मकर संक्रांति

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खगोलीय तथ्य

सन 2012 में मकर संक्रांति 15 जनवरी यानी रविवार की थी। राजा हर्षवर्द्धन के समय में यह पर्व 24 दिसम्बर को पड़ा था। मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल में 10 जनवरी को मकर संक्रांति थी। शिवाजी के जीवन काल में यह त्योहार 11 जनवरी को पड़ा था। आखिर ऐसा क्यों? सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने को ‘मकर संक्रांति’ कहा जाता है। साल 2012 में यह 14 जनवरी की मध्यरात्रि में था। इसलिए उदय तिथि के अनुसार मकर संक्रांति 15 जनवरी को पड़ी थी। दरअसल हर साल सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश 20 मिनट की देरी से होता है। इस तरह हर तीन साल के बाद सूर्य एक घंटे बाद और हर 72 साल में एक दिन की देरी से मकर राशि में प्रवेश करता है। मतलब 1728 (72 गुणा 24) साल में फिर सूर्य का मकर राशि में प्रवेश एक दिन की देरी से होगा और इस तरह 2080 के बाद ‘मकर संक्रांति’ 15 जनवरी को पड़ेगी। ज्योतिषीय आकलन दालें ज्योतिषीय आकलन के अनुसार सूर्य की गति प्रतिवर्ष 20 सेकेंड बढ़ रही है। माना जाता है कि आज से 1000 साल पहले मकर संक्रांति 31 दिसंबर को मनाई जाती थी। पिछले एक हज़ार साल में इसके दो हफ्ते आगे खिसक जाने की वजह से 14 जनवरी को मनाई जाने लगी। अब सूर्य की चाल के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 5000 साल बाद मकर संक्रांति फ़रवरी महीने के अंत में मनाई जाएगी।

संक्रांति का अर्थ
‘संक्रान्ति’ का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना, अत: वह राशि जिसमें सूर्य प्रवेश करता है, संक्रान्ति की संज्ञा से विख्यात है। राशियाँ बारह हैं, यथा मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक , धनु, मकर, कुम्भ, मीन। मलमास पड़ जाने पर भी वर्ष में केवल 12 राशियाँ होती है।

प्रत्येक संक्रान्ति पवित्र दिन के रूप में ग्राह्य है। मत्स्यपुराण ने संक्रान्ति व्रत का वर्णन किया है। एक दिन पूर्व व्यक्ति (नारी या पुरुष) को केवल एक बार मध्याह्न में भोजन करना चाहिए और संक्रान्ति के दिन दाँतों को स्वच्छ करके तिल युक्त जल से स्नान करना चाहिए।

व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी संयमी ब्राह्मण गृहस्थ को भोजन सामग्रियों से युक्त तीन पात्र तथा एक गाय यम, रुद्र एवं धर्म के नाम पर दे और चार श्लोकों को पढ़े, जिनमें से एक यह है-

‘यथा भेदं’ न पश्यामि शिवविष्ण्वर्कपद्मजान्। तथा ममास्तु विश्वात्मा शंकर:शंकर: सदा।।

अर्थात् ‘मैं शिव एवं विष्णु तथा सूर्य एवं ब्रह्मा में अन्तर नहीं करता, वह शंकर, जो विश्वात्मा है, सदा कल्याण करने वाला है। दूसरे शंकर शब्द का अर्थ है- शं कल्याणं करोति। यदि हो सके तो व्यक्ति को चाहिए कि वह ब्राह्मण को आभूषणों, पर्यंक, स्वर्णपात्रों (दो) का दान करे। यदि वह दरिद्र हो तो ब्राह्मण को केवल फल दे। इसके उपरान्त उसे तैल-विहीन भोजन करना चाहिए और यथा शक्ति अन्य लोगों को भोजन देना चाहिए।

