आखिर क्योँ कहा जाता है भारत वर्ष को “जम्बूदीप” ?

“जम्बूदीप”

एक सवाल आपसे ,क्या आप सच में जानते हैं कि हमारे भारत को “”जम्बूदीप”” क्यों कहा जाता है और, इसका मतलब क्या होता है ? दरअसल हमारे लिए यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि भारतवर्ष का नाम भारतवर्ष कैसे पड़ा ? क्योंकि एक सामान्य जनधारणा है कि महाभारत एक कुरूवंश में राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम “भारतवर्ष” पड़ा परन्तु इसका साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, लेकिन वहीँ हमारे पुराण इससे अलग कुछ अलग बात पूरे साक्ष्य के साथ प्रस्तुत करते है !
आश्चर्यजनक रूप से इस ओर कभी हमारा ध्यान नही गया जबकि पुराणों में इतिहास ढूंढ़कर अपने इतिहास के साथ और अपने आगत के साथ न्याय करना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक था परन्तु , क्या आपने कभी इस बात को सोचा है कि जब आज के वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि प्राचीन काल में साथ भूभागों में अर्थात महाद्वीपों में भूमण्डल को बांटा गया था लेकिन ये सात महाद्वीप किसने और क्यों तथा कब बनाए गये ? इस पर कभी, किसी ने कुछ भी नहीं कहा ! अथवा दूसरे शब्दों में कह सकते है कि जान बूझकर इस से सम्बंधित अनुसंधान की दिशा मोड़ दी गयी !
परन्तु हमारा “”जम्बूदीप नाम “” खुद में ही सारी कहानी कह जाता है, जिसका अर्थ होता है समग्र द्वीप इसीलिए हमारे प्राचीनतम धर्म ग्रंथों तथा विभिन्न अवतारों में सिर्फ “जम्बूद्वीप” का ही उल्लेख है क्योंकि उस समय सिर्फ एक ही द्वीप था साथ ही हमारा वायु पुराण इस से सम्बंधित पूरी बात एवं उसका साक्ष्य हमारे सामने पेश करता है ! वायु पुराण के अनुसार अब से लगभग 22 लाख वर्ष पूर्व त्रेता युग के प्रारंभ में स्वयम्भुव मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने इस भरत खंड को बसाया था ! चूँकि महाराज प्रियव्रत को अपना कोई पुत्र नही था इसलिए , उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नीन्ध्र को गोद ले लिया था जिनका पुत्र नाभि था ! नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ हुआ और, इसी ऋषभ के पुत्र भरत थे तथा इन्ही भरत के नाम पर इस देश का नाम “भारतवर्ष” पड़ा !

उस समय के राजा प्रियव्रत ने अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को संपूर्ण पृथ्वी के सातों महाद्वीपों का अलग-अलग राजा नियुक्त किया था ! राजा का अर्थ उस समय धर्म, और न्यायशील राज्य के संस्थापक से लिया जाता था ! इस तरह राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप का शासक अग्नीन्ध्र को बनाया था ! इसके बाद राजा भरत ने जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया और, वही ” भारतवर्ष” कहलाया !
ध्यान रखें कि भारतवर्ष का अर्थ है राजा भरत का क्षेत्र और इन्ही राजा भरत के पुत्र का नाम सुमति था ! इस विषय में हमारा वायु पुराण कहता है—
सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं
नृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य
किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत।
(वायु 31-37, 38)
हम अपने रोजमर्रा के कार्यों की ओर ध्यान देकर इस बात को प्रमाणित कर सकते है हम अपने घरों में अब भी कोई याज्ञिक कार्य कराते हैं तो, उसमें सबसे पहले पंडित जी संकल्प करवाते हैं ! हालाँकि हम सभी उस संकल्प मंत्र को बहुत हल्के में लेते हैं और, उसे पंडित जी की एक धार्मिक अनुष्ठान की एक क्रिया मात्र मानकर छोड़ देते हैं ! परन्तु यदि आप संकल्प के उस मंत्र को ध्यान से सुनेंगे तो उस संकल्प मंत्र में हमें वायु पुराण की इस साक्षी के समर्थन में बहुत कुछ मिल जाता है ! संकल्प मंत्र में यह स्पष्ट उल्लेख आता है –
जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते
संकल्प के ये शब्द ध्यान देने योग्य हैं क्योंकि, इनमें जम्बूद्वीप आज के यूरेशिया के लिए प्रयुक्त किया गया है ! इस जम्बू द्वीप में भारत खण्ड अर्थात भरत का क्षेत्र अर्थात ‘भारतवर्ष’ स्थित है जो कि आर्याव्रत कहलाता है ! इस संकल्प के छोटे से मंत्र के द्वारा हम अपने गौरवमयी अतीत के गौरवमयी इतिहास का व्याख्यान कर डालते हैं, परन्तु अब एक बड़ा प्रश्न आता है कि जब सच्चाई ऐसी है तो फिर शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र भरत से इस देश का नाम क्यों जोड़ा जाता है ?
इस सम्बन्ध में ज्यादा कुछ कहने के स्थान पर सिर्फ इतना ही कहना उचित होगा कि शकुंतला, दुष्यंत के पुत्र भरत से इस देश के नाम की उत्पत्ति का प्रकरण जोडऩा शायद नामों के समानता का परिणाम हो सकता है अथवा , हम हिन्दुओं में अपने धार्मिक ग्रंथों के प्रति उदासीनता के कारण ऐसा हो गया होगा !
परन्तु जब हमारे पास वायु पुराण और मन्त्रों के रूप में लाखों साल पुराने साक्ष्य मौजूद है और, आज का आधुनिक विज्ञान भी यह मान रहा है कि धरती पर मनुष्य का आगमन करोड़ों साल पूर्व हो चुका था, तो हम पांच हजार साल पुरानी किसी कहानी पर क्यों विश्वास करें ?

