब सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों का पतन होने लगता है, तो साहित्य जनमानस मार्गदर्शन करता है।

मानव को जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन के हर क्षेत्र में समाज की आवश्यकता पड़ती है। मानव समाज का एक अभिन्न अंग है। जीवन में मानव के साथ क्या घटित होता है, उसे साहित्यकार शब्दों में रचकर साहित्य की रचना करता है, अर्थात साहित्यकार जो देखता है, अनुभव करता है, चिंतन करता है, विश्लेषण करता है, उसे लिख देता है. साहित्य सृजन के लिए विषयवस्तु समाज के ही विभिन्न पक्षों से ली जाती है। साहित्यकार साहित्य की रचना करते समय अपने विचारों और कल्पना को भी सम्मिलित करता है।

वर्तमान में मीडिया समाज के लिए मज़बूत कड़ी साबित हो रहा है. समाचार-पत्रों की प्रासंगिकता सदैव रही है और भविष्य में भी रहेगी।

मीडिया में परिवर्तन युगानुकूल है, जो स्वाभाविक है, लेकिन भाषा की दृष्टि से समाचार-पत्रों में गिरावट देखने को मिल रही है। इसका बड़ा कारण यही लगता है कि आज के परिवेश में समाचार-पत्रों से साहित्य लुप्त हो रहा है, जबकि साहित्य को समृद्ध करने में समाचार-पत्रों की महती भूमिका रही है, परंतु आज समाचार-पत्रों ने ही स्वयं को साहित्य से दूर कर लिया है, जो अच्छा संकेत नहीं है।

आज आवश्यकता है कि समाचार-पत्रों में साहित्य का समावेश हो और वे अपनी परंपरा को समृद्ध बनाएं. वास्तव में पहले के संपादक समाचार-पत्र को साहित्य से दूर नहीं मानते थे, बल्कि त्वरित साहित्य का दर्जा देते थे. अब न उस तरह के संपादक रहे, न समाचार-पत्रों में साहित्य के लिए स्थान। साहित्य मात्र साप्ताहिक छपने वाले सप्लीमेंट्‌स में सिमट गया है। समाचार-पत्रों से साहित्य के लुप्त होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि अब समाचार-पत्रों में संपादक का दायित्व ऐसे लोग निभा रहे हैं, जिनका साहित्य से कभी कोई सरोकार नहीं रहा। समाचार-पत्रों के मालिकों को ऐसे संपादक चाहिएं, जो उन्हें मोटी धनराशि कमाकर दे सकें। समाचार-पत्रों को अधिक से अधिक विज्ञापन दिला सकें, राजनीतिक गलियारे में उनकी पहुंच बढ़ सके।

इस सबके बीच कुछ समाचार-पत्र ऐसे भी हैं, जो साहित्य को संजोए हुए हैं। साहित्य की अनेक पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, परंतु उनके पास पर्याप्त संसाधन न होने के कारण उन्हें आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साहित्य ने सदैव राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का कार्य किया है। साहित्य जनमानस को सकारात्मक सोच तथा लोककल्याण के कार्यों के लिए प्रेरणा देने का कार्य करता है. साहित्य के विकास की कहानी मानव सभ्यता के विकास की गाथा है, इसलिए यह अति आवश्यक है कि साहित्य लेखन निरंतर जारी रहना चाहिए, अन्यथा सभ्यता का विकास अवरुद्ध हो जाएगा

अन्धकार है वहां, जहां आदित्य नहीं है।

मुर्दा है वह देश, जहांसाहित्य नहीं हैं।।

राजा विक्रमादित्य के नवरत्न

अकबर के नौरत्नों से इतिहास भर दिया, पर महाराजा विक्रमादित्य के नवरत्नों की कोई चर्चा पाठ्यपुस्तकों में नहीं है !
जबकि सत्य यह है कि अकबर को महान सिद्ध करने के लिए महाराजा विक्रमादित्य की नकल करके कुछ धूर्तों ने इतिहास में लिख दिया कि अकबर के भी नौ रत्न थे ।

राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों को जानने का प्रयास करते हैं …✍️

राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों के विषय में बहुत कुछ पढ़ा-देखा जाता है। लेकिन बहुत ही कम लोग ये जानते हैं कि आखिर ये नवरत्न थे कौन-कौन।

राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका देश-विदेश में बजता था। चलिए जानते हैं कौन थे।

ये हैं नवरत्न –

1–धन्वन्तरि-

नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है।

2–क्षपणक-

जैसा कि इनके नाम से प्रतीत होता है, ये बौद्ध संन्यासी थे।
इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि प्राचीन काल में मन्त्रित्व आजीविका का साधन नहीं था अपितु जनकल्याण की भावना से मन्त्रिपरिषद का गठन किया जाता था। यही कारण है कि संन्यासी भी मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते थे।
इन्होंने कुछ ग्रंथ लिखे जिनमें ‘भिक्षाटन’ और ‘नानार्थकोश’ ही उपलब्ध बताये जाते हैं।

3–अमरसिंह-

ये प्रकाण्ड विद्वान थे। बोध-गया के वर्तमान बुद्ध-मन्दिर से प्राप्य एक शिलालेख के आधार पर इनको उस मन्दिर का निर्माता कहा जाता है। उनके अनेक ग्रन्थों में एक मात्र ‘अमरकोश’ ग्रन्थ ऐसा है कि उसके आधार पर उनका यश अखण्ड है। संस्कृतज्ञों में एक उक्ति चरितार्थ है जिसका अर्थ है ‘अष्टाध्यायी’ पण्डितों की माता है और ‘अमरकोश’ पण्डितों का पिता। अर्थात् यदि कोई इन दोनों ग्रंथों को पढ़ ले तो वह महान् पण्डित बन जाता है।

4–शंकु –

इनका पूरा नाम ‘शङ्कुक’ है। इनका एक ही काव्य-ग्रन्थ ‘भुवनाभ्युदयम्’ बहुत प्रसिद्ध रहा है। किन्तु आज वह भी पुरातत्व का विषय बना हुआ है। इनको संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान् माना गया है।