स्त्रियों को भी यह व्रत करना चाहिए। संक्रान्ति, ग्रहण, अमावस्या एवं पूर्णिमा पर गंगा स्नान महापुण्यदायक माना गया है और ऐसा करने पर व्यक्ति ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।

प्रत्येक संक्रान्ति पर सामान्य जल (गर्म नहीं किया हुआ) से स्नान करना नित्यकर्म कहा जाता है, जैसा कि देवीपुराण) में घोषित है- ‘जो व्यक्ति संक्रान्ति के पवित्र दिन पर स्नान नहीं करता वह सात जन्मों तक रोगी एवं निर्धन रहेगा; संक्रान्ति पर जो भी देवों को हव्य एवं पितरों को कव्य दिया जाता है, वह सूर्य द्वारा भविष्य के जन्मों में लौटा दिया जाता है

पुण्यकाल मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग बेचने वाला प्राचीन ग्रंथ में ऐसा लिखित है कि केवल सूर्य का किसी राशि में प्रवेश मात्र ही पुनीतता का द्योतक नहीं है, प्रत्युत सभी ग्रहों का अन्य नक्षत्र या राशि में प्रवेश पुण्यकाल माना जाता है।

हेमाद्रि एवं काल निर्णय ने क्रम से जैमिनि एवं ज्योति:शास्त्र से उद्धरण देकर सूर्य एवं ग्रहों की संक्रान्ति का पुण्यकाल को घोषित किया है- ‘सूर्य के विषय में संक्रान्ति के पूर्व या पश्चात् 16 घटिकाओं का समय पुण्य समय है; चन्द्र के विषय में दोनों ओर एक घटी 13 फल पुण्यकाल है; मंगल के लिए 4 घटिकाएँ एवं एक पल; बुध के लिए 3 घटिकाएँ एवं 14 पल, बृहस्पति के लिए चार घटिकाएँ एवं 37 पल, शुक्र के लिए 4 घटिकाएँ एवं एक पल तथा शनि के लिए 82 घटिकाएँ एवं 7 पल। सूर्य जब एक राशि छोड़कर दूसरी में प्रवेश करता है तो उस काल का यथावत् ज्ञान हमारी माँसल आँखों से सम्भव नहीं है, अत: संक्रान्ति की 30 घटिकाएँ इधर या उधर के काल का द्योतन करती हैं। सूर्य का दूसरी राशि में प्रवेश काल इतना कम होता है कि उसमें संक्रान्ति कृत्यों का सम्पादन असम्भव है, अत: इसकी सन्निधि का काल उचित ठहराया गया है।

देवीपुराण में संक्रान्ति काल की लघुता का उल्लेख यों है- ‘स्वस्थ एवं सुखी मनुष्य जब एक बार पलक गिराता है तो उसका तीसवाँ काल ‘तत्पर’ कहलाता है, तत्पर का सौवाँ भाग ‘त्रुटि’ कहा जाता है तथा त्रुटि के सौवें भाग में सूर्य का दूसरी राशि में प्रवेश होता है। सामान्य नियम यह है कि वास्तविक काल के जितने ही समीप कृत्य हो वह उतना ही पुनीत माना जाता है।’ इसी से संक्रान्तियों में पुण्यतम काल सात प्रकार के माने गये हैं- 3, 4, 5, 7, 8, 9 या 12 घटिकाएँ। इन्हीं अवधियों में वास्तविक फल प्राप्ति होती है। यदि कोई इन अवधियों के भीतर प्रतिपादित कृत्य न कर सके तो उसके लिए अधिकतम काल सीमाएँ 30 घटिकाओं की होती हैं; किंतु ये पुण्यकाल-अवधियाँ षडशीति एवं विष्णुपदी को छोड़कर अन्य सभी संक्रान्तियों के लिए है।