सिर्फ इतना ही नहीं हमारे संकल्प मंत्र में पंडित जी हमें सृष्टि सम्वत के विषय में भी बताते हैं कि अभी एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरहवां वर्ष चल रहा है ! फिर यह बात तो खुद में ही हास्यास्पद है कि एक तरफ तो हम बात एक अरब 96 करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ तेरह पुरानी करते हैं परन्तु, अपना इतिहास पश्चिम के लेखकों की कलम से केवल पांच हजार साल पुराना पढ़ते और मानते हैं ! आप खुद ही सोचें कि यह आत्मप्रवंचना के अतिरिक्त और क्या है ?
इसीलिए जब इतिहास के लिए हमारे पास एक से एक बढ़कर साक्षी हो और प्रमाण पूर्ण तर्क के साथ उपलब्ध हों तो फिर , उन साक्षियों, प्रमाणों और तर्कों के आधार पर अपना अतीत अपने आप खंगालना हमारी जिम्मेदारी बनती है ! हमारे देश के बारे में वायु पुराण का ये श्लोक उल्लेखित है –
हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्।तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधा:।।
यहाँ हमारा वायु पुराण साफ साफ कह रहा है कि हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है ! इसीलिए हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि हमने शकुंतला और दुष्यंत पुत्र भरत के साथ अपने देश के नाम की उत्पत्ति को जोड़कर अपने इतिहास को पश्चिमी इतिहासकारों की दृष्टि से पांच हजार साल के अंतराल में समेटने का प्रयास किया है ! ऐसा इसीलिए होता है कि आज भी हम गुलामी भरी मानसिकता से आजादी नहीं पा सके हैं और, यदि किसी पश्चिमी इतिहासकार को हम अपने बोलने में या लिखने में उद्घ्रत कर दें तो यह हमारे लिये शान की बात समझी जाती है परन्तु, यदि हम अपने विषय में अपने ही किसी लेखक कवि या प्राचीन ग्रंथ का संदर्भ दें तो, रूढि़वादिता का प्रमाण माना जाता है !
यह सोच सिरे से ही गलत है ! इसे आप ठीक से ऐसे समझें कि राजस्थान के इतिहास के लिए सबसे प्रमाणित ग्रंथ कर्नल टाड का इतिहास माना जाता है, परन्तु आश्चर्य जनक रूप से हमने यह नही सोचा कि एक विदेशी व्यक्ति इतने पुराने समय में भारत में आकर साल, डेढ़ साल रहे और यहां का इतिहास तैयार कर दे, यह कैसे संभव है ? विशेषत: तब जबकि उसके आने के समय यहां यातायात के अधिक साधन नही थे और, वह राजस्थानी भाषा से भी परिचित नही था !