5–वेतालभट्ट –

विक्रम और वेताल की कहानी जगतप्रसिद्ध है। ‘वेताल पंचविंशति’ के रचयिता यही थे, किन्तु कहीं भी इनका नाम देखने सुनने को अब नहीं मिलता। ‘वेताल-पच्चीसी’ से ही यह सिद्ध होता है कि सम्राट विक्रम के वर्चस्व से वेतालभट्ट कितने प्रभावित थे। यही इनकी एक मात्र रचना उपलब्ध है।

6–घटखर्पर –

जो संस्कृत जानते हैं वे समझ सकते हैं कि ‘घटखर्पर’ किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता। इनका भी वास्तविक नाम यह नहीं है। मान्यता है कि इनकी प्रतिज्ञा थी कि जो कवि अनुप्रास और यमक में इनको पराजित कर देगा उनके यहां वे फूटे घड़े से पानी भरेंगे। बस तब से ही इनका नाम ‘घटखर्पर’ प्रसिद्ध हो गया और वास्तविक नाम लुप्त हो गया।

इनकी रचना का नाम भी ‘घटखर्पर काव्यम्’ ही है। यमक और अनुप्रास का वह अनुपमेय ग्रन्थ है।
इनका एक अन्य ग्रन्थ ‘नीतिसार’ के नाम से भी प्राप्त होता है।

7–कालिदास –

ऐसा माना जाता है कि कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के प्राणप्रिय कवि थे। उन्होंने भी अपने ग्रन्थों में विक्रम के व्यक्तित्व का उज्जवल स्वरूप निरूपित किया है। कालिदास की कथा विचित्र है। कहा जाता है कि उनको देवी ‘काली’ की कृपा से विद्या प्राप्त हुई थी। इसीलिए इनका नाम ‘कालिदास’ पड़ गया। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कालीदास होना चाहिए था किन्तु अपवाद रूप में कालिदास की प्रतिभा को देखकर इसमें उसी प्रकार परिवर्तन नहीं किया गया जिस प्रकार कि ‘विश्वामित्र’ को उसी रूप में रखा गया।

जो हो, कालिदास की विद्वता और काव्य प्रतिभा के विषय में अब दो मत नहीं है। वे न केवल अपने समय के अप्रितम साहित्यकार थे अपितु आज तक भी कोई उन जैसा अप्रितम साहित्यकार उत्पन्न नहीं हुआ है। उनके चार काव्य और तीन नाटक प्रसिद्ध हैं। शकुन्तला उनकी अन्यतम कृति मानी जाती है।

8–वराहमिहिर –

भारतीय ज्योतिष-शास्त्र इनसे गौरवास्पद हो गया है। इन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इनमें-‘बृहज्जातक‘, सुर्यसिद्धांत, ‘बृहस्पति संहिता’, ‘पंचसिद्धान्ती’ मुख्य हैं। गणक तरंगिणी’, ‘लघु-जातक’, ‘समास संहिता’, ‘विवाह पटल’, ‘योग यात्रा’, आदि-आदि का भी इनके नाम से उल्लेख पाया जाता है।

9–वररुचि- कात्यायन

कालिदास की भांति ही वररुचि भी अन्यतम काव्यकर्ताओं में गिने जाते हैं। ‘सदुक्तिकर्णामृत’, ‘सुभाषितावलि’ तथा ‘शार्ङ्धर संहिता’, इनकी रचनाओं में गिनी जाती हैं।
इनके नाम पर मतभेद है। क्योंकि इस नाम के तीन व्यक्ति हुए हैं उनमें से-

1.पाणिनीय व्याकरण के वार्तिककार-वररुचि कात्यायन,

2.‘प्राकृत प्रकाश के प्रणेता-वररुचि
3.सूक्ति ग्रन्थों में प्राप्त कवि- वररुचि

संस्कृत शिक्षण भाग -1

Hello world!

Let us try to learn how to use simple words, by using them in simple sentences.

संस्कृत भाषा शिक्षणे भवताम् सर्वेषाम हार्दम स्वागतम्।
नमो नमः।
संस्कृतम् अत्यंतम् सरला भाषा।
संस्कृते संभाषणम् इतोपि सरलम्।
वयम सर्वे अपि स्वल्पेण प्रयत्नेन नित्य जीवने संस्कृतस्य उपयोगम् कर्त्तुम शक्नुवः।
आगच्छन्तु।

वयम् एदानीम संस्कृत संभाषणस्य अभ्यासम् कुर्मः।

आरम्भे मम परिचय वदामि।

मम नाम गजेन्द्रः।
भवतः नाम किम्? (पु.)
भवत्याः नाम किम्?(स्त्री.)
उत्तिष्ठतु। वदतु। मम नाम किम?
मम नाम लक्ष्मीः/श्रीः/लता/रमा/प्रीति/प्रभा/स्वाति।
मम नाम रामः/श्यामः/राजेन्द्रः।

भवतः नाम गजेन्द्रः।
समीचीनम्।

भवत्याः नाम किम?
मम नाम रज्य लक्ष्मी।
न राज्य लक्ष्मीः।
मम नाम राज्य लक्ष्मीः।
बहु समीचीनम्।
संस्कृतेण प्रथ परिचयः करणीयः इति भवंतः ज्ञातवंतः।
उत्तिष्ठतु। आगच्छंतु।
सः उदयनः। सः शशिधरः।
सः कः।

सः उदयनः। सः शशिधरः।

उत्तमम्।
अभिनयम् कुर्वंतु। वदंतु।
सः श्री अरविन्दः। सा श्रीमाँ।
सः कः। सा का।

सः श्री अरविन्दः। सा श्रीमाँ।

सः कः।सा का।
सः रामः।सा प्रिया।

का श्री माँ। सा श्री माँ।

तत् फलम्। तत् पुस्तकम्। तत् कृष्णफलकम्।

तत् किम्। किम् पुस्तकम्।

किम् वातायनम्।

एषः मंजुनाथः। सः उदयनः।
एषः कः। सः कः।
एषा प्रिया। सा श्रीमाँ।
एषा का। सा का।
एतत् पुस्तकम्/उपनेत्रम्/कङ्कतम्।
तत् कृष्णफलकम्/फलम्।
एतत् किम्। तत किम्। एषः(पु.)/एषा(स्त्री.लि.)/एतत(नपु.लि.)- लग वस्तुक हेतु।
सः/सा/तत- दूर वस्तुक हेतु।