‘ मकर संक्रांति मनाते लोग आज के ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जाड़े का अयन काल 21 दिसम्बर को होता है और उसी दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। किंतु भारत में वे लोग, जो प्राचीन पद्धतियों के अनुसार रचे पंचांगों का सहारा लेते हैं, उत्तरायण का आरम्भ 14 जनवरी से मानते हैं। वे इस प्रकार उपयुक्त मकर संक्रान्ति से 23 दिन पीछे हैं। मध्यकाल के धर्मशास्त्र ग्रंथों में यह बात उल्लिखित है, यथा हेमाद्रि ने कहा है कि प्रचलित संक्रान्ति से 12 दिन पूर्व ही पुण्यकाल पड़ता है, अत: प्रतिपादित दान आदि कृत्य प्रचलित संक्रान्ति दिन के 12 दिन पूर्व भी किये जा सकते हैं।
पुण्यकाल के नियम संक्रान्ति के पुण्यकाल के विषय में सामान्य नियम के प्रश्न पर कई मत हैं। शातातप, जाबाल एवं मरीचि ने संक्रान्ति के धार्मिक कृत्यों के लिए संक्रान्ति के पूर्व एवं उपरान्त 16 घटिकाओं का पुण्यकाल प्रतिपादित किया है; किंतु देवीपुराण एवं वसिष्ठ ने 15 घटिकाओं के पुण्यकाल की व्यवस्था दी है। यह विरोध यह कहकर दूर किया जाता है कि लघु अवधि केवल अधिक पुण्य फल देने के लिए है और 16 घटिकाओं की अवधि विष्णुपदी संक्रान्तियों के लिए प्रतिपादित है। संक्रान्ति दिन या रात्रि दोनों में हो सकती है। दिन वाली संक्रान्ति पूरे दिन भर पुण्यकाल वाली होती है। रात्रि वाली संक्रान्ति के विषय में हेमाद्रि, माधव आदि में लम्बे विवेचन उपस्थित किए गये हैं। एक नियम यह है कि दस संक्रान्तियों में, मकर एवं कर्कट को छोड़कर पुण्यकाल दिन में होता है, जबकि वे रात्रि में पड़ती हैं। इस विषय का विस्तृत विवरण तिथितत्त्व और धर्मसिंधु में मिलता है। ग्रहों की संक्रान्ति मकर संक्रांति के अवसर पर रंगोली बनाते हुए ग्रहों की भी संक्रान्तियाँ होती हैं, किन्तु पश्चात्कालीन लेखकों के अनुसार ‘संक्रान्ति’ शब्द केवल रवि-संक्रान्ति के नाम से ही द्योतित है, जैसा कि स्मृतिकौस्तुभ में उल्लिखित है। वर्ष भर की 12 संक्रान्तियाँ चार श्रेणियों में विभक्त हैं- दो अयन संक्रान्तियाँ- मकर संक्रान्ति, जब उत्तरायण का आरम्भ होता है एवं कर्कट संक्रान्ति, जब दक्षिणायन का आरम्भ होता है। दो विषुव संक्रान्तियाँ अर्थात् मेष एवं तुला संक्रान्तियाँ, जब रात्रि एवं दिन बराबर होते हैं। वे चार संक्रान्तियाँ, जिन्हें षडयीतिमुख अर्थात् मिथुन, कन्या, धनु एवं मीन कहा जाता है तथा विष्णुपदी या विष्णुपद अर्थात् वृषभ, सिंह, वृश्चिक एवं कुम्भ नामक संक्रान्तियाँ।

संक्रांति के प्रकार ‘ये बारह संक्रान्तियाँ सात प्रकार की, सात नामों वाली हैं, जो किसी सप्ताह के दिन या किसी विशिष्ट नक्षत्र के सम्मिलन के आधार पर उल्लिखित हैं; वे ये हैं- मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी एवं मिश्रिता। घोरा रविवार, मेष या कर्क या मकर संक्रान्ति को, ध्वांक्षी सोमवार को, महोदरी मंगल को, मन्दाकिनी बुध को, मन्दा बृहस्पति को, मिश्रिता शुक्र को एवं राक्षसी शनि को होती है। इसके अतिरिक्त कोई संक्रान्ति यथा मेष या कर्क आदि क्रम से मन्दा, मन्दाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी, मिश्रित कही जाती है, यदि वह क्रम से ध्रुव, मृदु, क्षिप्र, उग्र, चर, क्रूर या मिश्रित नक्षत्र से युक्त हों।