फिर उसने ऐसी परिस्थिति में सिर्फ इतना काम किया कि जो विभिन्न रजवाड़ों के संबंध में इतिहास संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं उन सबको संहिताबद्घ कर दिया ! इसके बाद राजकीय संरक्षण में करनल टाड की पुस्तक को प्रमाणिक माना जाने लगा और, यह धारणा बलवती हो गयीं कि राजस्थान के इतिहास पर कर्नल टाड का एकाधिकार है ! ऐसी ही धारणाएं हमें अन्य क्षेत्रों में भी परेशान करती हैं इसीलिए अपने देश के इतिहास के बारे में व्याप्त भ्रांतियों का निवारण करना हमारा ध्येय होना चाहिए, क्योंकि इतिहास मरे गिरे लोगों का लेखाजोखा नही है जैसा कि इसके विषय में माना जाता है बल्कि, इतिहास अतीत के गौरवमयी पृष्ठों और हमारे न्यायशील और धर्मशील राजाओं के कृत्यों का वर्णन करता है।

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सूचनार्थ

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“रूपेश कान्त कौशिक”
धन्यवाद

आचार्य कैयट

आचार्य कैयट पतंजलि के व्याकरण भाष्य की ‘ प्रदीप ‘ नामक टीका के रचयिता हैं । उनके पिता का नाम जैयटोपाध्याय था ।

अनुमान है कि वे कश्मीर निवासी थे । पीटर्सन ने कश्मीर की एक रिपोर्ट में कैयट को प्रकाशकार मम्मट का भाई और जैयट का पुत्र कहा है । कश्मीरी ब्राह्मण पण्डित के बीच प्रचलित अनुश्रुति के अनुसार कैयट पामपुर गाँव के निवासी थे । महाभाष्यन्त पाणिनिकृत व्याकरण को वे कण्ठस्थ ही पढ़ाया करते थे । आर्थिक स्थिति दयनीय होने के कारण उन्हें उदरपोषण के लिए कृषि आदि कार्यों के लिए शारीरिक श्रम करना पड़ता था ।

एक बार दक्षिण देश से कश्मीर आए हुए पण्डित कृष्ण भट्ट ने कश्मीर के राजा से मिलकर तथा अन्य प्रयत्नों द्वारा कैयट के लिए एक गाँव का शासन और धनधान्य का संग्रह किया और उसे लेकर जब वे उसे समर्पित करने उनके यहाँ पहुँचे तो उन्होंने भिक्षा दान ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया ।

वे कश्मीर से पैदल काशी आए और शास्त्रार्थ में अनेक पण्डितों को हराया ।

वहीं प्रदीप की रचना हुई । इस टीकाग्रन्थ के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है कि उसका आधार ‘ भर्तृहरि ‘ ‘ वाक्यापदीयकार ‘ की ‘ भाष्यटीका ‘ है , जो अब पर्णरूप से अप्राप्य है । ‘ प्रदीप ‘ में स्थान – स्थान पर पतंजलि और भर्तृहरि के स्फोटवाद का अच्छा दार्शनिक विवेचन हुआ है ।

धन्या भारतभूमि:

. देशभक्तिः

न यत्र देशोधृतिकामनाऽऽस्ते,
न मातृभूमेर्हितचिन्तनं च ।
न राष्ट्ररक्षा- बलिदानभावः,
श्मशानतुल्यं नरजीवनं तत् । । ( कपिलस्य)

प्रस्तावना__
निखिले भुवने न कोऽपि नरो यः स्वमातृभूमि स्वदेशं वा न प्रणमति । राष्ट्रियभावनैव सा भावना या मानवं स्वदेशोन्नत्यर्थं प्रेरयति , स्वदेशाभिमानं स्वदेशगौरवं च प्राणेभ्योऽप्यधिकं मन्यते । प्राचीनकालादेव देशभक्तिर्मानवजीवने ओता प्रोता च ।

ऋग्वेदे – अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनाम् ( ऋग्० १० . १२५ . ३ ) ,
यजुर्वेदे – वयं राष्ट्र जागृयाम पुरोहिताः ( यजु० ९ . २३ ) ।
अथर्ववेदे च पृथ्वीसूक्ते बहवो मन्त्राः प्राप्यन्ते देशभक्ति – भावोपेताः । यथा –

माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः ( अ० १२ . १ . १२ ) , वयं तुभ्यं बलिहतः स्याम ( अ० १२ . १ . ६२ ) इत्यादयः ।

रामायण – महाभारत- पुराणादिषु स्वदेश – गौरवं देशभक्तिश्च बहधा कीर्त्यते । स्वदेशभक्ति – भावनयैव प्रेरिताः शतशो महात्मानः शूरा वीराश्च सर्वस्वं विहायापि देशरक्षणं व्यदधुः । केचन च देशोन्नतौ स्वीयान् असून् तृणवद् उज्झाचक्रुः ।