इदानीम् अहम् एकम् एकं वस्तुं दर्शयामि। एतत किम्।

तत उपनेत्रम। तत पर्णम्।
इदानीम भवंतः एकम् एकं वस्तुं दर्शयतु। एतत किम्? एतत किम्? पृच्छतु।

तत युतकम्- (अंगा)।

पेन- लेखनी। पेंसिल- अङ्कणी।
एतेषाम् शब्दानाम अभ्यासं कृतवंतः। एतेषाम् उपयोगः कथम् करणीयः इत्यपि भवंतः ज्ञातवंतः।

फलम्/लेखनी/चशकः/जलम्/धनस्युतः अस्ति।
धनम् नास्ति।

श्री अरविन्दः कुत्र अस्ति।
सर्वत्र अस्ति।
युतकम् कुत्र अस्ति।
अत्र अस्ति।
वायुः सर्वत्र अस्ति।
जलम् कुत्र अस्ति।
अन्यत्र अस्ति।
भवतः वाहनः कुत्र अस्ति।
तत्र अस्ति।

Word Meaning Pronunciation Example sentence Translation How to read Audio Comment
मम my mama मम नाम अलेक्षः। My name is Alex mama naama alexaha [swf file=””] naama = name
भवतः your (masculine) bhavataha भवतः नाम किम्?(पुरुषम् अधिकृत्य) What is your name? (Masculine) bhavataha naama kim? kim=what
भवत्याः your (feminine) bhavatyaha भवत्याः नाम किम्?(स्त्रीम् अधिकृत्य) What is your name? (Feminine) bhavatyaha naama kim?

So we have learnt how to speak very simple sentences in Sanskrit. See, it is not hard at all! For all the introductory lessons, we will aim to provide the pronunciation both in English alphabets as well as in audio. That way you would not have to get intimidated by the prospect of learning a new alphabet to begin with. To begin with, focus will be on learning the words, making simple sentences and learning simple rules of grammar.

अँधविश्वास दूर भगाएं

😊😊पाखंड की पोल खोल😊😊

👉हम बिजली के तार के संपर्क में जिस समय आते हैं, बिजली का करंट हमें उसी समय लगता है।
👉 हम जिस समय अपना हाथ आग में डालते हैं, हमारा हाथ उसी समय जलता है।
👉 हमें जिस समय कोई मारता है, चोट उसी समय लगती है, दर्द उसी समय होता है।
👉 किसी को जहर दे दिया जाय तो जहर का असर उसी समय शुरू हो जाता है।
👉 किसी बीमार को दवाई दिया जाता है तो दवाई का असर उसी समय शुरू होता है।
👉 कोई हमें गुदगुदी करे (लगाए) तो गुदगुदी का असर उसी समय होता है। ईत्यादि ईत्यादि।

👉 मगर पूजा पाठ, भक्ति करके जब हम देवी-देवता, भगवान को खुश करके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, तो उस आशीर्वाद का असर उसी समय शुरू क्यों नहीं होता है ?
👉 लक्ष्मीजी की पूजा करने के बाद हम धनवान क्यों नहीं होने लगते हैं ?
👉 सरस्वतीजी की पूजा करने के बाद हम विद्वान क्यों नहीं बनने लगते हैं ?
👉 हनुमानजी की पूजा करने के बाद हम बलशाली क्यों नहीं बनने लगते हैं ?
👉 गणपतिजी की पूजा करने के बाद हमें रिद्धि सिद्धि क्यों नहीं प्राप्त हो जाती है ?
👉 सत्यनारायण कथा के बाद हमारे सारे दुख क्यों नहीं समाप्त हो जाते हैं ?
👉 महामृत्युंजय मंत्र, गायत्रीमंत्र के जाप करने से हमारे सारे रोग, विकार क्यों नहीं दूर होते हैं ? मँहगे डॉक्टर से ईलाज करवाने की क्यों पड़ती है ?
👉 किसी से आशीर्वाद (वरदान) मिलने पर उसका असर तुरंत क्यों नहीं शुरू होता है ?
👉 किसी के अभिशाप देने से हमारे ऊपर उसका असर तुरंत क्यों नहीं शुरू होता है ?

👉 मामला साफ है – दुनियाँ में देवी-देवता, भगवान, आत्मा, भूत-प्रेत, स्वर्ग-नरक, अभिशाप-वरदान ईत्यादि कुछ होता हीं नहीं है। जो चीज है हीं नहीं उसका असर कैसे हो सकता है ?

मगर गुलाम मानसिकता वाले लोगों को लाख समझाओ, उनके कुछ पल्ले पड़ना नहीं।

विषमतावादियों ने तुम्हारे मेहनत पसीने की कमाई को धुर्तता से हड़प करने के लिए तुम्हारे सामने पाखंड रच रखा है।

बुद्ध की शिक्षाओं को अपनायें। देवी-देवता, भगवान, आत्मा, स्वर्ग नरक, भूत प्रेत जैसी बिना मतलब की (काल्पनिक) बातों में अपना धन, ऊर्जा और बहुमूल्य समय बर्बाद न करें।

दिमाग की बत्ती जलाओ!
अँधविश्वास दूर भगाओ !

