त्रैतवाद

“त्रैतवाद”

नमस्ते जी,

ईश्वर-जीव-प्रकृति’ सिद्धांत के उद्गाता महर्षि दयानंद”

महर्षि दयानन्द ने जब उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में वैदिक धर्म का प्रचार आरम्भ किया तो उस समय त्रैतवाद की कहीं चर्चा नहीं होती थी। विद्वत जगत में आचार्य शंकर प्रोक्त अद्वैतवाद प्रतिष्ठित था जो केवल एक ईश्वर की ही सत्ता को मानता है, जीव व प्रकृति की पृथक व अनादि स्वतन्त्र सत्ता को नहीं। उन दिनों भक्तिवाद का भी जोर था जिसके अनुसार पुराणों के आधार पर प्रचलित मान्यताओं के अनुरूप मन्दिरों में जाकर भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियों के आगे वन्दन, सिर नवाना, पूजोपचार व व्रतोपवास आदि करने को ही जीवन का उद्देश्य और मनुष्य जन्म की सफलता माना जाता था। महर्षि दयानन्द ने वेद, वेदांग, उपांग, उपनिषद सहित समस्त उपलब्ध प्राचीन साहित्य का अध्ययन किया था जिससे वह जान सके कि ईश्वर का जीवात्मा और प्रकृति से पृथक स्वतन्त्र अस्तित्व हैं। ईश्वर से अतिरिक्त जीव व प्रकृति पृथक हैं, यह ईश्वर के बनाये व उसके अंश आदि नहीं हैं। जीव अनादि व चेतन तत्व है जबकि प्रकृति अनादि व जड़ तत्व है और यह दोनों ही अनेक बातों में ईश्वर के वश व नियन्त्रण में हैं। ईश्वर-जीव-प्रकृति की एक दूसरे से भिन्न पृथक व स्वतन्त्र सत्ताओं को ही त्रैतवाद के नाम से जाना जाता है। महर्षि दयानन्द जी ने अपनी इन मान्यताओं को बिना किसी की चुनौती के स्वयं ही अपने ग्रन्थों में प्रस्तुत किया है जिससे अद्वैतवाद खण्डित हो जाता है और त्रैतवाद अखण्डित रहता है वा सत्य सिद्ध होता है।

त्रैतवाद में प्रत्यक्ष-परोक्ष जितना भी संसार है, उसके मूल में तीन तत्व माने गये हैं — ईश्वर, जीव और प्रकृति । ये तीनों तत्व एकदूसरे से पूर्णरूप से भिन्न है । न कोई किसीका परिणाम है और न ही कोई किसी का विवर्त ।

वेदो में (त्रैतवाद) —

ईश्वर का स्वरूप

ईश्वर —
सत् (= जिसका अस्तित्व है, जो कल्पना नहीं है और न ही भ्रम या स्वप्न),
चित् (=चेतन है),
आनन्द (=सदा सुखी, कभी दुःखी न होने वाला),
निराकार (= आकार रहित),
सर्वशक्तिमान् (= संभवित कार्यों को बिना किसी की सहायता से करने में समर्थ),
न्यायकारी (=न्याय करने वाला),
दयालु, (प्राणी मात्र पर दया करने वाला)
अजन्मा (= जन्म रहित, जो कभी जन्म नहीं लेता),
अनंत (= १. जो कभी नष्ट नहीं होता, २. असीमित [infinite]),
निर्विकार (= विकार [परिणाम] रहित),
अनादि (न आदि = अनादि अर्थात् जिसकी शुरूआत नहीं है, जो कभी उत्पन्न नहीं होता),
अनुपम, (जिसकी कोई उपमा नहीं है अर्थात् जिसकी तुलना नहीं की जा सकती)
सर्वाधार, ( सब जड़-चेतन का आधार)
सर्वेश्वर, (सब जड़-चेतन का ईश्वर= शासक= शासन करने वाला)
सर्वव्यापक, (सर्वत्र विद्यमान)
सर्वांतर्यामी, (सब पदार्थों के अन्दर भी विद्यमान)
अजर, (न जर = कभी बूढा न होने वाला)
अमर, (कभी नष्ट न होने वाला)
अभय, (भय से रहित)
नित्य, (शाश्वत्)
पवित्र (दूषित न होने वाला)
सृष्टिकर्ता (समग्र सृष्टि का कर्त्ता = करने वाला, सृजनहार) है ।
सर्वज्ञ (सब को जानने वाला)