देशभक्तेरावश्यकता –
देश – प्रेम देशभक्तिश्च जन्मिनोऽनिवार्य कर्तव्यम् । देशभक्तिभावनयैव प्रेरिताः शतशो वीराः समराङ्गणे हेलया स्वजीवनानि समर्पयामासुः । देशभक्त्यैव देशोन्नतिभावना, समाजसुधारभावना , समाजोन्नतिकामना , राष्ट्र श्रीवृद्धिकरणम् , शत्रून्मूलन – पुरःसरं देशस्य सर्वविध – सुदृढीकरणं प्रवर्तते । यत्र न जागर्ति देशभक्तिभावः स मानव : पशुसंकाशो गण्यते । उक्तं चार्यभाषा – कविना__
जिसको न निजगौरव तथा निजदेश का अभिमान है । वह नर नहीं , नर- पश- निरा है , और मृतक समान है। ।

आङ्ग्लभाषा – विद्वान् डेनियल – वेब्स्टर – महोदयो निर्दिशति यद् अस्माकं जीवनोद्देश्य राष्ट्रमेव , समग्रं राष्ट्रम् , न किंचिद् अन्यत् ।
Let our object be , our country , our whole country , and nothing but our country” . – Daniel Webster
हावार्ड – महोदयोऽपि देशहित – सम्पादनं सर्वोत्कृष्टं कर्तव्यं निर्दिशति ।
Our country ‘ s welfare is our first concern and who promotes that best , best proves his duty.” – Harard

देशभक्तेमहत्त्वम् –
देशभक्तिर्मानवानां सर्वोत्कृष्ट कर्तव्यम् । यत्र न संचरति , न प्रवहति च देशभक्तिधारा तजीवनं शुष्कसरिदेव । अतएव मातृभूमिस्तुती प्रत्यहं गीयते ।.

वन्दे मातरम् ।
सुजलां सुफला मलयजशीतलाम् ।
शस्य श्यामला मातरम् , वन्दे मातरम् ।

आंग्लभाषाया बैरन कविराह –
यो न राष्ट्र स्निह्यति , न स स्नेहं क जानीते ।
“He , who loves not this country , can love nothing” .Byron
का नाम सा शक्तिर्या मातभूमि – हिताय सर्वस्वार्पणं प्रति प्रेरयति ।
देशभक्तिरेव सा शक्तिर्या दीपशिखासु पतङ्गवद् आत्मोत्सर्ग शिक्षयति ।तयैव प्रेरणया महाराणा प्रताप शिवाजी – महात्मा गान्धि – सुभाषचन्द्रबोस – जवाहरलाल नेहरु – वीर सावरकर – लाला लाजपतराय – बालगंगाधर तिलक – सरदार भगतसिंह – चन्द्रशेखर आजाद – ऊधमसिंह गोखले – रामप्रसाद बिस्मिल – लक्ष्मीबाई – मङ्गल पाण्डेय – नानासाहब – भामा शाह – स्वामी दयानन्द – सरदार पटेल- प्रभृतयः स्वदेहमोहं परित्यज्य मातृभूमि – रक्षार्थं स्वोत्सर्गं चक्रुः ।

देशभक्ति – भावनयैव स्वदेशाभिमानम् , स्वदेश – रक्षा – संकल्पः , आत्मोत्सर्ग – भावना , परोपकार – प्रवणता , नैतिकाभ्युन्नतिश्च संभाव्यते ।’ स्वातन्त्र्यम् अस्माकं जन्म सिद्धोऽधिकारः ‘ इति महात्मनस्तिलकस्य वचनम अद्यापि जीवनं प्रेरयति ।

माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः
भारतभूमिरस्माकं जननी ।तत्पुत्रत्वेन मातुः रक्षणम् अस्माकं परमं कर्तव्यम् ।अतएव साधु व्याह्रियते ‘

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।
वयं तुभ्यं बलिहृतः स्याम ।( अथर्व० १२ . १ . ६२ ) सत्यवसरे सत्यां चावश्यकतायां मातृभूमेः संकटनिवारणार्थं प्राणार्पणेनापि मातृभूमि – हितसम्पादनं सर्वेषां श्रेष्ठ कर्म ।