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मकर संक्रांति

खगोलीय तथ्य

सन 2012 में मकर संक्रांति 15 जनवरी यानी रविवार की थी। राजा हर्षवर्द्धन के समय में यह पर्व 24 दिसम्बर को पड़ा था। मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल में 10 जनवरी को मकर संक्रांति थी। शिवाजी के जीवन काल में यह त्योहार 11 जनवरी को पड़ा था। आखिर ऐसा क्यों? सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने को ‘मकर संक्रांति’ कहा जाता है। साल 2012 में यह 14 जनवरी की मध्यरात्रि में था। इसलिए उदय तिथि के अनुसार मकर संक्रांति 15 जनवरी को पड़ी थी। दरअसल हर साल सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश 20 मिनट की देरी से होता है। इस तरह हर तीन साल के बाद सूर्य एक घंटे बाद और हर 72 साल में एक दिन की देरी से मकर राशि में प्रवेश करता है। मतलब 1728 (72 गुणा 24) साल में फिर सूर्य का मकर राशि में प्रवेश एक दिन की देरी से होगा और इस तरह 2080 के बाद ‘मकर संक्रांति’ 15 जनवरी को पड़ेगी। ज्योतिषीय आकलन दालें ज्योतिषीय आकलन के अनुसार सूर्य की गति प्रतिवर्ष 20 सेकेंड बढ़ रही है। माना जाता है कि आज से 1000 साल पहले मकर संक्रांति 31 दिसंबर को मनाई जाती थी। पिछले एक हज़ार साल में इसके दो हफ्ते आगे खिसक जाने की वजह से 14 जनवरी को मनाई जाने लगी। अब सूर्य की चाल के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 5000 साल बाद मकर संक्रांति फ़रवरी महीने के अंत में मनाई जाएगी।

संक्रांति का अर्थ
‘संक्रान्ति’ का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना, अत: वह राशि जिसमें सूर्य प्रवेश करता है, संक्रान्ति की संज्ञा से विख्यात है। राशियाँ बारह हैं, यथा मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक , धनु, मकर, कुम्भ, मीन। मलमास पड़ जाने पर भी वर्ष में केवल 12 राशियाँ होती है।

प्रत्येक संक्रान्ति पवित्र दिन के रूप में ग्राह्य है। मत्स्यपुराण ने संक्रान्ति व्रत का वर्णन किया है। एक दिन पूर्व व्यक्ति (नारी या पुरुष) को केवल एक बार मध्याह्न में भोजन करना चाहिए और संक्रान्ति के दिन दाँतों को स्वच्छ करके तिल युक्त जल से स्नान करना चाहिए।

व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी संयमी ब्राह्मण गृहस्थ को भोजन सामग्रियों से युक्त तीन पात्र तथा एक गाय यम, रुद्र एवं धर्म के नाम पर दे और चार श्लोकों को पढ़े, जिनमें से एक यह है-

‘यथा भेदं’ न पश्यामि शिवविष्ण्वर्कपद्मजान्। तथा ममास्तु विश्वात्मा शंकर:शंकर: सदा।।

अर्थात् ‘मैं शिव एवं विष्णु तथा सूर्य एवं ब्रह्मा में अन्तर नहीं करता, वह शंकर, जो विश्वात्मा है, सदा कल्याण करने वाला है। दूसरे शंकर शब्द का अर्थ है- शं कल्याणं करोति। यदि हो सके तो व्यक्ति को चाहिए कि वह ब्राह्मण को आभूषणों, पर्यंक, स्वर्णपात्रों (दो) का दान करे। यदि वह दरिद्र हो तो ब्राह्मण को केवल फल दे। इसके उपरान्त उसे तैल-विहीन भोजन करना चाहिए और यथा शक्ति अन्य लोगों को भोजन देना चाहिए।

स्त्रियों को भी यह व्रत करना चाहिए। संक्रान्ति, ग्रहण, अमावस्या एवं पूर्णिमा पर गंगा स्नान महापुण्यदायक माना गया है और ऐसा करने पर व्यक्ति ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।

प्रत्येक संक्रान्ति पर सामान्य जल (गर्म नहीं किया हुआ) से स्नान करना नित्यकर्म कहा जाता है, जैसा कि देवीपुराण) में घोषित है- ‘जो व्यक्ति संक्रान्ति के पवित्र दिन पर स्नान नहीं करता वह सात जन्मों तक रोगी एवं निर्धन रहेगा; संक्रान्ति पर जो भी देवों को हव्य एवं पितरों को कव्य दिया जाता है, वह सूर्य द्वारा भविष्य के जन्मों में लौटा दिया जाता है

पुण्यकाल मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग बेचने वाला प्राचीन ग्रंथ में ऐसा लिखित है कि केवल सूर्य का किसी राशि में प्रवेश मात्र ही पुनीतता का द्योतक नहीं है, प्रत्युत सभी ग्रहों का अन्य नक्षत्र या राशि में प्रवेश पुण्यकाल माना जाता है।

हेमाद्रि एवं काल निर्णय ने क्रम से जैमिनि एवं ज्योति:शास्त्र से उद्धरण देकर सूर्य एवं ग्रहों की संक्रान्ति का पुण्यकाल को घोषित किया है- ‘सूर्य के विषय में संक्रान्ति के पूर्व या पश्चात् 16 घटिकाओं का समय पुण्य समय है; चन्द्र के विषय में दोनों ओर एक घटी 13 फल पुण्यकाल है; मंगल के लिए 4 घटिकाएँ एवं एक पल; बुध के लिए 3 घटिकाएँ एवं 14 पल, बृहस्पति के लिए चार घटिकाएँ एवं 37 पल, शुक्र के लिए 4 घटिकाएँ एवं एक पल तथा शनि के लिए 82 घटिकाएँ एवं 7 पल। सूर्य जब एक राशि छोड़कर दूसरी में प्रवेश करता है तो उस काल का यथावत् ज्ञान हमारी माँसल आँखों से सम्भव नहीं है, अत: संक्रान्ति की 30 घटिकाएँ इधर या उधर के काल का द्योतन करती हैं। सूर्य का दूसरी राशि में प्रवेश काल इतना कम होता है कि उसमें संक्रान्ति कृत्यों का सम्पादन असम्भव है, अत: इसकी सन्निधि का काल उचित ठहराया गया है।