“ये तीनों तत्व एकदूसरे से पूर्णरूप से भिन्न है” । इसका अर्थ ये है कि इन तीनों तत्वों की अपनी स्वतंत्र सत्ता है । कोई किसी का विकार या परिणाम नहीं है ।

“जीवात्मा का स्वरूप “

सत् (= जिसका अस्तित्व है, जो कल्पना नहीं है और न ही भ्रम या स्वप्न),
चित् (=चेतन है),

अल्पज्ञ (अल्प ज्ञान वाला),
अल्पसामर्थ्य (अपने कर्मों को करने के लिये दूसरों की सहायता लेने वाला),

अनादि (न आदि = अनादि अर्थात् जिसकी शुरूआत नहीं है, जो कभी उत्पन्न नहीं होता),

अनंत ( १. जो कभी नष्ट नहीं होता, २.संख्या की दृष्टि से असंख्य है),

अजर, (न जर = कभी बूढा न होने वाला)
अमर, (कभी नष्ट न होने वाला)

नित्य, (शाश्वत्)

प्रकृति का स्वरूप —

सत् (= जिसका अस्तित्व है, जो कल्पना नहीं है और न ही भ्रम या स्वप्न),

जड़ (चेतना रहित)

अनादि (न आदि = अनादि अर्थात् जिसकी शुरूआत नहीं है, जो कभी उत्पन्न नहीं होती),

अनंत ( १. जो कभी नष्ट नहीं होती, २, सत्व-रजस्-तमस् रूप में असंख्य है),

नित्य, (शाश्वत्)

प्रकृति, सत्व-रजस्-तमस् का सामूहिक नाम (collective name) है । अर्थात् तीनों (सत्व-रजस्-तमस्) को मिलाकर प्रकृति कहते हैं । संसार में जो भी जड़ पदार्थ हैं वे इसी जड़ प्रकृति से बने हैं । ईश्वर, जीवात्मा के लिये प्रकृति से संसार बनाता है ।

१. सत्ताए तीन ही क्यों है ? चार / पांच क्यों नहीं ?

क्योंकि प्रत्यक्ष से तीन ही का अनुभव होता है । ऋषि (तत्त्व को साक्षात् करने वाले) लोगों ने भी तीन का ही उल्लेख किया है । तथा वेद में भी मूलभूत रूप में तीन का ही अस्तित्व माना गया है । इसीलिये तीन ही सत्ता मान्य है, चार-पाँच नहीं । ईश्वर के ही ब्रह्म, परमात्मा, परमेश्वर… आदि नाम हैं ।

२. ये कहासे व क्यों उत्पन्न हुई ?

ये कहीं से भी उत्पन्न नहीं हुये । तीनों शाश्वत् हैं । अनादि-अनन्त(नष्ट न होने वाले) हैं ।

३. अगर वो अनादी अनंत है तो ऐसा क्यों है ?

क्योकि इनकी उत्पत्ति का कोई उपादान कारण नहीं है । उत्पन्न वह होता है, जिसका कोई उपादान-निमित्त-साधारण कारण हो ।

उपादान-निमित्त-साधारण कारण —

उदा० आटे से रोटी का बनना । आटे से रोटी के बनने में —

रोटी का उपादान कारण — आटा है(raw material) ।

रोटी का निमित्त कारण — रोटी बनाने वाला व्यक्ति है(doer) ।

रोटी का सामान्य/साधारण कारण — रोटी बनाने में प्रयुक्त किये गये साधन, काल.. आदि हैं (instrument,time…etc) ।

ईश्वर-जीव-प्रकृति के ये तीनों कारण नहीं है, इसीलिये वे उत्पन्न नहीं होते अर्थात् वे अनादि हैं । जो उत्पन्न नहीं होता वह नष्ट भी नहीं होता । अतः वे अनन्त(नष्ट न होने वाले) भी हैं । अर्थात् वे शाश्वत् है ।

४. इसका मतलब ईश्वर तो सर्व व्यापक है उसे तो कभीभी पृथक नहीं माना जा सकता ।वो तो सत में भी मौजूद है और चितमें भी. इसलिए वह ‘सत’ और ‘चित’ का उपादान कारण कहलाता है.