धन्या भारतभूः –
भारतभूमेर्गुणगौरवं प्रकृष्टोन्नतत्वं च ध्यायं ध्यायं धीमभिः भारतभू – प्रशंसनं व्यधायि ।उक्तं च विष्णुपुराणे__
गायन्ति देवाः किल गीतकानि ,
धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे ।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते ,
भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥( विष्णु० )

एतस्य गुणगौरवोत्कृष्टत्वं प्रेक्ष्यैव मनुनोद्घोष्यते

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥
( मनु०२ . २० )

यदा सर्वं जगद् अज्ञान – ध्वान्तावृतम् अभूत् , तदा भारते वेदोद्घोषः प्रावर्तत ।अतएव भारतीया वैदिकी च संस्कृतिः प्राचीनतमा प्रेष्ठा च ।

सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा ।( यजु० ७ . १४ )

भारतस्य समृद्धिम् आकलव्यैव विदेशोयैर्भारतं सवर्णपक्षी ( सोने की चिडिया ) इति प्रशस्यते स्म ।अगस्त्य – बुद्ध – अशोक – प्रभृतिभिर्विदेशेषु भारतीयं गौरवम् , भारतीयासंस्कृतिः , वैदिकधर्मः , भारतीया विचाराश्च प्रचारिताः । अतएव साधूच्यते – ‘ धन्या भारतभूः प्रकामवसुधा धन्या च तत् – संस्कृतिः ।’

जयन्ति ते हुतात्मानः , क्रान्तिसन्देशवाहकाः ।
येषां ज्योतिर्जगत्सर्वं विद्योतयति भानुवत् ।।
( कपिलस्य )

रूपेश कान्त “कौशिक”

आचार्य जैनेन्द्र

आचार्य जैनेन्द्र • व्याकरण के महान् आचार्य जैनेन्द्र के पिता का नाम माधवभट्ट तथा माता का नाम श्रीदेवी था ।ये कर्नाटक के कोले नामक ग्राम के निवासी थे ।इनका जन्म ब्राह्मण परिवार में विक्रम संवत् 300 के पश्चात् हुआ था ।इनका घर का नाम ‘ देवनन्दि ‘ था ।ये एक दिन अपने घर के बगीचे में घूम रहे थे तभी उन्होंने साँप के मुख में फँसे हुए मेंढ़क को देखा , इससे उन्हें विरक्ति हो गई और इन्होंने जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण की तथा महामुनि हो गए । शब्दानुशासन सम्बन्धी कथन की पुष्टि के लिए महामुनि द्वारा किवचित जैनेन्द्र व्याकरण के सूत्रों को प्रमाण स्वरूप उपस्थित किया गया । पूज्यवाद स्वामी जी ने अपने जैनेन्द्र व्याकरण सूत्रों में भूतबलि , समन्तभद्र श्रीदत्त , यशोभद्र तथा प्रभाचन्द्र नामक पूर्वाचार्यों का निर्देश किया है । कथाओं के माध्यम से इस प्रकार का वर्णन प्राप्त होता है कि इन्होंने अपने पैरों के धोए हुए जल के स्पर्श से लोहे को सोना बना दिया था । कथानकों में ऐसा भी वर्णन प्राप्त होता है कि ये पूज्यवाद मुनि बहुत दिनों तक योगाभ्यास करते रहे । किसी समय एक देव ने विमान में इन्हें बैठाकर अनेक तीर्थों की यात्रा कराई । मार्ग में एक जगह उनकी दृष्टि नष्ट हो गई । अत : उन्होंने शान्त्यष्टक रचकर ज्यों की त्यों अपनी दृष्टि प्राप्त की । इनकी प्रमुख रचनाओं में देशभक्ति , जन्मभिषेक , सर्वार्थसिद्धि , समधितन्त्र , इष्टोपदेश , जैनेन्द्रव्याकरण और सिद्धि प्रिय स्रोत्र प्रमुख हैं ।

आचार्य नागेश भट्ट

  • आचार्य नागेश भट्ट (1730–1810) संस्कृत के नव्य वैयाकरणों में सर्वश्रेष्ठ है।
  • ये महाराष्ट्र के ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम शिव भट्ट और माता का नाम सतीदेवी था। साहित्य, धर्मशास्त्र, दर्शन तथा ज्योतिष विषयों में भी इनकी अबाध गति थी।