देवीपुराण में संक्रान्ति काल की लघुता का उल्लेख यों है- ‘स्वस्थ एवं सुखी मनुष्य जब एक बार पलक गिराता है तो उसका तीसवाँ काल ‘तत्पर’ कहलाता है, तत्पर का सौवाँ भाग ‘त्रुटि’ कहा जाता है तथा त्रुटि के सौवें भाग में सूर्य का दूसरी राशि में प्रवेश होता है। सामान्य नियम यह है कि वास्तविक काल के जितने ही समीप कृत्य हो वह उतना ही पुनीत माना जाता है।’ इसी से संक्रान्तियों में पुण्यतम काल सात प्रकार के माने गये हैं- 3, 4, 5, 7, 8, 9 या 12 घटिकाएँ। इन्हीं अवधियों में वास्तविक फल प्राप्ति होती है। यदि कोई इन अवधियों के भीतर प्रतिपादित कृत्य न कर सके तो उसके लिए अधिकतम काल सीमाएँ 30 घटिकाओं की होती हैं; किंतु ये पुण्यकाल-अवधियाँ षडशीति एवं विष्णुपदी को छोड़कर अन्य सभी संक्रान्तियों के लिए है।

‘ मकर संक्रांति मनाते लोग आज के ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जाड़े का अयन काल 21 दिसम्बर को होता है और उसी दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। किंतु भारत में वे लोग, जो प्राचीन पद्धतियों के अनुसार रचे पंचांगों का सहारा लेते हैं, उत्तरायण का आरम्भ 14 जनवरी से मानते हैं। वे इस प्रकार उपयुक्त मकर संक्रान्ति से 23 दिन पीछे हैं। मध्यकाल के धर्मशास्त्र ग्रंथों में यह बात उल्लिखित है, यथा हेमाद्रि ने कहा है कि प्रचलित संक्रान्ति से 12 दिन पूर्व ही पुण्यकाल पड़ता है, अत: प्रतिपादित दान आदि कृत्य प्रचलित संक्रान्ति दिन के 12 दिन पूर्व भी किये जा सकते हैं।
पुण्यकाल के नियम संक्रान्ति के पुण्यकाल के विषय में सामान्य नियम के प्रश्न पर कई मत हैं। शातातप, जाबाल एवं मरीचि ने संक्रान्ति के धार्मिक कृत्यों के लिए संक्रान्ति के पूर्व एवं उपरान्त 16 घटिकाओं का पुण्यकाल प्रतिपादित किया है; किंतु देवीपुराण एवं वसिष्ठ ने 15 घटिकाओं के पुण्यकाल की व्यवस्था दी है। यह विरोध यह कहकर दूर किया जाता है कि लघु अवधि केवल अधिक पुण्य फल देने के लिए है और 16 घटिकाओं की अवधि विष्णुपदी संक्रान्तियों के लिए प्रतिपादित है। संक्रान्ति दिन या रात्रि दोनों में हो सकती है। दिन वाली संक्रान्ति पूरे दिन भर पुण्यकाल वाली होती है। रात्रि वाली संक्रान्ति के विषय में हेमाद्रि, माधव आदि में लम्बे विवेचन उपस्थित किए गये हैं। एक नियम यह है कि दस संक्रान्तियों में, मकर एवं कर्कट को छोड़कर पुण्यकाल दिन में होता है, जबकि वे रात्रि में पड़ती हैं। इस विषय का विस्तृत विवरण तिथितत्त्व और धर्मसिंधु में मिलता है। ग्रहों की संक्रान्ति मकर संक्रांति के अवसर पर रंगोली बनाते हुए ग्रहों की भी संक्रान्तियाँ होती हैं, किन्तु पश्चात्कालीन लेखकों के अनुसार ‘संक्रान्ति’ शब्द केवल रवि-संक्रान्ति के नाम से ही द्योतित है, जैसा कि स्मृतिकौस्तुभ में उल्लिखित है। वर्ष भर की 12 संक्रान्तियाँ चार श्रेणियों में विभक्त हैं- दो अयन संक्रान्तियाँ- मकर संक्रान्ति, जब उत्तरायण का आरम्भ होता है एवं कर्कट संक्रान्ति, जब दक्षिणायन का आरम्भ होता है। दो विषुव संक्रान्तियाँ अर्थात् मेष एवं तुला संक्रान्तियाँ, जब रात्रि एवं दिन बराबर होते हैं। वे चार संक्रान्तियाँ, जिन्हें षडयीतिमुख अर्थात् मिथुन, कन्या, धनु एवं मीन कहा जाता है तथा विष्णुपदी या विष्णुपद अर्थात् वृषभ, सिंह, वृश्चिक एवं कुम्भ नामक संक्रान्तियाँ।

संक्रांति के प्रकार ‘ये बारह संक्रान्तियाँ सात प्रकार की, सात नामों वाली हैं, जो किसी सप्ताह के दिन या किसी विशिष्ट नक्षत्र के सम्मिलन के आधार पर उल्लिखित हैं; वे ये हैं- मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी एवं मिश्रिता। घोरा रविवार, मेष या कर्क या मकर संक्रान्ति को, ध्वांक्षी सोमवार को, महोदरी मंगल को, मन्दाकिनी बुध को, मन्दा बृहस्पति को, मिश्रिता शुक्र को एवं राक्षसी शनि को होती है। इसके अतिरिक्त कोई संक्रान्ति यथा मेष या कर्क आदि क्रम से मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी, मिश्रित कही जाती है, यदि वह क्रम से ध्रुव, मृदु, क्षिप्र, उग्र, चर, क्रूर या मिश्रित नक्षत्र से युक्त हों।

27 या 28 नक्षत्र निम्नोक्त रूप से सात दलों में विभाजित हैं-

ध्रुव (या स्थिर) – उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी मृदु – अनुराधा, चित्रा, रेवती, मृगशीर्ष

क्षिप्र (या लघु) – हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित उग्र – पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी, मघा

चर – पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, स्वाति , शतभिषक

क्रूर (या तीक्ष्ण) – मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा मिश्रित (या मृदुतीक्ष्ण या साधारण) – कृत्तिका, विशाखा।