मौजूद होने मात्र से कोई किसी का उपादान कारण नहीं बन जाता । जैसे कमरे में मौजूद इन्सान कमरे का उपादान कारण नहीं होता । ईश्वर, ‘सत’ और ‘चित’ का अर्थात् “प्रकृति और जीव” का उपादान कारण नहीं है ।

५. ‘ब्रह्म’ या ‘परमेश्वर’ का अस्तित्व क्यों है ?

शाश्वत् होने से ।

ज्यादा स्पष्टता के लिये निम्न लिखित प्रश्न का उत्तर आपको देना होगा—-
मैंने आपसे पूछा था — “अगर मानवीय व्यवहारों को हम चैतन्य का प्रमाण मानेंग, अगर हमें मालुम न हो की वो मानव निर्मित है,तो क्या हम उन्हें अचेत कह सकेंगे ? हमारी भावनाओं को, हमारी इच्छाओं को, हमारे ज्ञान और सुख,विश्व की इस पहेली में हम खुद ही केंद्रबिंदु है. जबतक वह वक्तव्य हमारा खुदका प्रत्यक्ष या अपरोक्ष अनुभव नहीं बनता है,खुदकी” — ये highlighted शब्द किसके लिये प्रयोग किये गये हैं ?”
तो अब आपसे एक प्रश्न है – ये “रक्ताक्षर” जिसके लिये प्रयोग किये गये हैं, उसका अस्तित्व है ? क्यों ?

६. अगर सत व चित को ईश्वर नहीं बनाता है, और अगर ये दोनों सत्ताए ईश्वर का स्वरूप भी नहीं है, तो ईश्वर की क्या भूमिका है ?
ईश्वर की भूमिका ये है कि वह जीवात्मा के लिये प्रकृति से संसार को बनाता है । संसार को बनाने में उसका अपना कुछ भी स्वार्थ नहीं है ।

७. अगर निसर्ग नियम को ईश्वर कहा गया है, तो सत व चित स्वतन्त्र कैसे है ?
निसर्ग के नियम ईश्वर नहीं हैं, किन्तु उन नियमों को बनाने वाला ईश्वर है । जब ईश्वर के लिये ‘नियम’ शब्द का प्रयोग किया जाता है, तो उसका अर्थ है – नियमों का करने वाला अर्थात् नियामक ।

“तो सत व चित स्वतन्त्र कैसे है ?” — आपका ये प्रश्न मुझे स्पष्ट नहीं हुआ है ।

८.अगर सत और चित को ईश्वर नहीं बनाता है और न ही वो ईश्वर पर निर्भर है तो वो कहासे उत्पन्न हुए ? क्यों उत्पन्न हुए ?
कहीं से भी उत्पन्न नहीं हुए । शाश्वत् है ।

९. पुनर्जन्म किसीका भी नहीं होता है. वह भी एक आभास है.
यह बात वेद और वैदिक साहित्य के अनुकूल नहीं है । पुनर्जन्म होता है और वह जीवात्मा का होता है, जीवात्मा के कर्म के अनुसार ।

१०.परन्तु मै ये मानता हुं की वेद हज़ारो सालो के लम्बे काल में हुए अनेक ऋषियोंके ज्ञान का संकलन है. वेदों का ज्ञान भी कुछ विज्ञान की तरह ही क्रमिक विकास दर्शाता है. संहिता, ब्राह्मणक, अरण्यक और उपनिषद् … जो एक एक करके विकसित होते गए, और धीरे धीरे कर्मकांड से होकर तात्विक दर्शन की ओर बढ़ते गए. इसलिए मेरा मानना ये है की वेदों में लिखा हुआ साराही ज्ञान शायद सटीक (accurate) न हो.