27 या 28 नक्षत्र निम्नोक्त रूप से सात दलों में विभाजित हैं-

ध्रुव (या स्थिर) – उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी मृदु – अनुराधा, चित्रा, रेवती, मृगशीर्ष

क्षिप्र (या लघु) – हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित उग्र – पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी, मघा

चर – पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, स्वाति , शतभिषक

क्रूर (या तीक्ष्ण) – मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा मिश्रित (या मृदुतीक्ष्ण या साधारण) – कृत्तिका, विशाखा।

ऐसा उल्लिखित है कि
ब्राह्मणों के लिए मन्द,

क्षत्रियों के लिए मन्दाकिनी,

वैश्यों के लिए ध्वांक्षी,

शूद्रों के लिए घोरा,

चोरों के लिए महोदरी, मद्य विक्रेताओं के लिए राक्षसी तथा चाण्डालों, पुक्कसों तथा जिनकी वृत्तियाँ (पेशे) भयंकर हों एवं अन्य शिल्पियों के लिए मिश्रित संक्रान्ति श्रेयस्कर होती है।

संक्रान्ति का देवीकरण आगे चलकर संक्रान्ति का देवीकरण हो गया और वह साक्षात्‌ दुर्गा कही जाने लगी। देवीपुराण में आया है कि देवी वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, दिन आदि के क्रम से सूक्ष्म विभाग के कारण सर्वगत विभु रूप वाली है। देवी पुण्य तवं पाप के विभागों के अनुसार फल देने वाली है।

संक्रान्ति के काल में किये गये एक कृत्य से भी कोटि-कोटि फलों की प्राप्ति होती है। धर्म से आयु, राज्य, पुत्र, सुख आदि की वृद्धि होती है, अधर्म से व्याधि, शोक आदि बढ़ते हैं। विषुव संक्रान्ति के समय जो दान या जप किया जाता है या अयन में जो सम्पादित होता है, वह अक्षय होता है।

यही बात विष्णुपद एवं षडशीति मुख के विषय में भी है।तिल के लड्डू आजकल के पंचांगों में मकर संक्रान्ति का देवीकरण भी हो गया है। वह देवी मान ली गयी है। संक्रान्ति किसी वाहन पर चढ़ती है, उसका प्रमुख वाहन हाथी जैसे वाहन पशु हैं; उसके उपवाहन भी हैं; उसके वस्त्र काले, श्वेत या लाल आदि रंगों के होते हैं; उसके हाथ में धनुष या शूल रहता है, वह लाह या गोरोचन जैसे पदार्थों का तिलक करती है; वह युवा, प्रौढ़ या वृद्ध है; वह खड़ी या बैठी हुई वर्णित है; उसके पुष्पों, भोजन, आभूषणों का उल्लेख है; उसके दो नाम सात नामों में से विशिष्ट हैं; वह पूर्व आदि दिशाओं से आती है और पश्चिम आदि दिशाओं को चली जाती है और तीसरी दिशा की ओर झाँकती है; उसके अधर झुके हैं, नाक लम्बी है, उसके 9 हाथ है।