ऐसा उल्लिखित है कि
ब्राह्मणों के लिए मन्द,

क्षत्रियों के लिए मन्दाकिनी,

वैश्यों के लिए ध्वांक्षी,

शूद्रों के लिए घोरा,

चोरों के लिए महोदरी, मद्य विक्रेताओं के लिए राक्षसी तथा चाण्डालों, पुक्कसों तथा जिनकी वृत्तियाँ (पेशे) भयंकर हों एवं अन्य शिल्पियों के लिए मिश्रित संक्रान्ति श्रेयस्कर होती है।

संक्रान्ति का देवीकरण आगे चलकर संक्रान्ति का देवीकरण हो गया और वह साक्षात्‌ दुर्गा कही जाने लगी। देवीपुराण में आया है कि देवी वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, दिन आदि के क्रम से सूक्ष्म विभाग के कारण सर्वगत विभु रूप वाली है। देवी पुण्य तवं पाप के विभागों के अनुसार फल देने वाली है।

संक्रान्ति के काल में किये गये एक कृत्य से भी कोटि-कोटि फलों की प्राप्ति होती है। धर्म से आयु, राज्य, पुत्र, सुख आदि की वृद्धि होती है, अधर्म से व्याधि, शोक आदि बढ़ते हैं। विषुव संक्रान्ति के समय जो दान या जप किया जाता है या अयन में जो सम्पादित होता है, वह अक्षय होता है।

यही बात विष्णुपद एवं षडशीति मुख के विषय में भी है।तिल के लड्डू आजकल के पंचांगों में मकर संक्रान्ति का देवीकरण भी हो गया है। वह देवी मान ली गयी है। संक्रान्ति किसी वाहन पर चढ़ती है, उसका प्रमुख वाहन हाथी जैसे वाहन पशु हैं; उसके उपवाहन भी हैं; उसके वस्त्र काले, श्वेत या लाल आदि रंगों के होते हैं; उसके हाथ में धनुष या शूल रहता है, वह लाह या गोरोचन जैसे पदार्थों का तिलक करती है; वह युवा, प्रौढ़ या वृद्ध है; वह खड़ी या बैठी हुई वर्णित है; उसके पुष्पों, भोजन, आभूषणों का उल्लेख है; उसके दो नाम सात नामों में से विशिष्ट हैं; वह पूर्व आदि दिशाओं से आती है और पश्चिम आदि दिशाओं को चली जाती है और तीसरी दिशा की ओर झाँकती है; उसके अधर झुके हैं, नाक लम्बी है, उसके 9 हाथ है।

उसके विषय में अग्र सूचनाएँ ये हैं-

संक्रान्ति जो कुछ ग्रहण करती है, उसके मूल्य बढ़ जाते हैं या वह नष्ट हो जाता है; वह जिसे देखती है, वह नष्ट हो जाता है, जिस दिशा से वह जाती है, वहाँ के लोग सुखी होते हैं, जिस दिशा को वह चली जाती है, वहाँ के लोग दुखी हो जाते हैं।
संक्रांति पर दान पुण्य पूर्व पुण्यलाभ के लिए पुण्यकाल में ही स्नान दान आदि कृत्य किये जाते हैं। सामान्य नियम यह है कि रात्रि में न तो स्नान किया जाता है और न ही दान। पराशर में आया है कि सूर्य किरणों से पूरे दिन में स्नान करना चाहिए, रात्रि में ग्रहण को छोड़कर अन्य अवसरों पर स्नान नहीं करना चाहिए। यही बात विष्णुधर्मसूत्र में भी है। किंतु कुछ अपवाद भी प्रतिपादित हैं। भविष्यपुराण [31] में आया है कि रात्रि में स्नान नहीं करना चाहिए, विशेषत: रात्रि में दान तो नहीं ही करना चाहिए, किंतु उचित अवसरों पर ऐसा किया जा सकता है, यथा ग्रहण, विवाह, संक्रान्ति, यात्रा, जनन, मरण तथा इतिहास श्रवण में। अत: प्रत्येक संक्रान्ति पर विशेषत: मकर संक्रान्ति पर स्नान नित्य कर्म है। दान निम्न प्रकार के किये जाते हैं- मेष में भेड़, वृषभ में गायें,

मिथुन में वस्त्र, भोजन एवं पेय पदार्थ,

कर्क में घृत,धेनु,

सिंह में सोने के साथ वाहन,

कन्या में वस्त्र एवं गौएँ, नाना प्रकार के अन्न एवं बीज,

तुला-वृश्चिक में वस्त्र एवं घर,

धनु में वस्त्र एवं वाहन,

मकर में इन्घन एवं अग्नि,

कुम्भ में गौएँ जल एवं घास,

मीन में नये पुष्प।

अन्य विशेष प्रकार के दानों के विषय में देखिए स्कन्दपुराण , विष्णुधर्मोत्तर, कालिका आदि।

उपवास मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग उडाते हुए, वाराणसी मकर संक्रान्ति के सम्मान में तीन दिनों या एक दिन का उपवास करना चाहिए। जो व्यक्ति तीन दिनों तक उपवास करता है और उसके उपरान्त स्नान करके अयन पर सूर्य की पूजा करता है, विषुव एवं सूर्य या चन्द्र के ग्रहण पर पूजा करता है तो वह वांछित इच्छाओं की पूर्णता पाता है।

आपस्तम्ब में आया है कि जो व्यक्ति स्नान के उपरान्त अयन, विषुव, सूर्यचंद्र-ग्रहण पर दिन भर उपवास करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। किंतु पुत्रवान व्यक्ति को रविवार, संक्रान्ति एवं ग्रहणों पर उपवास नहीं करना चाहिए। राजमार्तण्ड में संक्रान्ति पर किये गये दानों के पुण्य-लाभ पर दो श्लोक हैं- ‘अयन संक्रान्ति पर किये गये दानों का फल सामान्य दिन के दान के फल का कोटिगुना होता है और विष्णुपदी पर वह लक्षगुना होता है; षडशीति पर यह 86000 गुना घोषित हैं।

चंद्र ग्रहण पर दान सौ गुना एवं सूर्य ग्रहण पर सहस्त्र गुना, विषुव पर शतसहस्त्र गुना तथा आकामावै की पूर्णिमा पर अनन्त फलों को देने वाला है। भविष्यपुराण ने अयन एवं विषुव संक्रान्तियों पर गंगा-यमुना की प्रभूत महत्ता गायी है।