वेद अनेक ऋषियोंके ज्ञान का संकलन नहीं है और न ही हज़ारो सालो के लम्बे काल में हुए हैं । ब्राह्मणक, अरण्यक और उपनिषद् … आदि वेद का क्रमिक विकास नहीं है । ब्राह्मणक, अरण्यक और उपनिषद् … आदि वेद नहीं है, किन्तु वेद के व्याख्या ग्रन्थ हैं । केवल मूल संहिता वेद है । वेद में तात्विक दर्शन, कर्मकाण्ड आदि एकसाथ ही बता दिये गये हैं । वेदों को समझने वाले हम जीवात्माओं की बुद्धि सीमित होने से हम एकसाथ वेद को समझ नहीं पाते हैं । समय समय पर कोई तत्त्ववेत्ता या वैज्ञानिक आता है जो कुछ नयी बात हम=सामान्य लोगों को बता कर जाता है । अतः हमको क्रमिक विकाससा लगता है ।परंतु वह क्रमिक विकास नहीं है, किन्तु हमारा अज्ञान है, जिसके कारण हम वेदों को नहीं समझ पा रहें है ।

११. वेद हमें ऐसी क्या नयी बात बताते है की जो हमें मालुम नहीं है ?
वेद हमें मुख्य रूप से अतीन्द्रिय ज्ञान (metaphysics) कि व्यावहारिक एवं पारमार्थिक दोनों ही स्तर पर तीनों तत्वों की अपनी पृथक् सत्ता है, बताता है ।और यह ही महत्तवपूर्ण नयी बात है जो हमको मालूम नहीं है । कहीं पर भी वेद में एवं वैदिक दर्शनोमें किसी को भी भ्रम या स्वप्न या कल्पना नहीं माना गया है । वेद ईश्वर की रचना है, यह बात प्रमाण से सिद्ध होने से सब भारतीय तत्ववेत्ता इस बात पर एकमत है । वैदिक दर्शन ऋषियों की रचना है । वेद और ऋषियों का कहीं भी इस बात पर कोई मतभेद नहीं है ।

१७. वास्तविक सत्य एक ‘निरंतर अविभाज्य अस्तित्व’ है. विभिन्नता केवल आभास है. हम सब अलग अलग नहीं है. एक ही है

इतनी बात सही है कि वास्तविक सत्य ‘निरंतर अविभाज्य अस्तित्व’ है । परंतु विभिन्नता केवल आभास नहीं है, वास्तविकता है । संसार में जो विभिन्नता दिखाई दे रही है, उसका कारण जीवात्मा के विभिन्न कर्म है । जीवात्मा के द्वारा किये जाने वाले कर्म में विभिन्नता होने से सृष्टि में विभिन्नता है ।
हम सब अलग-अलग ही हैं, एक नहीं । शंकराचार्य ने भी ये बात स्वीकार की है । शब्द-प्रमाण से तो ये बात सिद्ध ही है, किन्तु प्रत्यक्ष से भी सिद्ध है । एक ही समय में होने वाली विभिन्न क्रियाएँ, घटनाएँ, जैसे कि – हँसना-रोना,खाना-पीना, जन्म लेना, मृत्यु होना, सुखी होना, दुःखी होना, एक ही समय में भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न रुचियों(taste/interest) का दिखाई देना…इत्यादि जीवात्मा के अनेकत्व को सिद्ध करते हैं ।

“प्रकृति का स्वरूप”