उसके विषय में अग्र सूचनाएँ ये हैं-

संक्रान्ति जो कुछ ग्रहण करती है, उसके मूल्य बढ़ जाते हैं या वह नष्ट हो जाता है; वह जिसे देखती है, वह नष्ट हो जाता है, जिस दिशा से वह जाती है, वहाँ के लोग सुखी होते हैं, जिस दिशा को वह चली जाती है, वहाँ के लोग दुखी हो जाते हैं।
संक्रांति पर दान पुण्य पूर्व पुण्यलाभ के लिए पुण्यकाल में ही स्नान दान आदि कृत्य किये जाते हैं। सामान्य नियम यह है कि रात्रि में न तो स्नान किया जाता है और न ही दान। पराशर में आया है कि सूर्य किरणों से पूरे दिन में स्नान करना चाहिए, रात्रि में ग्रहण को छोड़कर अन्य अवसरों पर स्नान नहीं करना चाहिए। यही बात विष्णुधर्मसूत्र में भी है। किंतु कुछ अपवाद भी प्रतिपादित हैं। भविष्यपुराण [31] में आया है कि रात्रि में स्नान नहीं करना चाहिए, विशेषत: रात्रि में दान तो नहीं ही करना चाहिए, किंतु उचित अवसरों पर ऐसा किया जा सकता है, यथा ग्रहण, विवाह, संक्रान्ति, यात्रा, जनन, मरण तथा इतिहास श्रवण में। अत: प्रत्येक संक्रान्ति पर विशेषत: मकर संक्रान्ति पर स्नान नित्य कर्म है। दान निम्न प्रकार के किये जाते हैं- मेष में भेड़, वृषभ में गायें,

मिथुन में वस्त्र, भोजन एवं पेय पदार्थ,

कर्क में घृत,धेनु,

सिंह में सोने के साथ वाहन,

कन्या में वस्त्र एवं गौएँ, नाना प्रकार के अन्न एवं बीज,

तुला-वृश्चिक में वस्त्र एवं घर,

धनु में वस्त्र एवं वाहन,

मकर में इन्घन एवं अग्नि,

कुम्भ में गौएँ जल एवं घास,

मीन में नये पुष्प।

अन्य विशेष प्रकार के दानों के विषय में देखिए स्कन्दपुराण , विष्णुधर्मोत्तर, कालिका आदि।

उपवास मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग उडाते हुए, वाराणसी मकर संक्रान्ति के सम्मान में तीन दिनों या एक दिन का उपवास करना चाहिए। जो व्यक्ति तीन दिनों तक उपवास करता है और उसके उपरान्त स्नान करके अयन पर सूर्य की पूजा करता है, विषुव एवं सूर्य या चन्द्र के ग्रहण पर पूजा करता है तो वह वांछित इच्छाओं की पूर्णता पाता है।

आपस्तम्ब में आया है कि जो व्यक्ति स्नान के उपरान्त अयन, विषुव, सूर्यचंद्र-ग्रहण पर दिन भर उपवास करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। किंतु पुत्रवान व्यक्ति को रविवार, संक्रान्ति एवं ग्रहणों पर उपवास नहीं करना चाहिए। राजमार्तण्ड में संक्रान्ति पर किये गये दानों के पुण्य-लाभ पर दो श्लोक हैं- ‘अयन संक्रान्ति पर किये गये दानों का फल सामान्य दिन के दान के फल का कोटिगुना होता है और विष्णुपदी पर वह लक्षगुना होता है; षडशीति पर यह 86000 गुना घोषित हैं।

चंद्र ग्रहण पर दान सौ गुना एवं सूर्य ग्रहण पर सहस्त्र गुना, विषुव पर शतसहस्त्र गुना तथा आकामावै की पूर्णिमा पर अनन्त फलों को देने वाला है। भविष्यपुराण ने अयन एवं विषुव संक्रान्तियों पर गंगा-यमुना की प्रभूत महत्ता गायी है।

नारी द्वारा दान मकर संक्रान्ति पर अधिकांश में नारियाँ ही दान करती हैं। वे पुजारियों को मिट्टी या ताम्र या पीतल के पात्र, जिनमें सुपारी एवं सिक्के रहते हैं, दान करती हैं और अपनी सहेलियों को बुलाया करती हैं तथा उन्हें कुंकुम, हल्दी, सुपारी, ईख के टुकड़े आदि से पूर्ण मिट्टी के पात्र देती हैं।