प्रयाग के पास श्रृंगवेरपुर में रामसिंह राजा रहते थे। वहीं इनके आश्रयदाता थे। एक जनप्रवाद है कि नागेश भट्ट को सं. 1772 वि. में जयपुर राज में अश्वमेघ यज्ञ a lo ii Asi as a Zee oके अवसर पर आमंत्रित किया गया था। Jo as ooAwqoA Zzzipjuyv wwiiizsiSoSseiW de ki ZZ iWi see iuoAj sq iwiisi Li awwwqosAA see ww¥}¶~ समय आचार्य नागेश भट्ट संन्यास ले iiaiaiA ii An as Sq ii A UI iS Jo iadOk asSoचुके थे। अतएव उन्होंने अश्वमेघ का निमंत्रण स्वीकार नहीं किया। आचार्य नागेश के जीवन की क्रमबद्ध सामग्री नहीं मिलती।

आचार्य नागेश ने भानुदत्त की “रसमंजरी” पर टीका की है। उस टीका की पांडुलिपि ‘इंडिया ऑफिस’, लंदन की लाइब्रेरी में है। उसका लेखनकाल संवत् 1769 वि. है। बालशर्मा, नागेश भट्ट के प्रौढ़ शिष्यों में थे। उन्होंने मन्नुदेव और हेनरी कोलब्रुक की प्रेरणा से “धर्मशास्त्र संग्रह” नामक ग्रंथ लिखा था। इनकी प्रामाणिक शिष्यपरंपरा का अनुमान लगाना कठिन है। तथापि नागेश की आदिम गुरुपरंपरा इस प्रकार पाई गई है-

नागेश दार्शनिक वैयाकरण हैं। मौलिक रचनाओं के साथ-साथ इनकी प्रौढ़ टीका रचनाएँ भी पाई जाती हैं। इनके सभी ग्रंथ छप गए हैं और व्यापक रूप से पढ़े-पढ़ाए जाते हैं। ग्रंथों में नई-नई उद्भावनाएँ की गई हैं। नवीन तर्क एवं उक्तियों का प्रयोग है, परंतु महाभाष्यकार की सीमा में सब समाहित हो गया है। आचार्य नागेश के नाम पर रसमंजरी टीका, लघुशब्देंदुशेखर, बृहच्छब्देंदुशेखर, परिभाषेन्दु शेखर, लघुमंजूषा, परमलघुमंजूषा, स्फोटवाद, महाभाष्य-प्रत्याख्यान-संग्रह और पतंजलिकृत महाभाष्य पर उद्योत नामक टीकाग्रंथ पाए जाते हैं।

इन ग्रंथों की छाया में प्रचुरग्रंथों की सृष्टि हुई है। टीका और टिप्पणियों की भरमार है। वैयाकरण-सिद्धांत-मंजूषा आचार्य नागेश का व्याकरणदर्शनग्रंथ है। इसका निर्माण उद्योत और परिभाषेंदुशेखर से पूर्व हुआ है। परभाषेंदुशेखर का अध्ययन व्यापार बहुत बड़ा है। अतएव इस यशस्वी ग्रंथ पर अनेक टीकाएँ उपलब्ध हैं।

लघुशब्देंदुशेखर और बृहच्छब्देंदुशेखर भट्टोजि दीक्षित कृत सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्यामात्र हैं।

आचार्य भट्टोजिदीक्षित

आचार्य भट्टोजिदीक्षित का जन्म 1550 ई . वी सन् में और इनकी मृत्यु 1630 ई . वी सन् में हुई थी ।

आचार्य भट्टोजिदीक्षित के द्वारा प्रतिपादित ग्रन्थ हैं — त्रिस्थली सेतु , अद्वैत कौस्तुभ , वेदभाष्यकार , शब्दकौस्तुभ , सिद्धान्तकौमुदी आदि । इनके पिता का नाम शिवभट्ट और माता का मान सतीदेवी था । भट्टोजिदीक्षित 27वीं शताब्दी में उत्पन्न , संस्कृत वैयाकरण थे , जिन्होंने ‘ सिद्धान्तकौमुदी ‘ की रचना की । इनका निवास स्थान काशी था ।

पाणिनीय व्याकरण के अध्ययन की प्राचीन परिपाटी में पाणिनीय सूत्रपाठ के क्रम को आधार माना जाता था । यह क्रम प्रयोगसिद्धि की दृष्टि से कठिन था , क्योंकि एक ही प्रयोग का साधन करने के लिए विभिन्न अध्यायों के सूत्र लगाने पड़ते थे । इस कठिनाई को देखकर ऐसी पद्धति के आविष्कार की अवश्यकता पड़ी , जिसमें प्रयोगविशेष की सिद्धि के लिए आवश्यक सभी सूत्र एक जगह उपलब्ध हों ।