नारी द्वारा दान मकर संक्रान्ति पर अधिकांश में नारियाँ ही दान करती हैं। वे पुजारियों को मिट्टी या ताम्र या पीतल के पात्र, जिनमें सुपारी एवं सिक्के रहते हैं, दान करती हैं और अपनी सहेलियों को बुलाया करती हैं तथा उन्हें कुंकुम, हल्दी, सुपारी, ईख के टुकड़े आदि से पूर्ण मिट्टी के पात्र देती हैं।

दक्षिण भारत में पोंगल नामक उत्सव होता है, जो उत्तरी या पश्चिमी भारत में मनाये जाने वाली मकर संक्रान्ति के समान है।

पोंगल तमिल वर्ष का प्रथम दिवस है। यह उत्सव तीन दिनों का होता है। पोंगल का अर्थ है ‘क्या यह उबल रहा’ या ‘पकाया जा रहा है?’ संक्रांति पर श्राद्ध कुछ लोगों के मत से संक्रान्ति पर श्राद्ध करना चाहिए।

विष्णु धर्मसूत्र में आया है-

‘आदित्य अर्थात् सूर्य के संक्रमण पर अर्थात् जब सूर्य एक राशि से दूसरी में प्रवेश करता है, दोनों विषुव दिनों पर, अपने जन्म-नक्षत्र पर विशिष्ट शुभ अवसरों पर काम्य श्राद्ध करना चाहिए; इन दिनों के श्राद्ध से पितरों को अक्षय संतोष प्राप्त होता है। यहाँ पर भी विरोधी मत हैं।

शूलापाणि के मत से संक्रान्ति-

श्राद्ध में पिण्डदान होना चाहिए, किंतु निर्णयसिंधु के मत से श्राद्ध पिण्डविहीन एवं पार्वण की भाँति होना चाहिए। संक्रान्ति पर कुछ कृत्य वर्जित भी थे।

विष्णुपुराण में वचन है-

‘चतुर्दशी, अष्टमी, अमावस्या, पूर्णिमा एवं संक्रान्ति पर्व कहे गये हैं; जो व्यक्ति ऐसे अवसर पर संभोग करता है, तैल एवं मांस खाता है, वह विष्मूत्र-भोजन’ नामक नरक में पड़ता है।

ब्रह्मपुराण में आया है-

अष्टमी, पक्षों के अंत की तिथियों में, रवि-संक्रान्ति के दिन तथा पक्षोपान्त (चतुर्दशी) में संभोग, तिल-मांस-भोजन नहीं करना चाहिए।

आजकल मकर संक्रान्ति धार्मिक कृत्य की अपेक्षा सामाजिक अधिक है। उपवास नहीं किया जाता, कदाचित कोई श्राद्ध करता हो, किंतु बहुत से लोग समुद्र या प्रयाग जैसे तीर्थों पर गंगा स्नान करते हैं। तिल का प्रयोग अधिक होता है, विशेषत: दक्षिण में।

तिल की महत्ता यों प्रदर्शित है

‘जो व्यक्ति तिल का प्रयोग छ: प्रकार से करता है वह नहीं डूबता अर्थात् वह असफल या अभागा नहीं होता; शरीर को तिल से नहाना, तिल से उवटना, सदा पवित्र रहकर तिलयुक्त जल देना, अग्नि में तिल डालना, तिल दान करना एवं तिल खाना।

सूर्य प्रार्थना संस्कृत प्रार्थना के अनुसार

“हे सूर्य देव, आपका दण्डवत प्रणाम, आप ही इस जगत् की आँखें हो। आप सारे संसार के आरम्भ का मूल हो, उसके जीवन व नाश का कारण भी आप ही हो।”

सूर्य का प्रकाश जीवन का प्रतीक है। चन्द्रमा भी सूर्य के प्रकाश से आलोकित है। वैदिक युग में सूर्योपासना दिन में तीन बार की जाती थी।

महाभारत में पितामह भीष्म ने भी सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपना प्राणत्याग किया था। हमारे मनीषी इस समय को बहुत ही श्रेष्ठ मानते हैं। इस अवसर पर लोग पवित्र नदियों एवं तीर्थ स्थलों पर स्नान कर आदिदेव भगवान सूर्य से जीवन में सुख व समृद्धि हेतु प्रार्थना व याचना करते हैं।

मान्यता यह विश्वास किया जाता है कि इस अवधि में देहत्याग करने वाले व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से पूर्णत: मुक्त हो जाते हैं।

महाभारत महाकाव्य में वयोवृद्ध योद्धा पितामह भीष्म पांडवों और कौरवों के बीच हुए कुरुक्षेत्र युद्ध में सांघातिक रूप से घायल हो गये थे। उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। पांडव वीर अर्जुन द्वारा रचित बाणशैया पर पड़े भीष्म उत्तरायण अवधि की प्रतीक्षा करते रहे। उन्होंने सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर ही अंतिम सांस ली, जिससे उनका पुनर्जन्म न हो। तिल तिल संक्राति देश भर में लोग मकर संक्रांति के पर्व पर अलग-अलग रूपों में तिल, चावल, उड़द की दाल एवं गुड़ का सेवन करते हैं। इन सभी सामग्रियों में सबसे ज़्यादा महत्व तिल का दिया गया है। इस दिन कुछ अन्य चीज़ भले ही न खाई जाएँ, किन्तु किसी न किसी रूप में तिल अवश्य खाना चाहिए।

इस दिन तिल के महत्व के कारण मकर संक्रांति पर्व को “तिल संक्राति” के नाम से भी पुकारा जाता है। तिल के गोल-गोल लड्डू इस दिन बनाए जाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई है तथा उपरोक्त उत्पादों का प्रयोग सभी प्रकार के पापों से मुक्त करता है; गर्मी देता है और शरीर को निरोग रखता है। मंकर संक्रांति में जिन चीज़ों को खाने में शामिल किया जाता है, वह पौष्टिक होने के साथ ही साथ शरीर को गर्म रखने वाले पदार्थ भी हैं।

सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती है, उस अवधि को “सौर वर्ष” कहते हैं।

पृथ्वी का गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना “क्रान्तिचक्र” कहलाता है। इस परिधि चक्र को बाँटकर बारह राशियाँ बनी हैं।

सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना “संक्रान्ति” कहलाता है। इसी प्रकार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को “मकर संक्रान्ति” कहते हैं।

मकर संक्राति के अवसर पर गंगा स्नान करते श्रद्धालु सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना ‘उत्तरायण’ तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना ‘दक्षिणायन’ है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं तथा रातें छोटी होने लगती हैं। दक्षिणायन में ठीक इसके विपरीत होता है। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन देवताओं की रात होती है। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता था।

मकर संक्रान्ति के दिन यज्ञ में दिये हव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएँ शरीर छोड़कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसलिए यह आलोक का अवसर माना जाता है। इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अनन्य महत्त्व है और सौ गुणा फलदायी होकर प्राप्त होता है।

मकर संक्रान्ति प्रत्येक वर्ष प्रायः 14 जनवरी को पड़ती है। टीका टिप्पणी और संदर्भ ↑ बिहार राज्य का एक व्यंजन, जो चूड़ा चावल से बनाया जाता है।

↑ रवे: संक्रमणं राशौ संक्रान्तिरिति कथ्यते। स्नानदानतप:श्राद्धहोमादिषु महाफला।। नागरखंड (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 410); मेषादिषु द्वादशराशिषु क्रमेण सञ्चरत: सूर्यस्य पूर्वस्माद्राशेरुत्तरराशौ संक्रमणं प्रवेश: संक्रान्ति। अतस्तद्राशिनामपुर:सरं सा संक्रान्तिर्व्यपदिश्यते। काल निर्णय, रवे: संक्रमणं राशौ संक्रान्तिरिति कथ्यते। स्नानदानतप:श्राद्धहोमादिषु महाफला।। नागरखंड (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 410); मेषादिषु द्वादशराशिषु क्रमेण सञ्चरत: सूर्यस्य पूर्वस्माद्राशेरुत्तरराशौ संक्रमणं प्रवेश: संक्रान्ति। अतस्तद्राशिनामपुर:सरं सा संक्रान्तिर्व्यपदिश्यते। काल निर्णय, पृष्ठ 331। ↑ मत्स्यपुराण, अध्याय 98 ↑ मत्स्यपुराण, 98|17 ↑ संक्रान्त्यां पक्षयोरन्ते ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो:। गंगास्नातो नर: कामाद् ब्रह्मण: सदनं व्रजेत्।। ↑

पञ्चसिद्धान्तिका (3|23-24, पृष्ठ 9) ने परिभाषा दी है- ‘मेषतुलादौ विषुवत् षडशीतिमुखं तुलादिभागेषु। षडशीतिमुखेषु रवे: पितृदिवसा येऽवशेषा: स्यु:।। षडशीतिमुखं कन्याचतुर्दशेऽष्टादशे च मिथुनस्य। मीनस्य द्वार्विशे षडविशे कार्मुकस्यांशे।। तुला आदिर्यस्या: सा तुलादि: कन्या। द्वादशैव भवन्त्येषां द्विज नामानि मे श्रृणु। एकं विष्णुपदं नाम षडशीतिमुखं तथा।। विषुवं च तृतीयं च अन्ये द्वे दक्षिणोत्तरे।। कुम्भालिगोहरिषु विष्णुपदं वदन्ति स्त्रीचापमीनमिथुने षडशीतिवक्त्रम्। अर्कस्य सौम्यमयनं शशिधाम्नि याम्यमृक्षे झषे विषुवति त्वजतौलिनो: स्यात्।। ब्रह्मवैवर्त (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 407) । कुछ शब्दों की व्याख्या आवश्यक है- अलि वृश्चिक, गो वृषभ, हरि सिंह, स्त्री कन्या, चाप धनु:, शशिधाम्नि शशिगृह कर्कटक, सौम्यायन उत्तरायण, याम्य दक्षिणायन (यम दक्षिण का अधिपति है), झष मकर, अज मेष, तौली (जो तराजू पकड़े रहता है) तुला।’ ↑ तिलमयीं राजन् दद्याद्यश्चोत्तरायणे। सर्वान् कामानवाप्नोति विन्दते परमं सुखम।। विष्णुधर्मोत्तरे-उत्तरे त्वयने विप्रा वस्त्रदनं महाफलम्। तिलपूर्वमनड्वाहं दत्त्व। रोगै: प्रमुच्यते।। शिवरहस्ये। पुरा मकरसंक्रान्तौ शंकरो गोसवे कृते। तिलानुत्पादयामास तृप्तये सर्वदेहिनाम्। तस्मात्तस्यां तिलै: स्नानं कार्य चोद्वर्तनं बुधै:। देवतानां विपृणां च सोदकैस्तर्पणं तिलै:। तिला देयाश्च विप्रेभ्य: सर्वदैवोत्तरायणे। तिलांश्च भक्षयेत्पुण्यान् होतव्याश्च तथा तिला:। तस्यां तथौ तिलैर्हुत्वा येऽर्चयन्ति द्विजोत्तमान्। त्रिदिवे ते विराजन्ते गोसहस्त्रप्रदायिन:। तिलतैलेन दीपाश्च देया: शिवगृहे शुभा:। सतिलैस्तण्डुलैर्देवं पूजयेद्विधिवद् द्विजम्।।

विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति मकर संक्रान्ति भारत के भिन्न-भिन्न लोगों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थ रखती है। किन्तु सदा की भॉंति, नानाविधी उत्सवों को एक साथ पिरोने वाला एक सर्वमान्य सूत्र है, जो इस अवसर को अंकित करता है। यदि दीपावली ज्योति का पर्व है तो संक्रान्ति शस्य पर्व है, नई फ़सल का स्वागत करने तथा समृद्धि व सम्पन्नता के लिए प्रार्थना करने का एक अवसर है।