दक्षिण भारत में पोंगल नामक उत्सव होता है, जो उत्तरी या पश्चिमी भारत में मनाये जाने वाली मकर संक्रान्ति के समान है।

पोंगल तमिल वर्ष का प्रथम दिवस है। यह उत्सव तीन दिनों का होता है। पोंगल का अर्थ है ‘क्या यह उबल रहा’ या ‘पकाया जा रहा है?’ संक्रांति पर श्राद्ध कुछ लोगों के मत से संक्रान्ति पर श्राद्ध करना चाहिए।

विष्णु धर्मसूत्र में आया है-

‘आदित्य अर्थात् सूर्य के संक्रमण पर अर्थात् जब सूर्य एक राशि से दूसरी में प्रवेश करता है, दोनों विषुव दिनों पर, अपने जन्म-नक्षत्र पर विशिष्ट शुभ अवसरों पर काम्य श्राद्ध करना चाहिए; इन दिनों के श्राद्ध से पितरों को अक्षय संतोष प्राप्त होता है। यहाँ पर भी विरोधी मत हैं।

शूलापाणि के मत से संक्रान्ति-

श्राद्ध में पिण्डदान होना चाहिए, किंतु निर्णयसिंधु के मत से श्राद्ध पिण्डविहीन एवं पार्वण की भाँति होना चाहिए। संक्रान्ति पर कुछ कृत्य वर्जित भी थे।

विष्णुपुराण में वचन है-

‘चतुर्दशी, अष्टमी, अमावस्या, पूर्णिमा एवं संक्रान्ति पर्व कहे गये हैं; जो व्यक्ति ऐसे अवसर पर संभोग करता है, तैल एवं मांस खाता है, वह विष्मूत्र-भोजन’ नामक नरक में पड़ता है।

ब्रह्मपुराण में आया है-

अष्टमी, पक्षों के अंत की तिथियों में, रवि-संक्रान्ति के दिन तथा पक्षोपान्त (चतुर्दशी) में संभोग, तिल-मांस-भोजन नहीं करना चाहिए।

आजकल मकर संक्रान्ति धार्मिक कृत्य की अपेक्षा सामाजिक अधिक है। उपवास नहीं किया जाता, कदाचित कोई श्राद्ध करता हो, किंतु बहुत से लोग समुद्र या प्रयाग जैसे तीर्थों पर गंगा स्नान करते हैं। तिल का प्रयोग अधिक होता है, विशेषत: दक्षिण में।

तिल की महत्ता यों प्रदर्शित है

‘जो व्यक्ति तिल का प्रयोग छ: प्रकार से करता है वह नहीं डूबता अर्थात् वह असफल या अभागा नहीं होता; शरीर को तिल से नहाना, तिल से उवटना, सदा पवित्र रहकर तिलयुक्त जल देना, अग्नि में तिल डालना, तिल दान करना एवं तिल खाना।

सूर्य प्रार्थना संस्कृत प्रार्थना के अनुसार

“हे सूर्य देव, आपका दण्डवत प्रणाम, आप ही इस जगत् की आँखें हो। आप सारे संसार के आरम्भ का मूल हो, उसके जीवन व नाश का कारण भी आप ही हो।”

सूर्य का प्रकाश जीवन का प्रतीक है। चन्द्रमा भी सूर्य के प्रकाश से आलोकित है। वैदिक युग में सूर्योपासना दिन में तीन बार की जाती थी।

महाभारत में पितामह भीष्म ने भी सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपना प्राणत्याग किया था। हमारे मनीषी इस समय को बहुत ही श्रेष्ठ मानते हैं। इस अवसर पर लोग पवित्र नदियों एवं तीर्थ स्थलों पर स्नान कर आदिदेव भगवान सूर्य से जीवन में सुख व समृद्धि हेतु प्रार्थना व याचना करते हैं।