आचार्य भट्टोजिदीक्षित ने ‘ प्रक्रियाकौमुदी ‘ के आधार पर ‘ सिद्धान्तकौमुदी ‘ की रचना की । इस ग्रन्थ पर उन्होंने स्वयं ‘ प्रौढ़मनोरमा ‘ टीका लिखी । पाणिनीय सूत्रों पर ‘ अष्टाध्यायी ‘ क्रम से एक अपूर्ण व्याख्या , ‘ शब्दकौतुभ ‘ तथा ‘ वैयाकरणभूषण कारिका ‘ भी इनके ग्रन्थ में शामिल है । इनकी ‘ सिद्धान्तकौमुदी ‘ लोकप्रिय ग्रन्थ है ।

आचार्य जयादित्य वामनौ

आचार्य जयादित्य संस्कृत के वैयाकरण थे ।

कशिकावृत्ति ‘ ‘आचार्य वामन’ और ‘आचार्य जयादित्य’ ने मिलकर अष्टाध्यायी के ऊपर एक वृत्ति लिखी जिसका नाम है – काशिकावृत्ति

आचार्य हेमचन्द्र ने अपने ‘ शब्दानुशासन ‘ में व्याख्याकार जयादित्य को बहुत ही रुचिपूर्ण ढंग से स्मरण किया है । चीनी यात्री इत्सिंग ने अपनी भारत यात्रा के प्रसंग में जयादित्य का प्रभावपूर्ण ढंग से वर्णन किया है ।

आचार्य जयादित्य के जन्म – मरण आदि के वृत्तान्त के विषय में कोई भी परिमार्जित एवं पुष्कल ऐतिहासिक सामग्री नहीं मिलती है । तद्नुसार जयादित्य का देहावसान सं . 718 वि . के आस – पास हुआ होगा ।

जयादित्य ने भारविकृत पद्यांश उद्धृत किया है । इस अनुमानिक तथ्य के आधार पर जयादित्य का सं . 650 – 700 वि . तक के मध्य अवस्थित होना माना जा सकता है ।

चीनी आदि विदेशी साहित्य में बहुत दिनों तक भारतीय साहित्य का अनुवाद होता रहा है । बहुत सा भारतीय साहित्य अनुवादरूप से विदेशी साहित्य में पाया गया है , लेकिन उसका मूल ग्रन्थ भारत से लुप्त है । इस स्थिति में यदि विदेशी अनुवाद साहित्य की गंभीर गवेषणा की जाए तो जयादित्य के बारे में प्रामाणिक जानकारी मिल जाएगी ।

आचार्य पतंजलि

आचार्य पतंजलि

आचार्य पतंजलि के जन्म और उनके माता – पिता के बारे में अनेक किंवदन्ति हैं ।एक किंवदन्ति के अनुसार पतंजलि के पिता ‘ अंगीरा ‘ इस सृष्टि के निर्माता बा के दस पुत्रों में से एक थे और शिव की पत्नी उनकी माता थी ।इस प्रकार पतंजलि ब्रह्माके पौत्र और त्याग में सर्वश्रेष्ठ बृहस्पति के भाई भी थे ।

पतंजलि के मुख्य ग्रन्थों में ‘ महाभाष्य ‘ का नाम नाम सर्वोपरि है ।.महर्षि पतंजलि भारत के लब्ध प्रतिष्ठित विद्वानों में से एक हैं , इनके जन्म के विषय में कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता है , अनुमानतः प्रमाणों के अनुसार पतंजलि ऋषि पाटलिपुत्र के राजा पुष्यमित्र शुंग के समकालीन ( 185 से 63 ईसा पूर्व ) माने जाते हैं ।

.महर्षि पतंजलि अपने तीन प्रमुख कार्योंके लिए विख्यात हैं ,

प्रथम तो व्याकरण की पुस्तक ‘ महाभाष्य के लिए , दूसरा ‘ पाणिनि अष्टाध्यायी ‘ का टीका लिखने तथा तीसरा व सबसे प्रमुख योगशास्त्र ‘ ( पंजलि योगसूत्र ) की रचना के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं।

• महर्षि पतंजलि ने महाभाष्य की रचना काशी में की , काशी में ‘ नागकआँ ‘ नामक स्थान पर इस ग्रन्थ की रचना हुई थी ।