अब देखिये प्रकृति से संसार कैसे बनता है —

कोई भी वस्तु, अपने कारण से अपने व्यक्त रूप में पहुंचने के लिये विशेष प्रक्रिया से गुजरती है । जैसे – लोहा । लोहा अपने कारण(raw-material) से लोहे रूप में आने के लिये एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरता है । फिर वही लोहा, लोहे से गाड़ी के रूप तक पहुंचने के लिये फिर एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरता है । ठीक इसी प्रकार दृश्यमान संसार भी प्रकृति से अपने वर्तमान रूप में पहुंचने के लिये एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरता है । और वह प्रक्रिया इस प्रकार है – “सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः, प्रकृतेर्महान्, महतोऽहङ्कारोऽहङ्कारात् पञ्च तन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि” । अर्थात् प्रकृति(सत्व-रजस्-तमस्) से “महत्” बनता है । उस “महत्” से “अहंकार”, “अहंकार” से “उभय-इन्द्रिय” तथा “५ तन्मात्र” बनते हैं । “उभय-इन्द्रिय” अर्थात् दो प्रकार की इन्द्रिय १. आन्तरिन्द्रिय २. बाह्य-इन्द्रिय । मन को आन्तरिन्द्रिय कहते हैं । बाह्य-इन्द्रिय भी दो प्रकार की है – १. ज्ञानेन्द्रिय २. कर्मेन्द्रिय । तो इस प्रकार “अहंकार” से १६ वस्तुएँ बनती है — मन, ५ ज्ञानेन्द्रिय(घ्राण(नासिका)-रसन-चक्षु-त्वक्-श्रोत्र), ५ कर्मेन्द्रिय (वाक्-पाणि-पाद-पायु-उपस्थ), ५ तन्मात्र(आकाश-तन्मात्र, वायु-तन्मात्र, अग्नि-तन्मात्र, जल-तन्मात्र, पृथिवी-तन्मात्र) । इन्हीं तन्मात्रों को “सूक्ष्मभूत” भी कहते हैं । इन ५ सूक्ष्मभूतों से ५ स्थूलभूत(आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथिवी) बनते हैं । और इन्हीं ५ स्थूलभूतों को विभिन्न अनुपात में मिलाने पर यह दृश्यमान संसार बनता है । इन ५ भूत से बने हुए संसार को भौतिक(=भूतों से बना हुआ) कहते हैं । अतः जो भी भौतिक है, वह अचेतन है, क्योंकि अचेतन प्रकृति से बना हुआ होने से । जब शरीर के लिये ये कहा जाता है कि “मिट्टी से बना था मिट्टी में मिल गया” तो वहाँ भी “मिट्टी” का अर्थ है “५ स्थूलभूत” । “काया पञ्चत्व में विलीन हो गयी” वाक्य में “पञ्चत्व” शब्द भी “५ स्थूलभूत” के लिये ही प्रयुक्त किया जाता है ।

[यहाँ “अहंकार” साधन(instument) है, न तु गुण(quality)] ।
अभी संसार पूरा बना नहीं है । संसार का बहुत हिस्सा तो अभी बनना बाकि है । बाकी बचा संसार आपके प्रश्न बनायेंगे । संसार की पूर्ण रचना के लिये कृपया यथाशक्ति प्रश्नों का दान करें ।

१८. अगर केवल वेदोपनिशादो को ही लिया जाए तो त्रैतवाद इन श्लोको को के बारेमे क्या कहेता है ?
1. अहम् ब्रह्मास्मि
2. सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
3. अयं आत्मा ब्रह्म
4. एकं एवाद्वितियम ब्रह्म
5. ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम….
उत्तर की शीघ्रता आप पर निर्भर है ।

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"रूपेश कान्त कौशिक" द्वारा प्रकाशित

नमस्ते जी, "संस्कृत सरोवर" वेब पेज ;। ( https://sanskrits.wordpress.com) पर आप सभी दर्शकों का सहृदय स्वागत है। संस्कृतानुरागियों के लिए बृहद विचार विमर्श, प्रश्नोत्तरी, शोध समाधान, इत्यादि अन्य प्रकटीकरण-हेतु यह एक व्यापक क्षेत्र है। यहां आपके समाधान के लिए (pdf फाइल, audio and video,तथा, blogs text, ) दिये जातें हैं। अन्यत्र सभी दर्शकों से अनुरोध है की वह अपने विचार अभिव्यक्ति के लिए... मोबाइल नंबर 08294889034, WhatsApp ग्रुप https://chat.whatsapp.com/D8UsJub5BRHAbt5fk2chX7 से भी ज्यादा से ज्यादा जूड़कर लाभ उठा सकते हैं। आपकी सेवा में, "रूपेश कान्त कौशिक" धन्यवाद इदानिम् अहम् रांची विश्वविद्यालय तः स्नातकोत्तर मध्यमे संस्कृतस्य छात्रोस्मि

3 विचार “त्रैतवाद&rdquo पर;

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