मान्यता यह विश्वास किया जाता है कि इस अवधि में देहत्याग करने वाले व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से पूर्णत: मुक्त हो जाते हैं।

महाभारत महाकाव्य में वयोवृद्ध योद्धा पितामह भीष्म पांडवों और कौरवों के बीच हुए कुरुक्षेत्र युद्ध में सांघातिक रूप से घायल हो गये थे। उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। पांडव वीर अर्जुन द्वारा रचित बाणशैया पर पड़े भीष्म उत्तरायण अवधि की प्रतीक्षा करते रहे। उन्होंने सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर ही अंतिम सांस ली, जिससे उनका पुनर्जन्म न हो। तिल तिल संक्राति देश भर में लोग मकर संक्रांति के पर्व पर अलग-अलग रूपों में तिल, चावल, उड़द की दाल एवं गुड़ का सेवन करते हैं। इन सभी सामग्रियों में सबसे ज़्यादा महत्व तिल का दिया गया है। इस दिन कुछ अन्य चीज़ भले ही न खाई जाएँ, किन्तु किसी न किसी रूप में तिल अवश्य खाना चाहिए।

इस दिन तिल के महत्व के कारण मकर संक्रांति पर्व को “तिल संक्राति” के नाम से भी पुकारा जाता है। तिल के गोल-गोल लड्डू इस दिन बनाए जाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई है तथा उपरोक्त उत्पादों का प्रयोग सभी प्रकार के पापों से मुक्त करता है; गर्मी देता है और शरीर को निरोग रखता है। मंकर संक्रांति में जिन चीज़ों को खाने में शामिल किया जाता है, वह पौष्टिक होने के साथ ही साथ शरीर को गर्म रखने वाले पदार्थ भी हैं।

सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती है, उस अवधि को “सौर वर्ष” कहते हैं।

पृथ्वी का गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना “क्रान्तिचक्र” कहलाता है। इस परिधि चक्र को बाँटकर बारह राशियाँ बनी हैं।

सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना “संक्रान्ति” कहलाता है। इसी प्रकार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को “मकर संक्रान्ति” कहते हैं।

मकर संक्राति के अवसर पर गंगा स्नान करते श्रद्धालु सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना ‘उत्तरायण’ तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना ‘दक्षिणायन’ है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं तथा रातें छोटी होने लगती हैं। दक्षिणायन में ठीक इसके विपरीत होता है। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन देवताओं की रात होती है। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता था।

मकर संक्रान्ति के दिन यज्ञ में दिये हव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएँ शरीर छोड़कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसलिए यह आलोक का अवसर माना जाता है। इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अनन्य महत्त्व है और सौ गुणा फलदायी होकर प्राप्त होता है।

मकर संक्रान्ति प्रत्येक वर्ष प्रायः 14 जनवरी को पड़ती है। टीका टिप्पणी और संदर्भ ↑ बिहार राज्य का एक व्यंजन, जो चूड़ा चावल से बनाया जाता है।

↑ रवे: संक्रमणं राशौ संक्रान्तिरिति कथ्यते। स्नानदानतप:श्राद्धहोमादिषु महाफला।। नागरखंड (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 410); मेषादिषु द्वादशराशिषु क्रमेण सञ्चरत: सूर्यस्य पूर्वस्माद्राशेरुत्तरराशौ संक्रमणं प्रवेश: संक्रान्ति। अतस्तद्राशिनामपुर:सरं सा संक्रान्तिर्व्यपदिश्यते। काल निर्णय, रवे: संक्रमणं राशौ संक्रान्तिरिति कथ्यते। स्नानदानतप:श्राद्धहोमादिषु महाफला।। नागरखंड (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 410); मेषादिषु द्वादशराशिषु क्रमेण सञ्चरत: सूर्यस्य पूर्वस्माद्राशेरुत्तरराशौ संक्रमणं प्रवेश: संक्रान्ति। अतस्तद्राशिनामपुर:सरं सा संक्रान्तिर्व्यपदिश्यते। काल निर्णय, पृष्ठ 331। ↑ मत्स्यपुराण, अध्याय 98 ↑ मत्स्यपुराण, 98|17 ↑ संक्रान्त्यां पक्षयोरन्ते ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो:। गंगास्नातो नर: कामाद् ब्रह्मण: सदनं व्रजेत्।। ↑