नाग पंचमी के दिन इस कुएँ के पास अब भीअनेक विद्वान् एवं विद्यार्थी एकत्र होकर संस्कृत व्याकरण के सम्बन्ध में शास्त्रार्थ करते हैं ।

महाभाष्य ‘ व्याकरण का ग्रन्थ है , लेकिन इसमें साहित्य , धर्म , भूगोल , समाज , रहन – सहन आदि से सम्बन्धित तथ्य मिलते हैं ।

महर्षि पतंजलि की मृत्यु के 300 साल बाद इनकी पुस्तक लुप्त हो गई , क्योंकि उस युग में पुस्तक छापने की मशीन नहींथी तथा हाथ से लिखी पुस्तकों की एकाध प्रतियाँ ही होती थीं ।

कश्मीर के राजा जयादित्य ने बड़े परिश्रम से इस पुस्तक की खोज की तथा पूरी पुस्तक की कई प्रतियाँ लिखवाकर अपने राज्य में उसका प्रचार करवाया ।

पतंजलि ने संस्कृत भाषा को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया । इतने प्राचीनकाल में विश्व के किसी भी देश में व्याकरण का ऐसा विद्वान् नहीं हुआ । महर्षि पतंजलि उन महापुरुषों में से । एक हैं , जो एक देश में जन्म लेकर सम्पूर्ण विश्व के हो जाते हैं ।

आचार्य भर्तृहरि

आचार्य भर्तृहरि विक्रम संवत् के प्रवर्तक के अग्रज माने जाते हैं । अत : इनका समय कुछ और पूर्व रहा होगा , लेकिन कुछ लोग ई . सन् 57 और कुछ लोग सन् 544 में इनका प्रारम्भ मानते हैं ।

भर्तृहरि उज्जयिनी के राजा थे । ये विक्रमादित्य उपाधि धारण करने वाला चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़े भाई थे । इनके पिता का नाम चन्द्रसेन था पत्नी का नाम पिंगला था जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे । इन्होंने शतकत्रय ( नीतिशतक , शृंगारशतक , वैराग्य शतक ) की रचनाएँ की हैं ।

भर्तृहरि एक महान् संस्कृत कवि थे । संस्कृत साहित्य के इतिहास में भर्तृहरि एक नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध हैं । इनके ‘ शतकत्रय ‘ की उपदेशात्मक कहानियाँ भारतीय जनमानस को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं । प्रत्येक शतक में सौ – सौ श्लोक हैं । बाद में इन्होंने गुरु गोरखनाथ का शिष्य बनकर वैराग्य धारण कर लिया था , इसलिए इनका लोकप्रचलित नाम बाबा भरथरी भी है । इनके आविर्भाव काल के सम्बन्ध में मतभेद हैं । इनकी जीवनी विविधताओं से भरी है । राजा भर्तृहरि ने भी अपने काव्य में अपने समय का निर्देश नहीं किया है ।

अतएव दन्तकथाओं , लोकगाथाओं तथा अन्य सामग्रियों के आधार पर इनका जीवन परिचय उपलब्ध है । भर्तृहरि विक्रम संवत् के प्रवर्तक के अग्रज माने जाते हैं । विक्रमी संवत् ई . सन् 46 वर्ष पूर्व प्रारम्भ होता है , जो विक्रमादित्य के प्रौढ़ावस्था का समय रहा होगा ।

भर्तृहरि विक्रमादित्य के अग्रज थे । अत : इनका समय कुछ और पूर्व रहा होगा । विक्रमीसंवत् के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं । भर्तृहरि उज्जयिनी के राजा थे । ये ‘ विक्रमादित्य ‘ उपाधि धारण करने वाले चन्द्रगुप्त द्वितीय के बड़े भाई थे । इनके पिता का नाम चन्द्रसेन था । पत्नी का नाम पिंगला था जिसे वे अत्यन्त प्रेम करते थे । इन्होंने सुन्दर और रसपूर्ण भाषा में नीति , वैराग्य तथा शृंगार जैसे गूढ़ विषयों पर शतक काव्य लिखे हैं । इस ‘ शतकत्रय ‘ के अतिरिक्त , “ वाक्यपदीय ‘ नामक एक उच्च श्रेणी का व्याकरण ग्रन्थ भी इनके नाम पर प्रसिद्ध है । ऐसा माना जाता है कि ‘ नाथपंथ ‘ के वैराग्य नामक ‘ उपपंथ ‘ के ये ही प्रवर्तक थे ।

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