पञ्चसिद्धान्तिका (3|23-24, पृष्ठ 9) ने परिभाषा दी है- ‘मेषतुलादौ विषुवत् षडशीतिमुखं तुलादिभागेषु। षडशीतिमुखेषु रवे: पितृदिवसा येऽवशेषा: स्यु:।। षडशीतिमुखं कन्याचतुर्दशेऽष्टादशे च मिथुनस्य। मीनस्य द्वार्विशे षडविशे कार्मुकस्यांशे।। तुला आदिर्यस्या: सा तुलादि: कन्या। द्वादशैव भवन्त्येषां द्विज नामानि मे श्रृणु। एकं विष्णुपदं नाम षडशीतिमुखं तथा।। विषुवं च तृतीयं च अन्ये द्वे दक्षिणोत्तरे।। कुम्भालिगोहरिषु विष्णुपदं वदन्ति स्त्रीचापमीनमिथुने षडशीतिवक्त्रम्। अर्कस्य सौम्यमयनं शशिधाम्नि याम्यमृक्षे झषे विषुवति त्वजतौलिनो: स्यात्।। ब्रह्मवैवर्त (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 407) । कुछ शब्दों की व्याख्या आवश्यक है- अलि वृश्चिक, गो वृषभ, हरि सिंह, स्त्री कन्या, चाप धनु:, शशिधाम्नि शशिगृह कर्कटक, सौम्यायन उत्तरायण, याम्य दक्षिणायन (यम दक्षिण का अधिपति है), झष मकर, अज मेष, तौली (जो तराजू पकड़े रहता है) तुला।’ ↑ तिलमयीं राजन् दद्याद्यश्चोत्तरायणे। सर्वान् कामानवाप्नोति विन्दते परमं सुखम।। विष्णुधर्मोत्तरे-उत्तरे त्वयने विप्रा वस्त्रदनं महाफलम्। तिलपूर्वमनड्वाहं दत्त्व। रोगै: प्रमुच्यते।। शिवरहस्ये। पुरा मकरसंक्रान्तौ शंकरो गोसवे कृते। तिलानुत्पादयामास तृप्तये सर्वदेहिनाम्। तस्मात्तस्यां तिलै: स्नानं कार्य चोद्वर्तनं बुधै:। देवतानां विपृणां च सोदकैस्तर्पणं तिलै:। तिला देयाश्च विप्रेभ्य: सर्वदैवोत्तरायणे। तिलांश्च भक्षयेत्पुण्यान् होतव्याश्च तथा तिला:। तस्यां तथौ तिलैर्हुत्वा येऽर्चयन्ति द्विजोत्तमान्। त्रिदिवे ते विराजन्ते गोसहस्त्रप्रदायिन:। तिलतैलेन दीपाश्च देया: शिवगृहे शुभा:। सतिलैस्तण्डुलैर्देवं पूजयेद्विधिवद् द्विजम्।।

विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति मकर संक्रान्ति भारत के भिन्न-भिन्न लोगों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थ रखती है। किन्तु सदा की भॉंति, नानाविधी उत्सवों को एक साथ पिरोने वाला एक सर्वमान्य सूत्र है, जो इस अवसर को अंकित करता है। यदि दीपावली ज्योति का पर्व है तो संक्रान्ति शस्य पर्व है, नई फ़सल का स्वागत करने तथा समृद्धि व सम्पन्नता के लिए प्रार्थना करने का एक अवसर है।

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